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ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल मॉडल ऑफ़ गवर्नेंस से लेकर पंजाब के नए राजनीतिक युग तक
हर हफ़्ते की महत्वपूर्ण ख़बरों और उनके पीछे की मंशाओं को समझाने के लिए “ख़बरों के आगे पीछे” लेकर एकबार फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन
अनिल जैन
13 Mar 2022
Aap
दिल्ली के CM अरविंद केजरीवाल, दिल्ली के डिप्टी CM मनीष सिसोदिया और पंजाब के होने वाले नए मुख्यमंत्री भगवंत मान

आम आदमी पार्टी ने अभी तक दिल्ली के बाहर जहां कहीं भी चुनाव लड़ा है तो उसने अपने प्रचार में गवर्नेंस के 'दिल्ली मॉडल’ की चर्चा की है। पंजाब के विधानसभा चुनाव में भी उसने ऐसा ही किया। लेकिन पंजाब में मिली भारी भरकम जीत के बाद उसके नेताओं के सुर एकाएक बदल गए हैं। उन्होंने कहना शुरू कर दिया है कि जनता ने 'केजरीवाल मॉडल ऑफ गवर्नेंस’ को चुना है और पूरे देश में शासन का यह मॉडल पहुंच गया है। इससे पहले जब नरेंद्र मोदी गुजरात से निकल कर देश का चुनाव लड़ने उतरे थे तब उन्होंने पूरे देश को 'गुजरात मॉडल’ दिखाया था। तब भाजपा की ओर से किसी ने भी 'मोदी मॉडल ऑफ गवर्नेंस’ नहीं कहा था। जिस तरह गुजरात मॉडल की चर्चा हुई, उसी तरह दिल्ली मॉडल की चर्चा हो रही थी। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं ने इसे 'केजरीवाल मॉडल’ कहना शुरू कर दिया है। मतगणना के शुरुआती रूझानों के तुरंत बाद ही दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि यह 'केजरीवाल मॉडल ऑफ गवर्नेंस’ की जीत है। इसके थोड़ी देर बाद ही पंजाब के पार्टी प्रभारी राघव चड्ढा ने भी यही लाइन दोहराई। सो, अब दिल्ली मॉडल का नाम 'केजरीवाल मॉडल’ है, जिसे आम आदमी पार्टी इस साल के अंत में होने वाले दो राज्यों- गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भुनाएगी। मुफ्त बिजली-पानी, बच्चों की पढ़ाई, महिलाओं की कमाई, गरीब को राशन और सबकी सेहत का ख्याल यह इस मॉडल की खूबी बताई जा रही है। जिस तरह से बिहार में नीतीश कुमार ने न्याय के साथ विकास की बात कही थी, भले ही विकास हुआ नहीं, उसी तरह केजरीवाल मॉडल के तहत भी न्याय के साथ विकास की बात हो रही है।

मोदी किन देशों को भारत से बड़ा मानते हैं? 

