NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
भारत में कोविड की दूसरी लहर : क्या सरकार इसे संभाल सकती है?
लगता है कि अव्यवस्थित नीति और पिछली ग़लतियों से सीखने में अक्षम मोदी सरकार अभी भी उसी रास्ते पर चल रही है।
सुबोध वर्मा
09 Apr 2021
Translated by महेश कुमार
भारत में कोविड की दूसरी लहर : क्या सरकार इसे संभाल सकती है?

भारत तथाकथित दूसरी लहर के चलते कोविड-19 संक्रमण की सुनामी का सामना कर रहा है। 7 अप्रैल को एक दिन में सबसे अधिक नए मामले यानि 1.27 लाख मामले दर्ज किए गए, जो कि पिछले साल 16 सितंबर को दर्ज किए गए 97,894 से काफी ऊपर है। [नीचे चार्ट देखें]

जो सबसे डरावनी बात वह यह कि: कुछ विशेषज्ञों ने भविष्यवाणी की है कि नए मामले बढ़ कर अप्रैल के मध्य तक अपने चरम पर पहुंचेंगे, लेकिन देखें तो पिछले साल का तजुरबा असफल  मॉडल और अनुमानों से अटा पड़ा है। इसलिए, इस बात को स्वीकार करने में कोई गलती नहीं  होगी कि यह बहुत ही गंभीर संकट है जिसकी गंभीरता को समान रूप से समझने की जरूरत है, और वह भी बड़ी तेजी के साथ ताकि स्थिति को जल्दी नियंत्रण में लाया जा सके।

इस संबंध में लंबे समय से तर्क दिया जा रहा था कि भारत को वास्तव में उस तरह की कोविड मौतों का सामना नहीं करना पड़ा जैसा कि यूरोपीय देशों और अमेरिका, मैक्सिको और ब्राजील को करना पड़ा है, और इसलिए संकट का मूल्यांकन उन देशों की स्थिति के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। भारत बेहतर स्थिति में है, हर वक़्त यही तर्क दिया जाता रहा है, क्योंकि केसों की बड़ी संख्या होने के बावजूद मरने वाले लोगों की संख्या काफी कम हैं।

यह एक खतरनाक और खुद को खुश करने वाली बात है क्योंकि इस तर्क से वायरस से बीमार पड़ने वाले लोगों को होने वाले नुकसान को कम करके आँकने की बड़ी गलती की जा रही है। अब तक, स्वास्थ्य मंत्रालय के डेटा के अनुसार, 30 जनवरी, 2020 से भारत में कोविड-19 से  कुछ 1.28 करोड़ लोगों के संक्रमित होने की रपट को आधिकारिक तौर पर दर्ज किया गया है। निश्चित तौर पर यह एक अनुमान है कि लाखों लोग प्रभावित हुए होंगे, लेकिन उनकी जांच नहीं हुई और इसलिए उनकी गिनती भी नहीं की गई है।

सिरो-सर्वे बीमारी फैलने के पैमाने का संकेत देते हैं - तीसरे सीरो-सर्वे के परिणामों से पता चला कि लगभग 21 प्रतिशत वयस्कों (18 वर्ष से अधिक) और 25 प्रतिशत बच्चों (10-17 वर्ष) में कोरोनोवायरस के एंटीबॉडी पाए गए हैं, यानि वे जो वाइरस से संक्रमित हो गए थे। यह सर्वेक्षण दिसंबर-2020, जनवरी-2021 में किया गया था। इसका मतलब है कि लगभग 19 करोड़ वयस्क वाइरस से संभावित रूप से संक्रमित हुए हैं। 

आमदनी का नुकसान, और परिवारों  के बजट पर बढ़ता बोझ पहले से ही हालात को बिगाड़े दे रहा है, उस अपर अगर इलाज़ पर कीमती संसाधनों झोक दिया जाता है तो उससे अन्य खर्चों में बड़ी कटौती होगी, इससे परिवार के सदस्यों में संक्रमण का खतरा ओर भी बढ़ जाता है क्योंकि आवास कि स्थिति बहुत दयनीय होती है – इस सब का मतलब है कि लोगों को भारी नुकसान हुआ होगा। बेशक, कई लोगों में हल्के लक्षण पाए गए होंगे, लेकिन फिर भी हम करोड़ों में बात कर रहे हैं। कम मृत्यु दर के मामले में खुशी जताने के चक्कर में अक्सर इस गंभीर वास्तविकता को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

पहले की ही तरह, संक्रमित होने वाले लोगों में मृत्यु दर अभी भी कम है, और वर्तमान में यह पहले की दैनिक मृत्यु दर से लगभग आधी है। [नीचे दिया गया चार्ट देखें] हालांकि, यह स्वागत योग्य है, लेकिन फिर से, इन आंकड़ों के विश्लेषण में सावधानी बरतने की जरूरत है। यहां तक कि एक दिन में 685 लोगों का मारना अनुचित और चौंकाने वाला हैं।

