NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पानी-पानी देहरादून: नदियों की जगह उगी इमारतें, इमारतों के बीच बह रहीं नदियां
रिस्पना, नाला पानी की राव या सुसवा जैसी नदियों के किनारे खड़े होकर आप अपने शहर, राज्य या देश की स्थिति का अंदाज़ा लगा सकते हैं। ये नदियां अपने आप खत्म नहीं हो रही हैं। व्यवस्थागत तरीके से इनका शोषण हो रहा है।
वर्षा सिंह
18 Aug 2020
पानी-पानी देहरादून

पहाड़ों से उतर कर देहरादून की ओर आती जंगली नदियों में बारिश के भीगे दिनों में ही पानी नज़र आता है। शहर उस समय मुश्किल में फंस जाता है। इन नदियों को लोग साल के दस महीने भूल जाते हैं। बरसात के इन दो महीनों में ये नदियां अपना वजूद जताती हैं। यही समय ये सवाल पूछने का भी है कि नदियों के रास्ते पर हमने इतने निर्माण कार्य कैसे कर लिए? नदियों की जगह हमने कैसे छेक ली? रिस्पना-सुसवा जैसी खत्म हो रही नदियों को दोबारा जिंदा करने के लिए करोड़ों रुपये के एक्शन प्लान  पर काम हो रहा है। बरसात के इन दो महीनों में जब ये नदियां जागती हैं। इनके छोर पर उग आई बस्तियां चारों तरफ पानी से घिर जाती है। हजारों जानें मुश्किल में पड़ जाते हैं। मान लीजिए अगर ये नदियां फिर जिंदा हो गईं। इनके किनारों पर कब्जा कर उग आईं बस्तियों का क्या होगा? इन बस्तियों के बाशिंदों का क्या होगा?  ये तो आपके लिए वोटबैंक भर का सवाल है।

देहरादून शहर इस समय जगह-जगह जलभराव की समस्या से जूझ रहा है। शनिवार को तो हाल ये था कि घंटाघर से लेकर कारगी चौक, बंजारावाला, प्रेमनगर, रायपुर, डालनवाला जैसे तमाम छोटे-बड़े इलाके बारिश से आफ़त में फंसे हुए थे। निचले इलाकों में कई जगह लोगों के घरों में पानी घुस गया। घर में रखा सामान-फर्नीचर बह गया। गाड़ियां तक बह गईं। कई जगह लोगों ने छतों पर चढ़कर रात गुज़ारी। प्रेमनगर में कुछ दुकानें पलक झपकते ढेर हो गई। जगह-जगह सड़कें धंस गईं। बारिश के दौरान सड़कों पर मौजूद लोग खतरे में घिर आए। कभी बेहद खूबसूरत माना जाने वाला शहर इस समय बेहद खराब टाउन प्लानिंग का उदाहरण बन गया है। नहरों-नालों पर अतिक्रमण हो चुका है। पानी की निकासी नहीं हो रही। 

अगस्त के तीसरे हफ्ते की बारिश में देहरादून का एक वीडियो वायरल हुआ। शहर के एक छोर पर गढ़ी कैंट में बसे टपकेश्वर महादेव मंदिर के पास बरसों बाद लोगों ने तमसा नदी के रौद्र रूप को देखा। मंदिर और यहां तक आने वाले रास्तों पर जैसे नदी ही बह रही थी। वहीं शहर के दूसरे छोर पर भी ऐसे ही हालात बने। सहस्त्रधारा रोड की तरफ आईटी पार्क बसाया गया है। ‘नाला पानी की राव’ नदी के कैचमेंट एरिया में बसी इस जगह पर भी मानो नदी वापस लौट आई। पानी का तेज़ बहाव देखकर ही रोंगटे खड़े हो जाएं। उस समय किसी का सड़क पर मौजूद होना ही जानलेवा है। अगले रोज मैं खुद इस जगह को देखने पहुंची। फ्लाई ओवर के नीचे किसी नाले सरीखी नज़र आ रही नदी की ओर बढ़ने पर थोड़ी राहत मिली। किनारे के जंगलों से आ रही पानी की एक मोटी धार ‘नाला पानी की राव’ को जीवन दे रही थी। जैसे नदी वेंटिलेटर पर हो और ये धार उसकी आखिरी सांसें। इस धार के पहुंचने से आगे के पूरे हिस्से में नदी की सतह पर चमकते बजरी,कंकड़,पत्थर के रास्ते नदी की मौजूदगी का निशान बनाते हैं। नाला पानी की राव नदी और उसके बगल में बसा आईटी पार्क बताता है कि हम नदियों की कब्र पर विकास की छलांग लगा रहे हैं।

