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भारत कबतक रंगभेद से इंकार करता रहेगा?
डैरेन सैमी ने भारत में नस्ल के आधार पर ख़ुद के साथ हुए भेदभाव का खुलासा ऐसे वक़्त में किया है, जिस समय दुनिया नस्लवाद से जूझ रही है। भारत को इस लड़ाई में शामिल होने की ज़रूरत है।
सुभाष गाताडे
18 Jun 2020
डैरेन सैमी

वेस्टइंडीज के प्रसिद्ध ऑलराउंडर डेरेन सैमी एक मशहूर शख़्सियत हैं। उन्होंने अपने देश की टीम का नेतृत्व किया है और 2012 और 2016 में दो T-20 विश्व कप जीताने वाले एकमात्र कप्तान हैं। क्रिकेट के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियां उनके देश तक ही सीमित नहीं हैं। बल्कि उन्होंने पाकिस्तान की क्रिकेट टीम को पुनर्जीवित करने और उसे अंतर्राष्ट्रीय मैचों के लिए तैयार करने में एक ग़ज़ब की भूमिका निभायी थी, जिस वजह से उन्हें पाकिस्तान की मानद नागरिकता हासिल हुई।

लेकिन, उन्होंने इस बात का ख़ुलासा करके सबको एकबारगी चौंका दिया है कि 2013 और 2014 में भारत दौरे पर आईपीएल मैच खेलने के दौरान उनकी अपनी ही टीम के साथियों ने उनपर नस्लीय टिप्पणी की थी। उनके प्रशंसक स्वाभाविक रूप से उनके इस ख़ुलासे से भौंचक रह गये हैं। सैमी ने इस बात का ख़ुलासा किया है कि सनराइज़र्स हैदराबाद के उनके साथी सामूहिक रूप से उनके साथ एक अपमानजनक शब्द से उन्हें संबोधित किया करते थे।

सैमी ने कहा है कि कुछ मौक़ों पर तो उन्होंने भी अपने ख़ुशमिजाज़ साथियों की उस टिप्पणी पर मुस्कुरा दिया था, क्योंकि उन्होंने इसे सहज रूप से लिया था और माना था कि यह कोई हल्का-फुल्का मज़ाक था, हालांकि इस मज़ाक के निशाने पर वे ख़ुद थे। लेकिन, सैमी इस सच्चाई से पूरी तरह से बेख़बर थे कि वे उन्हें एक नस्लवादी व्यंगात्मक शब्द से निशाना बना रहे थे और उस "मज़ाक" का इस तरह मज़ा ले रहे थे, जैसे कि वह समझ नहीं पा रहे हों।

इसमें कोई शक नहीं कि जिन लोगों ने उन्हें अपमानित किया था, वे भारतीय क्रिकेट में बड़े नाम थे। हालांकि जब सैमी ने इंस्टाग्राम पोस्ट के ज़रिये इस सच्चाई को दुनिया के सामने रखा, तो भी इस बात से भारत में किसी तरह का कोई हो-हल्ला नहीं हुआ। जिन 24/7 समाचार चैनलों को हमेशा सनसनीखेज ख़बरों की खोज रहती है, उन  चैनलों के साथ-साथ क्रिकेट बिरादरी के कान पर भी इस बात को लेकर कोई जूं नहीं रेंगी। सैमी के उस अपमान की निंदा करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया, और न ही अपमान करने वालों की तरफ़ से कोई सार्वजनिक माफ़ी ही मांगी गयी। केवल सामाजिक मुद्दों पर खुलकर बोलने वाली अभिनेत्री, स्वरा भास्कर ने सैमी के टीम-साथियों से सैमी से माफ़ी की मांग की।

अब ज़रा सोचिए कि क्या विराट कोहली ने अगर किसी दूसरे देश में इसी तरह के नस्लवादी हमले का सामना किया होता, तो क्या होता। क्या भारतीय क्रिकेट बिरादरी और मीडिया ने इसी तरह का मौन साध लिया होता?  ऐसा बहुत हद तक मुमकिन नहीं था।