और, मृत्यु दर अभी भी बढ़ सकती है क्योंकि मृत्यु एक लंबे समय अंतराल के बाद होगी, जिसका अनुमान अस्पताल में भर्ती होने के 14 दिन बाद होगा। जैसे-जैसे मामलों की संख्या में तेजी आएगी, वैसे-वैसे दुर्भाग्य से मौतें भी बढ़ेंगी। इसके साथ अस्पताल की सुविधाओं से संबधित वही मुद्दे मुह बाए खड़े होंगे जैसे कि क्रिटिकल देखभाल और वेंटिलेटर आदि का उपलब्ध होना।

संक्रमण की वजह से दैनिक मौतों का ऊपर की ओर जाना स्पष्ट संकेत है। जिस दर से यह ऊपर चढ़ा है वह अपने आप में चौंकाने वाला है - दो सप्ताह में, इसकी बढ़ाने की दर 151 प्रतिशत है। और रुझान अभी भी तेजी से बढ़ने के मिल रहे है। लेकिन हम अभी चरम पर नहीं पहुंचे हैं।

मोदी सरकार जो अभी भी भूल रही है 

सबसे पहले, महामारी के विज्ञान की दृष्टि से, जांच और संपर्क अनुरेखण यानि कोंटेक्ट ट्रेसिंग का काम केवल कागज पर ही है - या कहें सिर्फ शब्दों में ही रह गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी हाल ही में कुछ दिनों पहले इसी मंत्र को दोहराया था। लेकिन वास्तव में, देशव्यापी जांच अभी भी गड्ड-बड्ड है, इसमें कर्मकांड अधिक और ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए उस पर गौर बहुत कम है। दैनिक जांच बहुत धीरे-धीरे बढ़ रही है जबकि संक्रमण की दूसरी लहर तेज़ है, पहले की तरह ही इसमें देरी हो रही है। [अखिल भारतीय जांच के नीचे दिए चार्ट को देखें]

इसके अलावा, कोंटेक्ट ट्रेसिंग और इसके बाद (आइसोलेशन, इलाज़ आदि) सभी सार्थक बातें लागू नहीं होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मोदी सरकार ने इस सबकी ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की दहलीज पर डाल दी है।

दूसरा, केंद्र सरकार का राज्य सरकारों के साथ संबंधों में खराब प्रबंधन है। महामारी की रोकथाम या इसके नुकसान को कम करने के प्राथमिक कार्य के लिए राज्यों से अपेक्षा करने में कुछ भी गलत नहीं है। वास्तव में, कानूनी रूप से कहा जाए, तो इसके लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं और वे ही हैं जिन्हें इसे जमीन पर लागू करना होगा। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या राज्यों सरकारों के पास संसाधन हैं? क्या पिछले एक साल में लोगों को कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के लिए प्रशिक्षित करने का कोई प्रयास किया गया है? क्या मोदी सरकार ने राज्यों को आर्थिक या तकनीकी रूप से इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को निभाने में मदद की है? सभी उपलब्ध जानकारी से पता चलता है कि ऐसा नहीं किया गया है। केंद्र सरकार लोगों को अध्यातम का ज्ञान और राज्य सरकारों को परामर्श देने पर ज़ोर दिए हुए है, और खुद अन्य देशों को वैक्सीन देने, या इस या उस आकस्मिक स्थिति के बारे में योजना बनाने आदि जैसे कार्य लगी है हैं।

8 अप्रैल को, प्रधानमंत्री मोदी महामारी पर राज्य के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक करने वाले हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इसके पहले उन्होने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ ग्यारह बैठकें की हैं। यह बात भी काफी उल्लेखनीय है कि ये बैठकें आम तौर पर सलाह देने के लिए की जाती हैं न कि किसी आम रणनीति पर काम करने के लिए।

मोदी ने 24 मार्च की रात को देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा से कुछ दिन पहले 20 मार्च, 2020 को पहली बैठक आयोजित की थी। इस बैठक में, लगता है, देश को लॉक करने की कोई योजना का उल्लेख नहीं किया गया था। इस तरह की गोपनीयता पूरी तरह से अनावश्यक थी - लोगों को पहले सूचना देने से अधिक लाभ होता। इसी तरह, लॉकडाउन बढ़ाने या उसे खोलने से पहले भी सुचना दी जानी चाहिए थी। यह सब कोविड-19 के पिछले साल सितंबर-नवंबर में अपने चरम पर पहुंचने से पहले हुआ था। अंत में, वैक्सीन रोलआउट 16 जनवरी को शुरू हुई, वह भी बिना मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक किए, जो अंततः दो महीने बाद यानि 17 मार्च को की गई थी। 

