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अपना बुटीक खोलने और अपनी ज़िंदगी खुलकर जीने के लिए हासिल की ट्रांस महिला की पहचान
“...बैंक ने मुझे लोन नहीं दिया। मेरे पास आधार कार्ड है। जिसमें मेरी पहचान पुरूष के तौर पर है। मेरे सर्टिफिकेट्स में मेरा पुरुष नाम ही है। जब मैं लोन के लिए जाती हूं तो मुझे स्त्री के तौर पर देखकर वह कहते हैं कि ये तस्वीर आपकी नहीं है। इसमें आप अलग दिख रही हैं”।
वर्षा सिंह
13 Jul 2021
नेशनल पोर्टल फॉर ट्रांस जेंडर पर्सन्स के ज़रिये अदिति (हरी साड़ी में) और काजल (लाल लिबास में) को मिली ट्रांस महिला की पहचान। फोटो : वर्षा सिंह 
नेशनल पोर्टल फॉर ट्रांस जेंडर पर्सन्स के ज़रिये अदिति (हरी साड़ी में) और काजल (लाल लिबास में) को मिली ट्रांस महिला की पहचान। फोटो : वर्षा सिंह 

“मैंने खुद को छिपाने की बहुत कोशिश की। लेकिन हम कभी बहुत ज्यादा छिप नहीं सकते। 10 साल या ज्यादा से ज्यादा 15 साल की उम्र तक। बंदा जैसे-जैसे जवान होता जाता है। उसका शरीर बदलता है। भावनाएं बदलती हैं। लक्षण बदलते हैं”।

ट्रांसजेंडर होने की वजह से 30 साल की अदिति शर्मा ने कई मुश्किलें झेली हैं। उत्तरकाशी में अपने माता-पिता का घर छोड़कर वह देहरादून आकर बस गईं। मुश्किलें अब भी हैं। लेकिन यहां उन्हें अपने जैसे लोग मिले। अलग-अलग नामों के साथ जिनकी कहानियां तकरीबन एक जैसी हैं।

“मैंने उत्तरकाशी से ही ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी की। जब मेरे हाव-भाव बदलने लगे तो स्कूल में बहुत दिक्कत होने लगी। लड़के हमें अपने साथ नहीं आने देते। घर वालों ने शुरू-शुरू में सपोर्ट किया। लेकिन मेरा भाई मुझे बहुत मारता था। कहता था कि तूने समाज में हमारी नाक कटा दी। एक समय के बाद घर पर रहना मुश्किल हो गया। 20 की उम्र में मैंने तय किया कि अपनी पहचान नहीं छिपानी है। मुझे खुलकर जीना चाहिए। फिर मैं उत्तरकाशी से देहरादून की बस में बैठ गई”।

फरवरी में अदिति से मेरी मुलाकात हुई। देहरादून आए हुए उसे तकरीबन 10 वर्ष हो चुके हैं। वह किराए के कमरे में अकेली रहती है। उसकी बातें बताती हैं कि देहरादून शहर ने भी उसका स्वागत नहीं किया।

“मैंने घरों में साफ-सफाई का भी काम किया। लेकिन कोई हमें काम पर नहीं रखना चाहता। मजबूरी में धंधा भी करना पड़ा। भूखे तो नहीं रह सकते। लोग परेशान करते हैं। हमारे पीछे पड़ जाते हैं। हम सड़क पर स्वाभिमान के साथ चल नहीं सकते। मुझे तो बहुत डर लगता है। समाज में हमें हमारी तरह अपनाने के लिए कोई तैयार नहीं है”।

ट्रांसजेंडर होने की वजह से अदिति को नहीं मिल रहा था बैंक से लोन। फोटो : वर्षा सिंह 

जो हूं, वही कहलाऊं

इन मुश्किलों को झेलते हुए अदिति अपनी ज़िंदगी को बदलना चाहती थी। उन्होंने ये तय कर लिया था कि किन्नर समाज से नहीं जुड़ना है। जो परंपरागत शादी-ब्याह, बच्चे के जन्म जैसे अवसरों पर बधाई लेने के काम करती हैं। 

