NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
दिल्ली : क्या ज़हरीली नफ़रत और भय से चुनाव जीता जा सकता है?
हताशा से भरी बीजेपी का भड़काऊ चुनाव अभियान उसके लिए उल्टा पड़ सकता है।
सुबोध वर्मा
31 Jan 2020
Translated by महेश कुमार
Delhi election

सार्वजनिक चुनाव प्रचार के कुछ ही दिनों के भीतर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार को सामान्य छींटाकशी से घातक और जहरीले अभियान की ओर मोड़ दिया है। चुनावी सभाओं और रैलियों में भाजपा के नेताओं के बयान केवल चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हैं। अगर उनके बयानों और भाषणों को पूरे संदर्भ में देखा जाए तो वे एक विशेष समुदाय के लोगों के खिलाफ खुले उकसावे की कार्यवाही है। यह एक आपराधिक मसला  तो है साथ ही विभाजनकारी विचारधारा की असली धार का सबूत भी है।

भाजपा का एक नेता भीड़ को गोली मारने के नारे लगाने के लिए उकसाता है जबकि दूसरा चेतावनी देता है कि लाखों लोग आपके घरों पर हमला कर देंगे और घर में घुस कर आपकी बेटियों के साथ बलात्कार करेंगे। दोनों का अल्पसंख्यक समुदाय की तरफ इशारा था। यह वह नंगा सच है जिसका इरादा नफ़रत है।

जैसा कि न्यूज़क्लिक ने पहले लिखा था तब जब अभियान शुरू हो रहा था कि भाजपा की हालत खराब है और अब इसका सहारा नागरिकता कानून (सीएए) और प्रस्तावित जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर), नागरिकों का रजिस्टर (एनआरसी) और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और अयोध्या मुद्दे जैसे विभाजनकारी मुद्दे रहेंगे। इन सभी मुद्दों का इस्तेमाल बहुसंख्यक समुदाय को जीतने और ध्रुवीकरण के लिए किया जाएगा। लेकिन अब लगता है कि इस तरह की रणनीति से भी दिल्ली चुनाव जीतना बहुत मुश्किल काम था। क्योंकि ऐसा लग रहा है कि पिछले कुछ दिनों में ही उनको आभास हो गया कि इन मुद्दों पर हवादार बातें पर्याप्त नहीं होगी- आपको सीधे दिल में उतरने की जरूरत होगी।

नफ़रत पैदा करने का दुस्साहस

इसलिए आम तौर पर घृणा से भरा जो अभियान व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के सर्किटों तक सीमित होता था, उसको अब खुले रूप से गैरकानूनी घृणा फैलाने और अधिक झूठ के माध्यम से भय को बढ़ाना और सच को तोड़मरोड़कर पेश करने के लिए किया जा रहा है।

यह न सिर्फ चौंकाने वाली बात है बल्कि वास्तव में देश के लिए दुखद भी है- कि खुद गृह मंत्री अमित शाह इस अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं, हालांकि ऊपर दिए गए भाषणों को उनके द्वारा नहीं बल्कि अन्य लोगों ने दिया है। लेकिन ये अन्य नेता कौन हैं? इनमें से एक हैं अनुराग ठाकुर, हिमाचल प्रदेश से संसद सदस्य हैं और वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री। दूसरे हैं परवेश वर्मा, जो दिल्ली से दो बार सांसद हैं, और पूर्व मुख्यमंत्री और दिल्ली के मजबूत नेता रहे साहिब सिंह वर्मा के बेटे हैं। भाजपा के भीतर इन दोनों नेताओ का कोई खास दम-खम नहीं हैं और शायद यही कारण है कि वे अपनी साख जमाने के लिए इस अवसर का इस्तेमाल कर रहे हैं।

मई के महीने में हुए आम चुनावों में जीत ने भाजपा और उसकी रहनुमा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या आरएसएस में यह भ्रम पैदा कर दिया कि शायद लोगों ने उन्हें हिंदू राष्ट्र स्थापित करने का जनादेश दे दिया है। और इस प्रयास में जो कुछ भी हो रहा है। इस घृणा को बढ़ाने का जो दुस्साहस किया जा रहा है उसके लिए ये घमंडी नेता जिम्मेदार होंगे।

