NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
हिमाचल प्रदेश: स्थानीय निकाय चुनाव और चुनावी प्रक्रियाओं पर उठते सवाल
हिमाचल में हाल ही में हुए चुनावों में जो परेशान कर देने वाली एक प्रवृत्ति दिखाई दी है,वह है इन चुनावों में धन और संसाधनों का व्यापक इस्तेमाल। राज्य चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की अपनी भूमिका निभाने से पूरी तरह चूंका हुआ दिखा।
टिकेंदर सिंह पंवार
17 Feb 2021
Election
प्रतीकात्मक फ़ोटो

कुछ हफ़्ते पहले कुछ इलाक़ों को छोड़कर हिमाचल प्रदेश के शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों के स्थानीय निकायों के चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हो गये। जहां शहरी केंद्रों में नगरपालिका वार्ड पार्षद चुने गये थे, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत,खंड विकास परिषदों और ज़िला परिषदों (ज़िला विकास परिषदों) के लिए त्रिस्तरीय चुनाव हुआ था। हज़ारों उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा और तक़रीबन दो महीने तक राज्य उबलते हुए चुनावी पारे की ज़द में रहा।

ये चुनाव पार्टी सिंबल पर नहीं हुए थे, हालांकि ज़िला परिषद सदस्यों के लिए प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने आधिकारिक उम्मीदवारों की घोषणा ज़रूर की थी। हालांकि, इन चुनावों में बड़ी संख्या में स्वतंत्र उम्मीदवारों की जीत हुई थी। ऐसी दो अहम बातें हैं, जिस वजह से भविष्य में एक स्वस्थ स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर चर्चा और संकल्प की ज़रूरत है।

पहली बात तो यह कि ये चुनाव हालांकि पार्टी सिंबल पर नहीं लड़े गये थे, लेकिन जैसे ही नतीजे की घोषणा हुई, उसके बाद राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी-भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, दोनों के लिए यह एक पार्टी फ़ोरम बन गया। संपूर्ण राज्य मशीनरी का इस्तेमाल यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया कि निर्वाचित सदस्य, ख़ास तौर पर विकास परिषद के सदस्य और ज़िला परिषद सदस्य, या तो सत्ताधारी दल में चले गये या फिर उन्होंने भाजपा के आधिकारिक अध्यक्षों का समर्थन कर दिया।

यह स्थिति पूरी तरह से उस पृष्ठभूमि और उस संदर्भ से उलट है, जिसमें ये चुनाव लड़े गये थे। ‘स्थानीय’ शब्द के मायने भले ही सीमित क्षेत्र के लिए होता हो, मगर स्थानीय निकायों के इन चुनावों में 'स्थानीय' जैसा कुछ भी नहीं था, बल्कि इसकी कमान राज्य के सत्ता केंद्र से संचालित हो रही थी। यह हक़ीक़त है कि राज्य में तक़रीबन 70% निर्वाचित ज़िला परिषद सदस्य भाजपा से नहीं हैं, इसके बावजूद इस समय सत्तारूढ़ पार्टी उस शिमला को छोड़कर ज़्यादातर ज़िलों में चेयरपर्सन का पद हासिल करने में कामयाब रही, जहां तीन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) समर्थित सदस्यों ने चेयरपर्सन चुने जाने को लेकर कांग्रेस के पक्ष में अपना समर्थन दे दिया।

इस पृष्ठभूमि में यह बात अहम हो जाती है कि स्थानीय निकायों के ये चुनाव पार्टी सिंबल पर हों। इससे दोहरे उद्देश्य पूरे होंगे। सबसे पहली बात तो निर्वाचित सदस्यों की ख़रीद-फ़रोख़्त और उन्हें डराना-धमकाना कम हो जायेगा और जनादेश उस शख़्स और पार्टी दोनों के लिए होगा, जो प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। दूसरी बात कि प्रदर्शन में निरंतरता रह सकेगी। इसका मतलब यह है कि एक बार चुन लिये गये शख़्स पर निरंतर प्रदर्शन किये जाने का दबाव होगा, भले ही वह अगले चुनावी लड़ाई से बाहर हो जाये। निर्वाचित प्रतिनिधियों पर ज़िम्मेदारी का दबाव होगा।

