NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
जलदिवस का राजनैतिक औचित्य
बीते कुछ वर्षों में पानी के साथ हमारा रिश्ता बुरी तरह बदला है। हमारी आंखों का पानी सूखा और फिर पीछे हमारे कुएं-तालाब भी सूखने लगे। पानी को व्यापार की वस्तु बना दिया गया। जब जीवन से जुड़ी चीजों का व्यापार होने लगे तो उनसे शुभ गायब हो जाता है।
राजेंद्र सिंह
22 Mar 2020
water day
यह व्यंग्यात्मक तस्वीर (कार्टून) India water portal से साभार ली गई है।

आज का दिन पूरी दुनिया में विश्व जल दिवस के रूप में मनाया जाता है। कुछ लोग इसे जल उत्सव की तरह देखते हैं और कुछ इसे राजनीतिक कार्यक्रम बतौर मनाते हैं। यह उत्सव तो बिल्कुल नहीं है, हां एक राजनीतिक प्रतिबद्धता विश्व जल दिवस के साथ जुड़ी है। यह जब पहली बार तय हुआ कि दुनिया में 22 मार्च को जल दिवस मनाया जाएगा, तब संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल असेंबली (साधारण सभा) में राष्ट्रीय सरकारों का प्रतिनिधित्व करने वालों के मन में, दुनिया में जल संरक्षण प्रबंधन एवं जल उपयोग दक्षता बढ़ाकर सबको जल सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिबद्धता रही होगी। अब इस प्रतिबद्धता को पूरी दुनिया के राजनेता भूल गए है। अब तो केवल जल से लाभ कमाना और हर वर्ष 22 मार्च को जल दिवस मनाना ही राजनेताओं की जिम्मेदारियों को इतिश्री हो जाती है।

यह वर्ष 2020 जलवायु परिवर्तन और जल का वर्ष है। अफ्रीका और मध्य पश्चिम एशिया के देशों से बेपानी होकर उजड़ते लोग, जब यूरोप में जाते हैं तो वहां उन्हें जलवायु परिवर्तन शरणार्थी कहा जाता है, अभी ऐसा भारतवासियों को नहीं कहा जाता लेकिन भारत के 72 प्रतिशत भूजल भंडार, जल शोषित होकर खाली हो रहे है। 39 प्रतिशत तो अति शोषित घोषित हो चुके हैं। जल संकट का यह परिदृश्य भारत को भी  वेपानी बनाकर जलवायु परिवर्तन शरणार्थी का दर्जा दिलाने के रास्ते पर है।

नॉवेल कोरोना वायरस जलवायु परिवर्तन के संकट से कुछ संबंध जरूर रखता होगा। मानवीय बाज़ारु लालच ने प्रकृति का विकास के नाम पर विनाश किया है। उस विनाश का परिणाम है कि अब कोरोना वायरस जैसी भयानक बीमारियां और आएंगी। उनका इलाज ऐन्टीबॉयोटिक जैसी औषधियां नहीं कर पाएंगीं। भारत की गंगा नदी के जल में 17 तरह के रोगाणुओं को नष्ट करने की विशिष्ट शक्ति थी, ऐसा आधुनिक विज्ञान भी मानता है। वह अब नहीं बची है। उसके कारण सुपर बग का संकट भारत में भी बढ़ सकता है।

कोरोना महामारी पर तो हम नियंत्रण कर लेंगे लेकिन भारत के जलवायु और जल आपदा से आगे आप को कौन बचा सकता है? हम नहीं जानते। इसकी चिंता हमारे राजनेताओं को तनिक भी नहीं है, यह सब अपनी अपनी रोटियां सेंकने में लगे हैं और जल दिवस मना कर जल की चिंता दिखाते रहते हैं। इनकी आंखों में अब जल नहीं बचा है, इनकी बेपानी आंखों के कारण हमारी धरती भी बेपानी हो रही है और उसे बुखार चढ़ गया है और इसी कारण मौसम का मिजाज भी बिगड़ गया है।

धरती के बुखार ‘‘ ग्लोबल वार्मिग” का इलाज एक मानव के बुखार के इलाज जैसा ही है। बुखार में जैसे मनुष्य के सिर पर पानी की पट्टी रखते हैं और पेरासिटामॉल खिलाते हैं और उसे आराम करने का मौका देते हैं। इसी तरह बादल से निकली हर वर्षा जल की बूंद को पकड़कर तालाब, जोहड़, चेक डैम, ताल, पाल, झाल बनाकर पानी की पट्टी की तरह धरती की मिट्टी में नमी बना दें तो उसमें हरियाली जन्म लेगी और वह हरियाली को बचाने के लिए खनन, प्रदूषण, अतिक्रमण और भूजल का शोषण रोक दें तो धरती का पेट पानी से भर जाएगा। उस जलवायु अनुकूलन प्रक्रिया से जलवायु परिवर्तन संकट का उन्मूलन हो जाएगा। परिणामस्वरूप नियमित वर्षा होगी और धरती पानीदार बनेगी।