दुनिया में आबादी के लिहाज से भारत दुनिया का दूसरा और अर्थव्यवस्था के हिसाब से दुनिया का पांचवां या छठा सबसे बड़ा देश है। भौगोलिक रूप से भारत दुनिया में सातवां नंबर है। यानी भारत खुद दूसरे से सातवें स्थान का सबसे बड़ा देश है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान करते हुए कहते हैं कि ''बड़े बड़े देश भी वह काम नहीं कर सके जो हमारी सरकार ने कर दिया।’’ और उसके बाद उनकी पार्टी के नेता और सरकार के मंत्री इसे दोहराने लगते हैं। यही नहीं, दरबारी मीडिया भी बगैर सोचे समझे यह बेसुरा राग अलापने लगती है। फिर सोशल मीडिया में और आम लोगों के बीच भी कहा जाने लगता है कि बड़े बड़े देश जो नहीं कर सके वह मोदीजी ने कर दिया। प्रधानमंत्री ने इस तरह का ताजा बयान यूक्रेन से भारतीय नागरिकों और छात्रों को निकालने के मामले में दिया। उन्होंने पिछले सप्ताह पुणे में एक कार्यक्रम में कहा कि यूक्रेन से भारतीय छात्रों को निकालने में भारत ने वह कर दिखाया है, जो बड़े बड़े देश भी नहीं कर सकते। इससे पहले कोरोना प्रबंधन और वैक्सीनेशन के मामले में भी यह बात कई बार कही गई। और भी अनगिनत मामले हैं, जिसमें बिना किसी स्पष्ट संदर्भ के प्रधानमंत्री 'बड़े बड़े देशों’ की बात करते हैं। सवाल है कि 'बड़े बड़े देशों’ से उनका क्या मतलब है? प्रधानमंत्री किन देशों को को भारत से बडा मानते हैं? क्या यूक्रेन में अमेरिका, चीन, फ्रांस, जापान, जर्मनी के छात्र फंसे थे, जिन्हें वे नहीं निकाल पा रहे थे और भारत ने अपने छात्रों को निकाल लिया? यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्र वीडियो बना कर बताते रहे कि मिस्र और नाइजीरिया की सरकार विमान भेज कर अपने छात्रों को निकाल रही है! जाहिर है मिस्र, नाइजीरिया जैसे देशों के छात्र यूक्रेन मे फंसे थे। तो क्या प्रधानमंत्री मिस्र और नाइजीरिया को ही 'बड़े बड़े देश’ कह रहे थे? असल में भारत खुद ही एक बड़ा देश है। लेकिन अपने समर्थकों के बरगलाए रखने के लिए प्रधानमंत्री देश को छोटा और खुद को बहुत बड़ा बनाते है ताकि यह नैरेटिव बनाया जा सके कि भारत तो कुछ नहीं है, मैंने बड़े बड़े देशों के मुकाबले बेहतर काम कर दिया।

पंजाब में शुरू हुआ राजनीति का नया युग

वैसे तो हर राज्य में हर चुनाव के बाद राजनीति बदलती है। लेकिन पंजाब में बिल्कुल अलग तरह की राजनीति शुरू होती दिख रही है। इस सरहदी सूबे की पूरी राजनीति वैसे ही बदल रही है, जैसे दिल्ली की बदली। दिल्ली में 2013 में आम आदमी पार्टी अपने पहले ही चुनाव में दूसरे स्थान पर रही थी। तब तक भाजपा और कांग्रेस के नेताओं को संभावना दिख रही थी। लेकिन 2015 में आम आदमी पार्टी 70 में से 67 सीटों पर जीती और उसके साथ ही कांग्रेस और भाजपा के नेताओं की एक पूरी पीढ़ी खत्म हो गई। उसी तरह पंजाब में पिछले चुनाव में अकाली दल को तीसरे स्थान पर धकेल कर आम आदमी पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी लेकिन इस बार 117 में से 92 सीटें जीत कर उसने नया रिकार्ड बनाया है और इसके साथ ही पंजाब के नेताओं की एक पूरी पीढ़ी का करियर लगभग खत्म हो गया। अकाली दल के संस्थापक प्रकाश सिंह बादल 94 साल की उम्र में भी चुनाव लड़े लेकिन हार गए। उनके बेटे और अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी इस चुनाव में जीत नहीं सके। अपने को मुख्यमंत्री का स्वाभाविक दावेदार मानने वाले प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू भी आम आदमी पार्टी की लहर में जीत नहीं सके।

बिना काम के तीन विदेश राज्य मंत्री!