तीसरी, और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात, वह यह कि केंद्र सरकार ने खजाने पर शिकंजा कश कर रखा। महामारी के समय न केवल स्वास्थ्य सेवा के लिए बल्कि बीमारी से प्रभावित लोगों का आर्थिक समर्थन करने के साथ-साथ सामान्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर धन लगाने की जरूरत होती है। पिछले साल कुछ महीनों तक, जनधन खाता धारकों को खाद्यान्न और 500 रुपये प्रति माह दिए गए थे। यह बहुत कम समर्थन था और जिसके कारण हताश लोगों को सबसे दयनीय यातना से गुजरना पड़ा - सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलना, भूखे या आधे पेट ज़िंदा रहना, शिक्षा का नुकसान, अन्य जरूरतों के लिए चिकित्सा सेवाओं की कमी, आदि ने हालात ओर गंभीर बना दिए थे। 

यह न सिर्फ अतीत और विलाप की ओर इशारा करता है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, हर बीतते दिन बढ़ती महामारी से स्थिति बिगड़ती जा रही है और देश के लोगों को बचाने के लिए, पिछली गलतियों को सुधारते हुए प्रभावी कार्रवाई करने की जरूरी है। अन्यथा, बढ़ती महामारी के चलतेब आम लोगों की दुख-तकलीफ के अधिक बढ़ने की संभावना है।

(डाटा पीयूष शर्मा ने तैयार किये हैं।)

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

India’s Second COVID Wave – Can the Govt Handle it?

COVID second wave
Lockdown
Covid Vaccine
COVID Daily Cases
Modi Govt
Covid Testing
Covid Tracing

Related Stories

कोविड-19 टीकाकरण : एक साल बाद भी भ्रांतियां और भय क्यों?

लॉकडाउन में लड़कियां हुई शिक्षा से दूर, 67% नहीं ले पाईं ऑनलाइन क्लास : रिपोर्ट

जानिए ओमिक्रॉन BA.2 सब-वैरिएंट के बारे में

फाइज़र का 2021 का राजस्व भारत के स्वास्थ्य बजट से सात गुना ज़्यादा है

कोविड -19 के टीके का उत्पादन, निर्यात और मुनाफ़ा

यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 

कोविड-19: देश में 15 से 18 वर्ष के आयुवर्ग के बच्चों का टीकाकरण शुरू

कटाक्ष: नये साल के लक्षण अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं...

जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?

कोरोना अपडेट: देश के 14 राज्यों में ओमिक्रॉन फैला, अब तक 220 लोग संक्रमित


बाकी खबरें

  • प्रियंका शंकर
    रूस के साथ बढ़ते तनाव के बीच, नॉर्वे में नाटो का सैन्य अभ्यास कितना महत्वपूर्ण?
    19 Mar 2022
    हालांकि यूक्रेन में युद्ध जारी है, और नाटो ने नॉर्वे में बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है, जो अभ्यास ठंडे इलाके में नाटो सैनिकों के युद्ध कौशल और नॉर्वे के सैन्य सुदृढीकरण के प्रबंधन की जांच करने के…
  • हर्षवर्धन
    क्रांतिदूत अज़ीमुल्ला जिन्होंने 'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद किया था
    19 Mar 2022
    अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे।
  • विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: महंगाई-बेरोजगारी पर भारी पड़ी ‘नमक पॉलिटिक्स’
    19 Mar 2022
    तारा को महंगाई परेशान कर रही है तो बेरोजगारी का दर्द भी सता रहा है। वह कहती हैं, "सिर्फ मुफ्त में मिलने वाले सरकारी नमक का हक अदा करने के लिए हमने भाजपा को वोट दिया है। सरकार हमें मुफ्त में चावल-दाल…
  • इंदिरा जयसिंह
    नारीवादी वकालत: स्वतंत्रता आंदोलन का दूसरा पहलू
    19 Mar 2022
    हो सकता है कि भारत में वकालत का पेशा एक ऐसी पितृसत्तात्मक संस्कृति में डूबा हुआ हो, जिसमें महिलाओं को बाहर रखा जाता है, लेकिन संवैधानिक अदालतें एक ऐसी जगह होने की गुंज़ाइश बनाती हैं, जहां क़ानून को…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्यप्रदेश विधानसभा निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित, उठे सवाल!
    19 Mar 2022
    मध्यप्रदेश विधानसभा में बजट सत्र निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित कर दिया गया। माकपा ने इसके लिए शिवराज सरकार के साथ ही नेता प्रतिपक्ष को भी जिम्मेदार ठहराया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License