वॉटर इज क्लाइमेट एंड क्लाइमेट इज वॉटर की बात आज पूरी दुनिया मान रही है। बिना जल के जलवायु की बातचीत संभव ही नहीं है। दुनिया ने पहले तो इन दोनों के रिश्ते को मानने से इंकार किया किंतु वर्ष 2015 के नवंबर-दिसंबर में पेरिस में दुनिया के देश इकट्ठा हुए तो उनकी चिंता इन्हीं दोनों के इर्द-गिर्द घूमती रही। पेरिस समझौते के बाद संयुक्त राष्ट्र ने पूरी दुनिया की सरकारों को पानी और कृषि को जोड़कर, जलवायु परिवर्तन, अनुकूलन और उन्मूलन हेतु राष्ट्रीय जल कार्यक्रम बनाने का सुझाव दिया गया।

दुनिया जल और जलवायु के रिश्ते की बात को थोड़ा देर से समझी है लेकिन भारत की परंपरा में इस रिश्ते की बात मौजूद रही है। भारत के ज्ञानतंत्र में जिसे हम ’भगवान”  कहते हैं वह पंच महाभूतों से मिलकर बना है। ‘भ’ से भूमि, ‘ग’ से गगन, ‘व’ से वायु, ‘अ’ से अग्नि और ‘न’ से नीर। इनमें नीर बाकी चारों महाभूतों को जोड़ने का काम करता है। नीर के बिना कोई जीवन संभव ही नहीं है। जीवन को चलाने के लिए जो गैसें चाहिए वे भी जल के बिना नहीं बनती हैं। यह बताता है कि जल हमारी सृष्टि का आधार है।

45 वर्षों से साझे भविष्य को बेहतर बनाने और प्रकृति हेतु भारतीय आस्था और पर्यावरणीय विज्ञान से जल संरक्षण का कार्य कर रहा हूं और मैं पिछले छह वर्षों से दुनिया के अफ्रीकन और मध्य पश्चिमी एशिया में अध्ययन कर रहा हूं। अफ्रीकन और मध्य पश्चिमी एशिया के लोग बेपानी होकर जब यूरोप में जाते हैं तो उन्हें जलवायु परिवर्तन शरणार्थी कहते हैं। भारत को भी यह चेतावनी मिलना शुरू हो गई है। हमारे देश में बाढ़ और सूखा दोनों बढ़ रहे हैं। इस संकट से यदि बचना है तो हमें जलवायु परिवर्तन अनुकूलन व उन्मूलन के काम करने होंगे

कभी भारत के लोगो में नीर और नदी की अच्छी समझ थी। कभी भारत की महिलाएं भी जलवायु परिवर्तन के गीत गाती थीं और वे भी जलवायु को जानती और समझती थीं। कभी भारत में जल के बारे में छह आर थे,  रिस्पेक्ट ऑफ वॉटर, रीडयूज यूज ऑफ वॉटर, रिट्रीट-रिसायकल-रीयूज वॉटर, और रीजनेरेट प्लानेट बाय वॉटर। जबकि बाकी दुनिया में जल के सिर्फ तीन अर्थ रहे हैं, रिट्रीट, रिसायकल एंड रीयूज। तो पानी के बारे में हम दुनिया को बहुत कुछ सिखाने वाले थे इसलिए हम पानीदार थे। पानी को हम लाभ की तरह नहीं बल्कि शुभ की तरह देखते थे।

बीते कुछ वर्षों में पानी के साथ हमारा रिश्ता बुरी तरह बदला है। हमारी आंखों का पानी सूखा और फिर पीछे हमारे कुएं-तालाब भी सूखने लगे। पानी को व्यापार की वस्तु बना दिया गया। जब जीवन से जुड़ी चीजों का व्यापार होने लगे तो उनसे शुभ गायब हो जाता है, वे केवल लाभ के लिए होकर रह जाती हैं। हमें इसी रिश्ते को फिर से जीवित करना होगा।

सोचिए, प्रकृति की कितनी सुंदर व्यवस्था थी। बादल हमारे लिए पानी लेकर आता है। जीवन देता है। लेकिन बादल जो जीवन लेकर आता है उसे हम सहेजते नहीं हैं, अमृत को गंदे नालों में बहने जाने देते हैं। जिस बादल के पवित्र जल से जीवन बना है वह गंदे नाले में बह जाता है।