पिछले दिनों विदेश राज्यमंत्री मीनाक्षी लेखी की दो तस्वीरें और वीडियो खूब चर्चा में रहे। एक तस्वीर और वीडियो दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का है, जहां वे निकास गेट पर यूक्रेन से लौटे भारतीय छात्रों के स्वागत के लिए हाथ में फूल लेकर खड़ी हैं और छात्र उनको बिल्कुल तवज्जो नहीं दे रहे हैं। हालांकि यह उनकी शराफत और समझदारी थी कि वे दूसरे मंत्रियों की तरह विमान में नहीं घुसीं। बहरहाल, दूसरी तस्वीर उन्होंने खुद अपने सोशल मीडिया में डाली, जिसमें वे कोयंबटूर में विवादित 'आध्यात्मिक गुरू’ जग्गी वासुदेव के साथ खड़ी हैं। उन्होंने बड़े गर्व के साथ बताया कि वे यहां आई और उनको सद्गुरू से मिल कर बहुत अच्छा लगा है। हैरानी की बात है कि जिस समय रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के चलते दुनिया संकट में है और यूक्रेन से भारतीयों को निकालने का अभियान खत्म भी नहीं हुआ था लेकिन उससे पहले एक विदेश राज्यमंत्री कोयंबटूर में किसी बाबाजी के आश्रम में थीं। ऐसा नहीं कि विदेश राज्यमंत्रियों में अकेले मीनाक्षी लेखी ही नदारद रहीं। बाकी दो विदेश राज्यमंत्रियों- वी. मुरलीधरन और राजकुमार रंजन सिंह का भी कुछ अता-पता नहीं था। गौरतलब है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर के मातहत तीन-तीन राज्यमंत्री हैं लेकिन यूक्रेन मे फंसे भारतीयों को वहां से निकालने का मौका आया तो प्रधानमंत्री ने इस काम में अपने विदेश राज्यमंत्रियों को लगाने के बजाय विमानन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, कानून मंत्री कीरेन रिजीजू, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और सड़क परिवहन राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह को यूक्रेन के पड़ोसी देशों में भेजा। 

कांग्रेस से नाराज हैं सीताराम येचुरी

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी यानी सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के बीच वैसे तो बहुत अच्छे रिश्ते हैं। दोनों के बीच सीधा संवाद होता है और जानकार बताते हैं आपसी बातचीत में भी राहुल हमेशा येचुरी को बॉस कह कर संबोधित करते हैं। येचुरी के कारण ही पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वाम मोर्चा का तालमेल हुआ। इसीलिए जब येचुरी के कांग्रेस से नाराज होने की खबर आई तो सभी लोग हैरान हुए। सवाल है कि येचुरी क्यों नाराज हैं? क्या सिर्फ इसलिए कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा चुनाव के दौरान मंदिरों में जाते रहे या हिंदू धर्म की मान्यताओं से अपना जुड़ाव दिखाते रहे या कुछ और कारण है? येचुरी ने कहा है कि कांग्रेस हिंदुत्व की मान्यताओं की ओर रूझान दिखा रही है और इसलिए वह भाजपा के फासिस्ट एजेंडे से नहीं लड़ सकती। लेकिन सिर्फ यही बात उनकी नाराजगी का कारण नहीं है। असली कारण यह है कि केरल में कांग्रेस ऐसी राजनीति कर रही है, जिससे भाजपा को फायदा हो रहा है। यह भी आरोप लग रहे हैं कि कांग्रेस और भाजपा मिल कर वाम मोर्चा की सरकार को कमजोर करने की राजनीति कर रहे हैं। हालांकि इसमें सच्चाई की संभावना बहुत कम है, क्योंकि राहुल गांधी की कमान में कांग्रेस ऐसी कोई राजनीति नहीं कर सकती है, जिससे भाजपा से करीबी जाहिर हो। फिर भी ऐसा लग रहा है कि केरल के सीपीएम नेताओं ने येचुरी को इस बारे में बढ़ा-चढ़ा कर बताया है। इसके बाद ही उन्होंने कांग्रेस को विचाराधारात्मक रूप से कमजोर बताया और कहा कि उसकी सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति भाजपा को मजबूत करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि मजबूत वाम मोर्चा ही विपक्ष की राजनीति को आधार दे सकता है। यानी इस बहाने उन्होंने एक तीसरे मोर्चे की बात भी कह दी।