सच्चाई तो यही है कि भारत में सैमी को नस्लीय रूप से निशाना बनाया गया था, सैमी पर साधा गया निशाना महज संयोग नहीं था। दरअस्ल हुआ यों कि सैमी लोकप्रिय अमेरिकी स्टैंडअप कलाकार, हसन मिन्हाज को टीवी पर देख रहे थे, जो अपने लोकप्रिय शो में ब्लैक लाइव्स मैटर (बीएलएम) नामक विरोध अभियान पर बात कर रहे थे। मिनहाज नस्लवाद की उन शक्लों को लेकर बात कर रहे थे, जो दुनिया भर में सामने आती रहते हैं, मिनहाज ने उन शब्दों का भी ज़िक़्र किया, जो सैमी ने अपने साथियों को कहते सुना था। "जब मुझे उस ख़ास शब्द का मतलब पता चला...तो तुरन्त मुझे याद आया कि जब मैं सनराइज़र्स हैदराबाद के साथ खेल रहा था, तो मुझे ठीक यही शब्द तो कहा जा रहा था, जो हम काले लोगों के लिए अपमानजनक है।"

भले ही सैमी के सामने उस अपमानजनक शब्द का मतलब उजागर हो गया हो, लेकिन इसके बावजूद सैमी ने अपने उन साथियों के नाम का ख़ुलासा नहीं किया है, जिन्होंने उनके लिए उस अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा कि इसके बजाय उन्होंने उनमें से एक साथी के साथ बात करने की कशिश की है, जिन्होंने उनके लिए अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल किया था। “मुझे यह कहते हुए ख़ुशी हो रही है कि मैंने उन साथियों में से एक के साथ दिलचस्प बातचीत की है और हमारी नज़र नकारात्मक तरीक़ों पर अपना ध्यान दिये जाने के बजाय लोगों को इस बारे में शिक्षित करने के तरीक़े पर है। मेरे भाई ने मुझे इस बात भरोसा दिलाया है कि उसके दिलों में मेरे लिए बेशुमार प्यार है और मैं इस बात पर यक़ीन करता हूं।”

[उल्लेखनीय है कि ईशांत शर्मा की एक पुराने इंस्टाग्राम पोस्ट में उन्होंने कैप्शन में सैमी के लिए उसी अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल किया था, जो उसी समय सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था,जिस समय इस बात का ख़ुलासा किया गया था।]

सैमी की यह सच्चाई इतिहास के एक अहम पल में सामने आयी है। पश्चिमी दुनिया हाल ही में नस्लवाद के अभूतपूर्व प्रतिरोध से भड़क उठी है। पिछले महीने अमेरिका में नस्लवाद के ख़िलाफ़ शुरू होने वाले विरोध अभियान, ‘ब्लैक लाइव्स मैटर (बीएलएम)’ में श्वेत लोगों की भी काफी हद तक भागीदारी है। ऐसा लगता है कि इस आंदोलन ने पश्चिम में नस्लवाद की वैधता को हिलाकर रख दिया है। जिस तरह इस आंदोलन में जाने-माने लोग शामिल हो रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि अमेरिकियों और अन्य लोगों के बीच आत्म-मूल्यांकन शुरू हो गया है। लोग मज़बूत नस्लवाद की मौजूदगी को लेकर सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांग रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट रेडिट के सह-संस्थापक, एलेक्सिस ओहानियन ने निदेशक मंडल से इस्तीफ़ा दे दिया है, उन्होंने इस बात का आग्रह किया है कि "उनकी जगह किसी काले उम्मीदवार को नियुक्त किया जाय" और रेडिट स्टॉक से "ब्लैक समुदाय की इस सेवा" के लिए भविष्य में प्रत्यक्ष लाभ का भरोसा दिलाया है।