गूगल अर्थ पर नाला पानी की राव नदी का पुराना नक्शा टटोलते हुए वर्ष 2005 में पानी का पूरा बहाव दिखता है। ‘नाला पानी की राव’ नदी की तरह नज़र आती है। वर्ष 2020 तक पहुंचते-पहुंचते नदी के एक छोर पर बस्ती घनी होती जा रही है। इस समय नदी और सड़क साथ-साथ चल रहे हैं। आबादी के बढ़ते दबाव को देखकर लगता है कि जल्द ही नदी की जगह सड़क की दूसरी लेन तैयार हो जाएगी। गूगल अर्थ फिर शायद नदी का छूटा रास्ता भी नहीं दिखाएगा। बारिश के प्रहार से नदी की ओर धंसी सड़क हादसे का निमंत्रण लगती है। सड़क के दूसरे छोर पर कहीं मकान बन रहे हैं, कहीं दुकानें। इन इमारतों में काम करने वाले मज़दूर नदी किनारे बसे कच्चे-पक्के घरों में पनाह लिए हुए हैं। सूखी नदी के रोड़ी-पत्थरों के बीच उम्मीदों से भरे ये बच्चे खेलते दिखाई देते हैं। पतंग उड़ाते हैं। सड़क पर फिरते जानवरों के लिए भी पानी का इंतज़ाम इन्हीं नदियों के ठिये से होता है।

nala pani ki rao river in 2020.png

अब सिर्फ बरसात के दिनों में नज़र आने वाली रिस्पना देहरादून के बीचोंबीच होकर गुजरने वाली नदी है। शहर के अंदर नदी के करीब 18 किलोमीटर की यात्रा में 90 से अधिक बस्तियां बसी हैं। इतनी बड़ी आबादी को हटाना अब संभव नहीं है। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाएं से इन्हें शिफ्ट करने के प्रयास किये जा सकते हैं। लेकिन इसके लिए सरकार को अपना दिल और ख़ज़ाने दोनों ही खोलने होंगे। रिस्पना के किनारे सिर्फ अवैध बस्तियां नहीं बसीं। यहां का विधानभवन समेत कई अन्य महत्वपूर्ण सरकारी और गैर-सरकारी इमारतें भी नदी के कैचमेंच एरिया में ही हैं। नदी के बहाव क्षेत्र में ये निर्माण कार्य किनकी अनुमतियों से हुए? कभी ये अपने मूल प्रवाह में लौटीं तो क्या होगा? केदारनाथ आपदा में नदियां अपने मूल रास्तों पर बह चली थीं। नतीजा भयंकर तबाही के रूप में सामने आया था।

धूप के दिनों में इन सूखी नदियों के किनारे दो मिनट रुक कर लंबी सांस नहीं ली जा सकती। मरे हुए जानवर सरीखी बदबू दम घोटती है। रिस्पना किनारे एक बच्चा अपनी साइकिल के साथ खड़ा है। ये पूछने पर कि क्या वो भी कभी नदी की खाली जगह पर खेलता है। बच्चा साफ इंकार करता है। वह कहता है कि यहां से इतनी बदबू आती है कि हम दो मिनट भी नहीं ठहर सकते। वो नज़दीकी पार्क में अपने दोस्तों के साथ खेलना पसंद करता है। उसके ये कहने के बावजूद मुझे नदी के ठीक बीच में दो बच्चे पतंग उड़ाते दिखते हैं। दो नन्ही लड़कियां हाथों में चुन्नी लेकर खेलती दिखाई देती हैं। वहीं एक कुत्ता भी लेटा हुआ है। एक छोर पर नदी में मोटी पाइप के ज़रिये गंदा पानी गिर रहा है। सूखी नदी के बीच एक क्रेन और ट्रक भी खड़े दिखते हैं। ये जुलाई महीने की बात है।