दूसरा मामला, जो इन चुनावों में बहुत परेशान करने वाला रहा, वह था-धन और संसाधनों का व्यापक इस्तेमाल। राज्य चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित कराने की अपनी भूमिका पूरी तरह निभाता नहीं नज़र आया। चुनावी मैदान में उतरे किसी भी उम्मीदवार को बखेड़ा खड़ा करने के लिए एक भी नोटिस नहीं थमाया गया।

इस हक़ीक़त के बावजूद धन और धामों (समुदायिक भोज) का बेहिचक इस्तेमाल पूरे राज्य में किया गया कि इन चुनावी अवधि के दौरान विभिन्न इलाक़ों में कोविड-19 महामारी अपने चरम पर थी, लेकिन ये धाम हर समय राज्य के हर गली-मोहल्लों में चलते रहे।

ज़िला परिषद में हर एक उम्मीदवार की तरफ़ से ख़र्च करने की सीमायें 1 लाख रुपये, नगरपालिका परिषद में 75,000 रुपये और नगर पंचायत में 50,000 रुपये हैं। हालांकि, इन चुनावों में इन सीमाओं की धज्जियां उड़ा दी गयीं। ज़िला परिषद के कुछ वार्डों में तो कुछ उम्मीदवारों की तरफ़ से ख़र्च किये गयी रक़म 1 करोड़ रुपये तक थी,यह रक़म तय शुदा राशि सीमा से 100 गुनी ज़्यादा है। इसी तरह, ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल के सदस्यों के लिए चुनाव लड़ने की यह राशि 15 लाख रुपये से ज़्यादा हो गयी।

अगर भविष्य में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में इस तौर-तरीक़े को नहीं रोका गया, तो इस तरह के एक ग़लत चलन से दो अहम मसले पेश आयेंगे। सबसे पहले तो लोकतंत्र की वैकल्पिक गुंज़ाइश, जिसे आम लोग भागीदारी प्रक्रिया के ज़रिये पटरी पर ला सकते हैं,उसकी संभावना सिकुड़ जायेगी और उन्हें महसूस होगा कि इस तरह की भागीदारी उनकी कल्पना और संभावना से परे है। जैसा कि राज्य और संसदीय चुनावों में भी देखा जाता है कि इससे लोगों की बुनियादी राजनीतिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अलगाव बढ़ जाता है।

दूसरी बात कि इन चुनावों और जीतने वालों के बीच प्रदर्शन और ज़िम्मेदारी को लेकर साठ-गांठ हो जाता है। इस लिहाज़ से उनकी जीत के पीछे सिर्फ़ लोगों की इच्छा नहीं रह जाती, बल्कि जीत को पक्का करने के लिए वे ढेर सारे पैसों वाली चुनावी प्रक्रिया का भी प्रबंधन करते हैं। जैसा कि पिछले काफ़ी समय से देखा जा रहा है कि ये नेता सरकारी ठेकों के सबसे बड़े लाभार्थियों में से होते हैं और इस प्रकार, एक निर्वाचित प्रतिनिधि और राज्य के कर्मचारियों का एक गठजोड़ बन जाता है।

लोगों को इस गठजोड़ को तोड़ना होगा और चुनावों की निगरानी और ज़िम्मेदारी तय करने की ख़ुद की वैकल्पिक रणनीति बनानी होगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि राज्य चुनाव आयोग सहित राज्य की मशीनरी निष्क्रिय साबित हो रहे हैं।

इस हालात से निजात पाने के जो तरीक़े मन में आते हैं, उनमें से एक तरीक़ा तो वही है, जिसे किन्नौर के एक आदिवासी ज़िले में रहते हुए मैंने सीखा-समझा है और वह है-मुदायिक भागीदारी। किन्नौर के गांवों में चुनाव की तरह वहां के लोगों के बीच व्यक्तिगत सामर्थ्य को किनारे रखते हुए क़र्ज़ लेकर भी शादी पर ख़र्चे को लेकर अपने पड़ोसियों से होड़ लगी रहती है। ऐसे क़िस्से हर तरफ़ मिल जाते हैं कि अगर किसी पड़ोसी ने 20 बकरों की बली चढ़ायी है, तो दूसरा शादी में 30 बकरे की बली चढ़ायेगा और निश्चित रूप से शराब पर किए जाने वाले ख़र्च के मामले में भी इसी तरह की होड़ दिखती है। हालांकि, जगारूक लोगों ने इस स्थिति से मुक़ाबला करने का बीड़ा उठाया और फ़ैसला  किया कि गांव में किन्नौरी विवाह में जितना ज़रूरी ख़र्च होगा, उतना ही ख़र्च किया जायेगा और इससे ज़्यादा ख़र्च करने वाले को दंडित किया जायेगा। इस तरह के उठाये गये क़दम से निश्चित ही माहौल में बदलाव आया है।