“इधर-उधर भटकने के बाद मैंने बुटीक का काम शुरू किया। मैं लोगों के कपड़े सिलती हूं। किराये के कमरे में ही मेरा बुटीक है। मैंने अपना खुद का बुटीक शुरू करने के लिए लोन के लिए अप्लाई किया। लेकिन बैंक ने मुझे लोन नहीं दिया। मेरे पास आधार कार्ड है। जिसमें मेरी पहचान पुरूष के तौर पर है। मेरे सर्टिफिकेट्स में मेरा पुरुष नाम ही है। जब मैं लोन के लिए जाती हूं तो मुझे स्त्री के तौर पर देखकर वह कहते हैं कि ये तस्वीर आपकी नहीं है। इसमें आप अलग दिख रही हैं”।

बुटीक के अपने सपने को पूरा करने के लिए अदिति को बैंक से लोन की जरूरत थी। लोन लेने में आ रही लैंगिक अड़चनों के बाद उन्होंने तय किया कि वो ट्रांस महिला के तौर पर अपनी पहचान बनाएंगी। उन्होंने स्थानीय संस्था परियोजन कल्याण समिति की मदद से देहरादून में समाज कल्याण विभाग में इसके लिए आवेदन किया। साथ ही जेंडर सर्जरी करवाने के लिए चिकित्सक से काउंसिलिंग भी शुरू कर दी।

अदिति के साथ अन्य ट्रांस महिला काजल भी इस प्रक्रिया में साथ थी। काजल किन्नर समाज से जुड़ी हुई हैं। अदिति बताती है कि बधाइयों और नृत्य के सहारे जीने वाला किन्नर समाज किसी ट्रांस महिला को स्वीकार नहीं करता।

नेशनल पोर्टल फॉर ट्रांस जेंडर पर्सन्स पर ट्रांस पहचान पत्र के लिए कर सकते हैं आवेदन

ट्रांस महिला की पहचान हासिल करने की प्रक्रिया

देहरादून की परियोजन कल्याण समिति ने अदिति और काजल की मदद की। समिति की सचिव नताशा नेगी बताती हैं कि नेशनल पोर्टल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स  (https://transgender.dosje.gov.in/Applicant/Registration) पर दोनों का रजिस्ट्रेशन कराया। ये पोर्टल 2019 में लॉन्च हुआ था। इस पर आवेदन करने वाले को फॉर्म भरने के साथ अपना मौजूदा पहचान पत्र और पासपोर्ट के आकार की तस्वीर अपलोड करनी होती है। जिसके बाद ट्रांस-पर्सन के रूप में पहचान पत्र और सर्टिफिकेट जारी होता है। ये सर्टिफिकेट ज़िला समाज कल्याण विभाग के ज़रिये मिलता है।

नताशा बताती हैं कि नेशनल पोर्टल के ज़रिये उत्तराखंड में पहली बार अदिति और काजल को ये सर्टिफिकेट मिला है।

संस्था ने सर्जरी में भी अदिति और काजल की मदद की। सर्जरी को लेकर नताशा कहती है “ये उन दोनों की इच्छा की बात थी। सर्जरी के लिए मनो-चिकित्सक से जेंडर डिस्फोरिया सर्टिफिकेट लेना होता है। ये तन और मन को एक करने वाली बात है। कई बार चाहत होती है कि मैं स्त्री के तौर पर खुद को महसूस करती हूं तो मेरा शरीर भी स्त्री का ही हो”।

मनो-चिकित्सक की सलाह

देहरादून में नेशनल इंस्टीट्ययूट फॉर द एम्पावरमेंट ऑफ द परसन विद विजुअल डिसएबिलिटी (एनआईईपीवीडी) के क्लीनिकल साइकोलॉजिकल डिपार्टमेंट में क्लीनिकल साइकॉलजी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुरेंद्र ढालवाल ने अदिति और काजल की काउसिलिंग की। डॉ. ढालवाल बताते हैं कि सर्जरी से पहले मनो चिकित्सक की सलाह बेहद जरूरी होती है।

“हम ये देखते हैं कि सर्जरी कराने जैसा जीवन का बड़ा फ़ैसला लेने वाला व्यक्ति सही मानसिक स्थिति में ये फ़ैसला ले रहा है या नहीं। कहीं वो भावनाओं में बहकर या किसी मनो रोग की वजह से तो इस तरह का फ़ैसला नहीं ले रहा। जिस पर आगे जाकर उसे पछतावा हो”।