सिर्फ चुनाव जीतने के लिए भाजपा की बेलगाम महत्वाकांक्षा ऐसी नफरती और जहरीले सार्वजनिक बयानों को जन्म दे सकती है जो देश की राजनीति को गर्त में धकेल रही है। इस तरह के बयान धार्मिक समुदायों के बीच सद्भाव को नष्ट कर सकते हैं, लड़ाई और अराजकता पैदा कर सकते हैं, यहां तक कि शायद ये रक्तपात का कारण भी बन सकते है– और यह सब सिर्फ एक चुनाव जीतने के लिए किया जा रहा है। सत्तारूढ़ पार्टी के सभी प्रमुख नेता और सभी निर्वाचित प्रतिनिधी ऐसा करने की हिम्मत इसलिए महसूस कर रहे हैं क्योंकि ऐसा करने पर उन्हे किसी प्रकार की सज़ा का डर नहीं है क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार ने इसका इंतजाम किया हुआ है। देश के लोगों को इस पर नज़र रखने की जरूरत है।

पिछले कुछ वर्षों में यह विविध तरीकों से परिलक्षित हुआ है। लिंचिंग की भीड़ के नेताओं की प्रशंसा की गई। गांधी के हत्यारे को 'राष्ट्रवादी' कहा गया और उन्हे सांसद बनाया गया या फिर उन्हे संरक्षित किया गया। राज्यों में, विभिन्न नेता बिना किसी डर के सभी प्रकार की बेबुनियादी  ख़बर और जहरीले झूठ को फैलाते रहे। एक विश्वविद्यालय के कुलपति (विश्व भारती में) खुले तौर पर कहते हैं कि संविधान अल्पसंख्यक द्वारा पारित किया गया था और इसे बदला जा सकता है। गृह मंत्री खुद अप्रवासियों को "दीमक" कहते हैं। विरोध जताने वाले लोगों पर झूठे आरोप लगाते हैं। प्रदर्शनकारियों की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है और पुलिस कहती है  कि गोली नहीं चलाई गई है। गाथा अंतहीन है…।

पूरे देश को इस पर नज़र रखने की जरूरत है - और सीखने की भी

इसलिए– अब यह चुनाव अचानक दिल्ली के विधानसभा चुनाव की तुलना में कुछ अधिक ही हो गया है। इस चुनाव में अब यह परीक्षा होगी कि क्या लोग इस मध्ययुगीन और खून की प्यासी विचारधारा के साथ जाने को तैयार हैं जो भारत को एक धर्मशासि‍त अंधकार भरे युग में वापस खींचने जा रही है। या, क्या वे इसे अस्वीकार करेंगे। जो विकल्प है– आम आदमी पार्टी (AAP) शायद आदर्श न हो लेकिन व अपनी सभी विशिष्टताओं के साथ, भाजपा को चुनौती दे रही है और इसे कड़ी टक्कर भी दे रही है। वास्तव में आम आदमी पार्टी (AAP) दिल्ली के बारे में  विभिन्न दावों और झूठ पर भाजपा को फटकारने का एक विश्वसनीय काम कर रही है। इसलिए ‘आप’ भाजपा के सांप्रदायिकता के मुद्दे से सीधे टकराने से बचने की कोशिश कर रही है क्योंकि उसे लगता है कि वह कुछ वोट खो सकती है।

लेकिन यह ‘आप’ की गलत धारणा है। क्योंकि लोग बड़े पैमाने पर लोग धार्मिक संघर्ष, दंगे, हिंसा और भय का माहौल नहीं चाहते हैं। राजनीतिक लाभ के लिए एक तबका शामिल हो सकता है। लेकिन आम लोग इसमें शामिल नहीं हैं। और, सीएए-एनआरसी के खिलाफ दिल्ली में बड़े पैमाने पर चल रहे विरोध प्रदर्शन के रूप में– जिसमें शाहीन बाग या अन्य छोटे धरने, बता रहे हैं– कि युवा वर्ग, छात्र और अन्य लोगों के बड़े वर्ग भाजपा की राजनीति से काफी नाराज़ हैं। बेशक, निष्पक्ष रूप से ‘आप’ ने सीएए-एनआरसी के खिलाफ एक औपचारिक स्टैंड लिया हुआ है।