रिस्पना नदी में कचरा.jpg

उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक रिस्पना में 177 नालों के ज़रिये 9.836 एमएलएडी गंदा पानी बहता है। इसी तरह बिंदाल नदी में शहर का 18.14 एमएलडी गंदा पानी बहता है। ये दोनों नदियां आगे चलकर सुसवा में मिल जाती हैं। सुसवा का बहाव सौंग नदी से जुड़ता है। सौंग नदी गंगा नदी में मिलती है।

बारिश की मुश्किलों से जूझते देहरादून पर सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्यूनिटीज संस्था के अनूप नौटियाल कहते हैं कि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए व्यवस्थागत बदलाव लाने होंगे। इसके लिए पीडब्ल्यूडी, नगर निगम, सिंचाई, पेयजल जैसे कई विभाग और कई योजनाएं हैं। इसके बावजूद शहरों की स्थिति लगातार खराब हो रही है। अभी देहरादून की आबादी करीब 12 लाख है। जिस रफ्तार से आबादी बढ़ रही है अगले बीस वर्षों में देहरादून की आबादी 25 लाख हो जाएगी। तब पानी की जरूरत ज्यादा होगी। ज्यादा कचरा पैदा होगा। इसलिए सभी विभागों को साथ मिलकर समग्र तरीके से समस्या का इलाज ढूंढ़ना होगा। जख्म पर बैंडेड लगाने वाले अप्रोच से काम नहीं बनेगा।

नए निर्माण के बीच शहर की नदियां सिकुड़ती जा रही हैं। रिस्पना, बिंदाल, नाला पानी की राव जैसी नदियां इसका उदाहरण हैं। पूरे देहरादून जनपद में 15 छोटी बड़ी नदियां गुज़रती हैं। इनमें गंगा, टौंस, आसन जैसी बड़ी नदियां भी शामिल हैं। इसके अलावा 100 से अधिक नाले इस शहर का ड्रेनेज सिस्टम संभालने के लिए बने थे। अब ज्यादातर अतिक्रमण का शिकार हो चुके हैं। रायपुर क्षेत्र में एक मात्र नाला पानी के बहाव के साथ पुराने समय की यादें ताज़ा करता हुआ लगता है। ये छोटी-छोटी जंगली नदियां ही शहर के पीने के पानी का इंतज़ाम करती हैं। ये हमारे इको सिस्टम का हाल बताती हैं।

रिस्पना, नाला पानी की राव या सुसवा जैसी नदियों के किनारे खड़े होकर आप अपने शहर, राज्य या देश की स्थिति का अंदाज़ा लगा सकते हैं। ये नदियां अपने आप खत्म नहीं हो रही हैं। सुनियोजित तरीके से इनका शोषण हो रहा है। इनके हिस्से का पानी, इनके हिस्से की जगह, इनके प्राकृतिक जल स्रोत सब कुछ पर हम कब्ज़ा कर रहे हैं और हमने इन्हें सूखा छोड़ दिया है।

इन्हीं दिनों में ब्रिटेन के वेल्स की नदियों की दुर्दशा पर वाशिंगटन पोस्ट का ये लेख कहता है कि प्रदूषण भ्रष्टाचार का फिजिकल एक्सप्रेशन है। ब्रिटेन की नदियों से लेकर हमारी गंगा-यमुना और रिस्पना जैसी छोटी नदियां तक इस भ्रष्टाचार का नमूना हैं। हमारी सरकारें, प्रशासनिक अधिकारी और हम सब का इसमें थोड़ा-थोड़ा योगदान है। प्रकृति हमें समय-समय पर बताती रहती है कि यदि हम अपनी सीमा में नहीं रहे तो इसका क्या अंजाम होगा।

(वर्षा सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Dehradun
heavy rains
Uttrakhand River
Uttarakhand pollution control
Social development for communities