डॉ. ढालवाल बताते हैं कि क्लीनिकल जांच के लिए व्यक्ति से तकरीबन 350 सवाल पूछे जाते हैं। जो उसकी मानसिक स्थिति से जुड़े होते हैं। इसके आधार पर हम सर्जरी कराने या न कराने की सलाह और सर्टिफिकेट देते हैं। काउसिलिंग के बाद अदिति और काजल को उन्होंने जेंडर डिस्फोरिया सर्टिफिकेट दिया।

अदिति को समाज कल्याण विभाग से सर्टिफिकेट तो मिल गया लेकिन राज्य में ट्रांसजेंडर एक्ट लागू करने की अधिसूचना जारी नहीं हुई है। फोटो सौजन्य: अदिति

उत्तराखंड में नोटिफाई नहीं हुआ है ट्रांसजेंडर एक्ट-2019

अदिति और काजल को ट्रांस महिला की पहचान का सर्टिफिकेट तो हासिल हो गया है। लेकिन एक मुश्किल ये भी है कि उत्तराखंड में  ट्रांसजेंडर विधेयक (सुरक्षा और अधिकार) एक्ट-2019 को अधिसूचित नहीं किया गया है। ये एक्ट कहता है कि ट्रांसजेंडर वह व्यक्ति है जिसका लिंग जन्म के समय नियत लिंग से मेल नहीं खाता। ये जननांगों या हार्मोन्स में महिला या पुरुष शरीर के आदर्श मानकों से अलग होते हैं। ये  कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ भेदभाव पर प्रतिबंध लगाता है। साथ ही शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवा जैसे अधिकार देता है।

देहरादून में ज़िला समाज कल्याण अधिकारी हेमलता पांडेय कहती हैं उत्तराखंड में ट्रांसजेंडर एक्ट को अब तक अधिसूचित नहीं किया गया है। इसके लिए हमने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी पत्र लिखा है। इसके बाद ही ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की मान्यता अधिकृत हो सकेगी।

राज्य में ट्रांसजेंडर आबादी या उनके कल्याण से जुड़ी योजना को लेकर हेमलता कहती हैं “हमारे पास ऐसे लोगों की आबादी का कोई डाटा उपलब्ध नहीं है। उनके लिए कोई विशेष योजना भी नहीं है। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पेंशन देने से जुड़ी एक योजना जरूर है। लेकिन उसका भी कोई सरकारी आदेश नहीं है। हमारे राज्य में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग से कोई नीति नहीं है। हमने विभाग से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से जुड़ी योजनाओं के बारे में सूचना भी मांगी है”।

हालांकि तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश जैसे कुछ राज्य हैं जहां ट्रांसजेंडर समुदाय के कल्याण से जुड़ी योजनाएं चलायी जा रही हैं।

उधर, अप्रैल में सर्जरी और जून में ट्रांस महिला होने का सर्टिफिकेट हासिल करने के बाद अदिति बेहद ख़ुश है। “मैंने इधर-उधर से कर्ज लेकर अपनी सर्जरी करायी। अब मैं बहुत ख़ुश हूं। मुझे लग रहा है कि आज से दस साल पहले ही ये सर्जरी करवानी चाहिए थी। मैं घुट-घुट कर जी रही थी। कहीं पुरुष की भूमिका तो कहीं स्त्री की भूमिका निभा रही थी। मुझे उस दोहरे जीवन से छुटकारा मिला”।

अदिति जैसे कई ट्रांसजेंडर व्यक्ति हैं जो घरेलू हिंसा से लेकर सामाजिक भेदभाव, देह-व्यापार और आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बनने के लिए अब भी जूझ रहे हैं। भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के चलते स्कूल की पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। अपनी पहचान छिपाकर रहना पड़ता है। नौकरी हासिल करना बेहद मुश्किल होता है। मज़बूरी में देह-व्यापार अपनाने और यौन बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं। मुश्किल ये है कि इस आबादी के लिए हमारे राज्य में कोई नीति नहीं है।

(देहरादून स्थित वर्षा सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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