इसका सबसे बड़ा दोष जाता है आधुनिक शिक्षा को। आधुनिक शिक्षा में हम इंजीनियर और तकनीशियन तैयार कर रहे हैं जिन्होंने सिर्फ शोषण की तकनीक पढ़ी है, वे पोषण नहीं जानते। मैनेजमेंट की शिक्षा ने हमें चीजों का प्रबंधन करना सिखाया है कि किस तरह साझी सामुदायिक संपत्ति पर अतिक्रमण करके उसका प्रबंधन करना है। सामाजिक विज्ञान की शिक्षा भी प्रकृति से सिर्फ लेने की बात करती है।

हम प्रकृति से जुड़े पुण्य और सुख को भूल गए। भारत के मूल ज्ञानतंत्र में जल हमारी भाषा, नदियां हमारी वाणी थीं। इसलिए हम पर जलवायु परिवर्तन की आपदा नहीं आई थी। जबसे हम जल की भाषा और नदी की बोली भूल गए हैं तबसे जलवायु परिवर्तन की आपदा आने लगी है। यदि हम जल-दिवस मनाना चाहते हैं तो हमारी आधुनिक शिक्षा को पोषण की पढ़ाई में बदलना होगा। बादल तो आते हैं लेकिन उनकी कद्र करना सीखना होगा।

ऐसा काम करने के लिए राजनैतिक सदिच्छा चाहिए, राजनैतिक सदिच्छा के बिना जल दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं है।

(लेखक राजेंद्र सिंह प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। आप वर्षों से पानी के संरक्षण को लेकर काम कर रहे हैं। इसलिए आपको जल पुरुष भी कहा जाता है। लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

World Water Day
water crises
Groundwater Depletion
Water conservation
ground water depletion
water logging
Environment
Save environment
Environmental Pollution
NITI Aayog

Related Stories

उत्तराखंड: क्षमता से अधिक पर्यटक, हिमालयी पारिस्थितकीय के लिए ख़तरा!

मध्यप्रदेशः सागर की एग्रो प्रोडक्ट कंपनी से कई गांव प्रभावित, बीमारी और ज़मीन बंजर होने की शिकायत

क्यों आर्थिक विकास योजनाओं के बजट में कटौती कर रही है केंद्र सरकार, किस पर पड़ेगा असर? 

ग्राउंड रिपोर्ट: जल के अभाव में खुद प्यासे दिखे- ‘आदर्श तालाब’

बिहारः गर्मी बढ़ने के साथ गहराने लगा जल संकट, ग्राउंड वाटर लेवल में तेज़ी से गिरावट

बनारस में गंगा के बीचो-बीच अप्रैल में ही दिखने लगा रेत का टीला, सरकार बेख़बर

दिल्ली से देहरादून जल्दी पहुंचने के लिए सैकड़ों वर्ष पुराने साल समेत हज़ारों वृक्षों के काटने का विरोध

आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव के पर्यावरण मिशन पर उभरते संदेह!

विश्व जल दिवस : ग्राउंड वाटर की अनदेखी करती दुनिया और भारत

जाने-माने पर्यावरणविद् की चार धाम परियोजना को लेकर ख़तरे की चेतावनी


बाकी खबरें

  • लव पुरी
    क्या यही समय है असली कश्मीर फाइल को सबके सामने लाने का?
    04 Apr 2022
    कश्मीर के संदर्भ से जुडी हुई कई बारीकियों को समझना पिछले तीस वर्षों की उथल-पुथल को समझने का सही तरीका है।
  • लाल बहादुर सिंह
    मुद्दा: क्या विपक्ष सत्तारूढ़ दल का वैचारिक-राजनीतिक पर्दाफ़ाश करते हुए काउंटर नैरेटिव खड़ा कर पाएगा
    04 Apr 2022
    आज यक्ष-प्रश्न यही है कि विधानसभा चुनाव में उभरी अपनी कमजोरियों से उबरते हुए क्या विपक्ष जनता की बेहतरी और बदलाव की आकांक्षा को स्वर दे पाएगा और अगले राउंड में बाजी पलट पायेगा?
  • अनिल अंशुमन
    बिहार: विधानसभा स्पीकर और नीतीश सरकार की मनमानी के ख़िलाफ़ भाकपा माले का राज्यव्यापी विरोध
    04 Apr 2022
    भाकपा माले विधायकों को सदन से मार्शल आउट कराये जाने तथा राज्य में गिरती कानून व्यवस्था और बढ़ते अपराधों के विरोध में 3 अप्रैल को माले ने राज्यव्यापी प्रतिवाद अभियान चलाया
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में एक हज़ार से भी कम नए मामले, 13 मरीज़ों की मौत
    04 Apr 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 12 हज़ार 597 हो गयी है।
  • भाषा
    श्रीलंका के कैबिनेट मंत्रियों ने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दिया
    04 Apr 2022
    राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा कि विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के कारण पैदा हुए आर्थिक संकट से सरकार द्वारा कथित रूप से ‘‘गलत तरीके से निपटे जाने’’ को लेकर मंत्रियों पर जनता का भारी दबाव था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License