Related Stories

इको-एन्ज़ाइटी: व्यासी बांध की झील में डूबे लोहारी गांव के लोगों की निराशा और तनाव कौन दूर करेगा

व्यासी परियोजना की झील में डूबा जनजातीय गांव लोहारी, रिफ्यूज़ी बन गए सैकड़ों लोग

दिल्ली से देहरादून जल्दी पहुंचने के लिए सैकड़ों वर्ष पुराने साल समेत हज़ारों वृक्षों के काटने का विरोध

देहरादून: सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट के कारण ज़हरीली हवा में जीने को मजबूर ग्रामीण

एक बार फिर बाढ़ की चपेट में उत्तर बिहार, जनजीवन बुरी तरह प्रभावित

बाढ़ के बाद बेमौसम बरसात ने किसानों की कमर तोड़ दी

'विनाशकारी विकास' के ख़िलाफ़ खड़ा हो रहा है देहरादून, पेड़ों के बचाने के लिए सड़क पर उतरे लोग

सोयाबीन, बाजरा और तिल की फसलें बर्बाद, किसानों को उच्चित मुआवज़ा दे सरकार: माकपा

मुबंई: बारिश हर साल लोगों के लिए आफ़त लेकर आती है और प्रशासन हर बार नए दावे!

महाराष्ट्र : रायगढ़ जिले में भूस्खलन के कारण 30 लोगों की मौत


बाकी खबरें

  • श्याम मीरा सिंह
    यूक्रेन में फंसे बच्चों के नाम पर PM कर रहे चुनावी प्रचार, वरुण गांधी बोले- हर आपदा में ‘अवसर’ नहीं खोजना चाहिए
    28 Feb 2022
    एक तरफ़ प्रधानमंत्री चुनावी रैलियों में यूक्रेन में फंसे कुछ सौ बच्चों को रेस्क्यू करने के नाम पर वोट मांग रहे हैं। दूसरी तरफ़ यूक्रेन में अभी हज़ारों बच्चे फंसे हैं और सरकार से मदद की गुहार लगा रहे…
  • karnataka
    शुभम शर्मा
    हिजाब को गलत क्यों मानते हैं हिंदुत्व और पितृसत्ता? 
    28 Feb 2022
    यह विडम्बना ही है कि हिजाब का विरोध हिंदुत्ववादी ताकतों की ओर से होता है, जो खुद हर तरह की सामाजिक रूढ़ियों और संकीर्णता से चिपकी रहती हैं।
  • Chiraigaon
    विजय विनीत
    बनारस की जंग—चिरईगांव का रंज : चुनाव में कहां गुम हो गया किसानों-बाग़बानों की आय दोगुना करने का भाजपाई एजेंडा!
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के बनारस में चिरईगांव के बाग़बानों का जो रंज पांच दशक पहले था, वही आज भी है। सिर्फ चुनाव के समय ही इनका हाल-चाल लेने नेता आते हैं या फिर आम-अमरूद से लकदक बगीचों में फल खाने। आमदनी दोगुना…
  • pop and putin
    एम. के. भद्रकुमार
    पोप, पुतिन और संकटग्रस्त यूक्रेन
    28 Feb 2022
    भू-राजनीति को लेकर फ़्रांसिस की दिलचस्पी, रूसी विदेश नीति के प्रति उनकी सहानुभूति और पश्चिम की उनकी आलोचना को देखते हुए रूसी दूतावास का उनका यह दौरा एक ग़ैरमामूली प्रतीक बन जाता है।
  • MANIPUR
    शशि शेखर
    मुद्दा: महिला सशक्तिकरण मॉडल की पोल खोलता मणिपुर विधानसभा चुनाव
    28 Feb 2022
    मणिपुर की महिलाएं अपने परिवार के सामाजिक-आर्थिक शक्ति की धुरी रही हैं। खेती-किसानी से ले कर अन्य आर्थिक गतिविधियों तक में वे अपने परिवार के पुरुष सदस्य से कहीं आगे नज़र आती हैं, लेकिन राजनीति में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License