लेकिन, सवाल है कि इस तरह के हस्तक्षेप से चुनाव कराने की उस वाजिब क़वायद में वह मदद मिल पायेगी, जिससे कि सभी को एक समान चुनावी लड़ाई का अवसर मिल सके; यह तो एक इच्छा है, लेकिन हमारे अपने सुरक्षित और बेहतर लोकतांत्रिक माहौल के लिए इस इच्छा को हासिल किया जाना चाहिए।

(लेखक शिमला के पूर्व डिप्टी मेयर हैं। इनके विचार निजी हैं।)

Himachal Pradesh
CPIM
State Election Commissions

Related Stories

बीरभूम नरसंहार ने तृणमूल की ख़ामियों को किया उजागर 

सवर्ण आयोग: शोषणकारी व्यवस्था को ठोस रूप से संस्थागत बनाने का नया शिगूफ़ा

बंगाल चुनाव : क्या चुनावी नतीजे स्पष्ट बहुमत की 44 साल पुरानी परंपरा को तोड़ पाएंगे?

वामपंथ, मीडिया उदासीनता और उभरता सोशल मीडिया

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव: एआईएडीएमके और डीएमके गठबंधन और सीटों की हिस्सेदारी पर समझौतों के क्या मायने हैं

पश्चिम बंगाल में जाति और धार्मिक पहचान की राजनीति को हवा देती भाजपा, टीएमसी

स्मृतिशेष: गणेश शंकर विद्यार्थी एक प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट

हिमाचल प्रदेश की बल्ह घाटी को क्यों हवाई अड्डे के लिए अधिग्रहित नहीं किया जाना चाहिए?

बिहार चुनाव: पॉलिटिक्स की रिवर्स स्विंग में फिर धराशायी हुए जनता के सवाल

चुनाव 2019 : क्या इस बार रोज़गार और पलायन जैसे मुद्दे तय करेंगे बिहार का भविष्य


बाकी खबरें

  • global
    संदीपन तालुकदार
    मौसम परिवर्तन: वैश्विक कार्बन उत्सर्जन पूर्व महामारी स्तर पर पहुंचने के करीब
    06 Nov 2021
    एक रिपोर्ट बताती है कि इस साल कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में 4.9 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा होगा। इससे 2020 में महामारी के दौरान उत्सर्जन में आई 5.4 फ़ीसदी की कमी वापस अपने पुराने स्तर पर पहुंच जाएगी। 
  • Moscow
    एम. के. भद्रकुमार
    भारत ने खेला रूसी कार्ड
    06 Nov 2021
    पुतिन की दिल्ली यात्रा से कुछ हफ्ते पहले इस महीने के अंत में मास्को में रूसी-भारतीय "2+2" मंत्रिस्तरीय की पहली बैठक घटनापूर्ण या महत्वपूर्ण होने वाली है क्योंकि यह वाशिंगटन में मंत्रिस्तरीय यूएस-…
  • Dalit-Adivasi education
    राज वाल्मीकि
    महामारी से कितनी प्रभावित हुई दलित-आदिवासी शिक्षा?
    06 Nov 2021
    हाल ही में नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स  ने दलित आदिवासियों की शिक्षा पर एक अध्ययन किया। इस अध्ययन में अपेक्षा से अधिक दुखद तथ्य सामने आए हैं।
  • lakshwdeep
    अयस्कांत दास
    भारत में सबसे कम जेल में रहने की दर होने के बावजूद लक्षद्वीप को पांचवीं जेल की आवश्यकता क्यों है?
    06 Nov 2021
    पूरे देश में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की तुलना में लक्षद्वीप में जेल में रह रहे कैदियों की तादाद सबसे कम 6 फीसदी है। इसकी तुलना में दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश में जेल अधिभोग दर क्रमशः 174.9…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 10,929 नए मामले, 392 मरीज़ों की मौत
    06 Nov 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.43 फ़ीसदी यानी 1 लाख 46 हज़ार 950 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License