निश्चित रूप से भारत के नागरिक, चाहे वह कुलीन हो या कुछ और, ये लोग इस तरह के आत्मान्वेषण नहीं कर पाते हैं। जिस समय अमेरिका में जॉर्ज फ़्लॉयड को दफ़नाया जा रहा था, उसी समय सैमी को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला वह नस्लवादी शब्द भारत में वायरल हो रहा था। इसी से स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय कुलीन वर्ग अपने पीछ रंगभेद को किस तरह देखते हैं। यहां रंगभेद का सिर्फ़ एक ही आधार नहीं है,बल्कि भारत में रंग, जाति, समुदाय और बहुत कुछ के आधार पर कई तरह के रंगभेद मौजूद हैं। यही वजह है कि शायद ही किसी को इस बात को लेकर पछतावा महसूस हो पाया या ग़लत करने वाले क्रिकेटरों की निंदा की गयी। इसके बजाय, लोगों ने नस्लवादियों की ओर से ही लट्ठ उठा लिया और इस तरह, सैमी को फिर से निशाना बनाया गया।

जॉर्ज फ़्लॉयड कांड के इस समय ने ख़ासकर भारत में रंग को लेकर पूर्वाग्रह की गहरी जड़ों से बंधे और चटकारे लेने वाले वर्गों के पाखंड को खोलकर रख दिया है। इसके बाद तो इस बात में किसी तरह का कोई शक नहीं रह जाना चाहिए कि श्रेणीबद्ध पदानुक्रम पर आधारित अनुष्ठानिक उत्पीड़न की भारत में व्यापक स्वीकृति और वैधता है।

जब संयुक्त राज्य अमेरिका में रह रही प्रियंका चोपड़ा जोनस जैसी अभिनेत्री ब्लैक लाइव्स मैटर (बीएलएम) को समर्थन देने की घोषणा करती हैं, तो उनके मूल देश में रंग सौंदर्य के मानकों को बढ़ावा देने वाले विज्ञापन में उनकी भूमिका वायरल हो जाती है। दरअसल, प्रियंका चोपड़ा 2000 में मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता जीतने और स्टार का दर्जा हासिल करने के बाद बहुत लम्बे समय तक भारत में त्वचा की चमक बढ़ाने वाले उत्पादों का विज्ञापन करती रही थीं। दूसरे शब्दों में कहा जाय, तो जिस समय वह भारत में रह रही थीं, तब भी उन्होंने सक्रिय रूप से रंग से जुड़े पूर्वाग्रह को बढ़ावा दिया था।

शायद जमैका के पूर्व क्रिकेटर और कमेंटेटर, माइकल होल्डिंग इस मसले का सही-सही हल सुझाते हैं। उन्होंने हाल ही में लिखा है, "व्यवस्थागत नस्लवाद के लिए कोई एक व्यक्ति ज़िम्मेदार नहीं है, और इसीलिए लोगों को इसे ख़त्म करने के लिए एकजुट होना चाहिए।" होल्डिंग ने लिखा है कि उन्होंने भारत में नस्लवाद का सामना तो नहीं किया है,लेकिन भारत में व्याप्त वर्ग और जाति व्यवस्था से पूरी तरह अवगत हैं। उन्होंने आगे लिखा है, “अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ यहां बहुत पूर्वाग्रह और भेदभाव है। मुझे उम्मीद है कि यह समाप्त हो जायेगा।” उन्होंने कई ऐसे भारतीयों के बारे में भी लिखा है,जो यह मानते हैं कि "त्वचा जितनी गोरी होगी, आप उतने ही अच्छे होंगे।"

सैमी ने जिस अपमान का सामना किया था और जिस तरह से मौन अख़्तियार कर लिया है, यह कोई इक्का-दुक्का उदाहरण नहीं हैं। आख़िरकार, हाल के वर्षों में अफ़्रीकी छात्रों के ख़िलाफ़ हमलों का एक सिलसिला शुरू हो गया है, और वे रुकने का नाम ले रहे हैं। इस तरह के लक्षित हमलों के दोषियों को पकड़ने में सरकार और पुलिस,दोनों लापरवाह रही है। इस तरह के मामले को शायद ही कभी गंभीरता से लिया जाता है, चाहे इसे लेकर कुछ विरोधी विचार यह सवाल भी क्यों न उठाता रहा हो कि सिनेमा और दूसरे क्षेत्रों में भी ऐसा होता है। भारत में सरकारें इस तरह के जातिवादी हमलों को व्यक्तिगत विकृतियों से जोड़कर देखती हैं, न कि व्यवस्थागत नस्लवाद की समस्या की तरह देखती हैं। बहुत बार उन लोगों का चुप्पी साध लेना भी एक तरह की साजिश ही है, जो नस्लवादी हमलों को बढ़ावा देते हैं और खुले तौर पर नस्लवाद और काली-चमड़ी, खासकर अफ़्रीकी देशों के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा की स्वीकृति देते हैं।