पूर्वोत्तर की राजनीति में कोनरेड का कद बढ़ा

आने वाले दिनों में पूर्वोत्तर की राजनीति बदलेगी। मणिपुर मे कोनरेड संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी एनपीपी ने कमाल का प्रदर्शन किया है। पिछली बार उनकी पार्टी को चार सीटें मिली थीं, जो इस बार दोगुने से ज्यादा हो गई हैं। मेघालय में उनकी पार्टी की सरकार है और अरुणाचल प्रदेश में भी उनकी पार्टी के चार विधायक है। इस तरह तीन राज्यों में पहले, दूसरे और तीसरे नंबर की सबसे बड़ी पार्टी है। वे इन तीन राज्यों के दम पर एनपीपी को राष्ट्रीय पार्टी बना सकते हैं। अगर एनपीपी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज़ा मिलता है तो वह सबसे कम समय में राष्ट्रीय दर्ज़ा हासिल करने वाली पार्टी बन जाएगी। इन तीन राज्यों के बाद उनकी पार्टी का विस्तार पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में भी संभव है। तभी माना जा रहा है कि पूर्वोत्तर मे उनका कद असम के मुख्यममंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की तरह बढ़ सकता है। हिमंता सरमा की राजनीति भाजपा के दम पर है, जबकि कोनरेड की अपनी राजनीति है। उनके पिता पीए संगमा जो नही कर सके, वह कोनरेड ने कर दिया है। हाल के दिनों में एक नया घटनाक्रम यह भी हुआ है कि मणिपुर में दूसरे और आखिरी चरण के मतदान से ठीक पहले संगमा की मेघालय सरकार ने केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई को दी गई 'जनरल कंसेट’ वापस ले ली। इससे पहले कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों की आठ राज्य सरकारें सीबीआई से 'जनरल कंसेट’ वापस ले चुकी हैं। यही नहीं, संगमा ने चुनाव के दौरान सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून यानी अफस्पा का विरोध करके भी भविष्य में भाजपा विरोधी राजनीति का संकेत दिया है। 

धरी रह गईं कांग्रेस की तैयारियां 

कांग्रेस पार्टी ने इस बार तीन राज्यों- उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के लिए बड़ी तैयारी की थीं। पिछली बार से सबक लेकर इस बार पार्टी ने पहले ही बड़े-बड़े नेताओं को इन राज्यों में तैनात किया था। लेकिन उसकी सारी तैयारी धरी रह गईं। कांग्रेस के नेता ही कह रहे हैं कि अगर पार्टी ने ऐसी ही तैयारी पिछले चुनाव में की होती तो गोवा और मणिपुर दोनों जगह उसकी सरकार बनती। लेकिन तब कांग्रेस आंख बंद किए रही। जब नतीजे आने लगे और लगा कि कांग्रेस को प्रबंधन की जरूरत है तब नेता दौड़ाए गए, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। उससे सबक लेकर इस बार कांग्रेस ने पहले से तैयारी की। गोवा में पी चिदंबरम के साथ डीके शिवकुमार को लगाया। उत्तराखंड में भूपेश बघेल के साथ दीपेंदर हुड्डा को भेजा गया। उधर मणिपुर में जयराम रमेश पहले से बैठे थे और उनकी मदद के लिए मुकुल वासनिक और विन्सेंट पाला को भेजा गया। कांग्रेस ने विशेष विमान और हेलीकॉप्टर तैयार रखे थे, ताकि जरूरत पड़ने पर विधायकों को हटाया जाए। गोवा में तो कांग्रेस ने पहले ही अपने उम्मीदवारों को दो अलग-अलग होटलों में बंद कर दिया था। लेकिन ये सारी तैयारियां धरी रह गईं, क्योंकि कहीं भी न कांग्रेस की सरकार बनाने की नौबत आई और न किसी को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस के विधायकों की जरूरत पड़ी। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।)

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