वास्तव में, यह भाजपा के हारने का भी एक संकेत है कि वह हिंदू-मुस्लिम विभाजन की रस्साकसी पर निर्भर हो गई है। यह अपने आधार को सुरक्षित रखने के लिए छटपटा रही है। पिछले विधानसभा चुनावों में इसने कम से कम एक तिहाई वोट जीते थे। वह इसे बनाए रखना चाहती है और उम्मीद कर रही है कि कांग्रेस ‘आप’ के मतों में सेंघ लगाएगी और तीन-तरफा विभाजन होगा जो भाजपा को फायदा पहुंचाएगी।

वास्तव में यह एक मूर्खतापूर्ण उम्मीद है क्योंकि न केवल कांग्रेस को इससे कोई फायदा मिलेगा, बल्कि दिल्लीवासी ‘आप’ से इसलिए अलग नहीं होंगे कि भाजपा एक धार्मिक समुदाय के खिलाफ डर और घृणा का माहौल पैदा कर रही है। इसके विपरीत, जो लोग मोदी के न्यू इंडिया की बड़ी चर्चा और दुनिया का नेतृत्व करने की बतौलेबाजी से काफी मंत्रमुग्ध थे, अब उनका भी मोहभंग हो गया हैं। उनके भी ‘आप’  को वोट देने की संभावना है।

भाजपा ने अपना नकाब उतार दिया हैं और उसका असली चेहरा जनता के सामने आ गया है। दिल्ली में उनके लिए यह 'करो या मरो' की लड़ाई है। बाकी बचे दिनों में (8 फरवरी को चुनाव होना है) इस अभियान को तेज किया जाएगा और संभवतः आने वाला भाजपाई अभियान अधिक हताश षड्यंत्रों को जन्म देगा। लेकिन देश को इसे ध्यान से देखने की जरूरत है - यह हर जगह हो रहा है। तो, भाजपा की हार भारत और उसके लोगों के लिए एक जीत होगी। 

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Delhi Elections: Can Toxic Hate and Fear Win Elections?

BJP
RSS
Delhi Elections 2020
Amit Shah
Narendra modi
anurag thakur
Parvesh Verma
Arvind Kejriwal

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • Bharat Bandh
    विजय विनीत
    यूपी में पश्चिम से पूरब तक रही भारत बंद की धमक, नज़रबंद किए गए किसान नेता
    27 Sep 2021
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल में किसानों का आंदोलन-प्रदर्शन और चक्काजाम सुर्खियों में है। राज्य के कई इलाकों में बंद का खासा असर नज़र आया। सड़कों पर सन्नाटे के बीच किसानों का गुस्सा दिखा।…
  • modi in america
    अनिल सिन्हा
    विश्लेषण: मोदी की बेचारगी से भरी अमेरिका यात्रा
    27 Sep 2021
    भारत की कूटनीति की ऐसी पराजय पहली बार हुई है कि दुनिया के किसी देश की नज़र इस ओर नहीं है कि उसकी क्या राय है।
  • kisan andolan
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसान आंदोलन : 10 महीने बाद
    27 Sep 2021
    किसान संगठनों ने केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ मिल कर 27 सितंबर को भारत बंद का आह्वान किया है। इसके मद्देनज़र, न्यूज़क्लिक की इस वीडियो में हम बता रहे हैं कि पिछले साल 3 विवादित कृषि क़ानूनों के लागू…
  • Save Tree
    सत्यम कुमार
    'विनाशकारी विकास' के ख़िलाफ़ खड़ा हो रहा है देहरादून, पेड़ों के बचाने के लिए सड़क पर उतरे लोग
    27 Sep 2021
    हरिद्वार रोड स्थित जोगीवाला से पेसिफिक गोल्फ सिटी तक, मसूरी जाने वाले पर्यटकों के लिए एक वैकल्पिक मार्ग तैयार किया जा रहा है। इस काम के लिए सड़क के दोनों ओर खड़े 30 साल से भी अधिक पुराने 2200 पेड़ों को…
  • ILO
    दित्सा भट्टाचार्य
    आईएलओ: दुनिया के सिर्फ आधे कर्मियों के पास ही उनकी शिक्षा के मुताबिक नौकरियां उपलब्ध 
    27 Sep 2021
    उच्च एवं उच्च-मध्यम-आय वाले देशों में सभी रोजगारशुदा लोगों में से करीब 20% लोग उद्योग की जरूरत से कहीं ज्यादा शिक्षित हैं। निम्न-मध्यम-आय के देशों के लिए इस अनुपात में हिस्सेदारी करीब 12.5% है, जबकि…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License