आम आदमी पार्टी के नेता सोमनाथ भारती ने दक्षिण दिल्ली इलाक़े में रहने वाले अफ़्रीकी अमेरिकियों को ड्रग कारोबारियों के तौर पर बताया था और 2014 में नस्लीय भेदभाव के आरोपों का सामना किया था। एक प्रमुख हिंदुत्व विचारक, तरुण विजय ने कभी कहा था कि भारतीयों को नस्लवादी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे "दक्षिण भारतीयों के साथ रहते हैं"।

सुभाष चक्रवर्ती अपनी किताब, ‘द राज सिंड्रोम: ए स्टडी इन इंपीरियल परसेप्शन’ में कहते हैं, “उपनिवेशवाद की विरासत ने अधीनस्थ भारतीयों की उस राष्ट्रीय पहचान को बनाये रखा है, जो ‘गोरी’ चमड़ी को आज भी ‘काली’ चमड़ी वालों के बनिस्पत बेहतर मानते हैं।”

भारत के लोगों का दृष्टिकोण उस वर्ण मानसिकता से ग्रस्त है, जो दलितों, महिलाओं और श्रमिक वर्गों के ख़िलाफ़ संरचनात्मक भेदभाव को सुनिश्चित करता है। अपनी किताब, ‘द अनटचेबल्स: हू वेयर दे एण्ड व्हाई दे बिकेम अनटचेबल्स’ में डॉ. भीमराव अंबेडकर समस्या की जड़ तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। उन्होंने लिखा है कि "पुराने रूढ़िवादी हिंदू यह नहीं सोचते हैं कि अस्पृश्यता के पालन में कुछ भी ग़लत है...नये आधुनिक हिंदू इस ग़लती का एहसास ज़रूर करते हैं। लेकिन, उन्हें किसी विदेशी के डर से इस पर सार्वजनिक रूप से चर्चा करने में शर्म आती है कि हिंदू सभ्यता इस तरह के खोटे और बदनाम व्यवस्था के लिए दोषी हो सकती है... लेकिन, अजीब बात तो यह है कि अस्पृश्यता सामाजिक संस्थानों के यूरोपीय छात्र का ध्यान आकर्षित करने में विफल रही थी।”

निश्चित रूप से भारतीयों और उसके मूल के पदानुक्रमित व्यवहार को खोलने की ज़रूरत है। किसी काली त्वचा वाले विदेशियों और जिन भारतीयों की त्वचा गोरी नहीं है, उनके प्रति दुश्मनी औपनिवेशिक लूट के उस इतिहास को झूठा साबित करती है, जो भारत और कई काले-गोरे राष्ट्र का साझा इतिहास रहा है। भारत में नस्लवाद मौजूदा वक्त के बड़े पैमाने पर ग़रीबी के ख़िलाफ़ लड़ाई और अपनी जड़ों के साथ भेदभाव जैसी वास्तविक चुनौतियों का सामना करने की भारत की क्षमता पर उंगली उठा रहा है।

जमैका के क्रिकेटर होल्डिंग यह स्वीकार करते हैं कि त्वचा के रंग का पूर्वाग्रह "औपनिवेशिक युग के ब्रेनवॉशिंग के अवशेष" हैं। शायद भारतीय कुलीनों के लिए अपनी इस गड़बड़ी को स्वीकार करने और अपने पूर्वाग्रह पर क़ाबू पाने का सही वक़्त है, चाहे वे कितने भी गहरे क्यों न बैठे हों।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस लेख को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं-

How Many Times Will India Deny Apartheid?

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