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तेज़ी से पिघल रहे हैं सतोपंथ और ऋषि गंगा ग्लेशियर
हिमालय में दिखने लगा है अब ग्लोबल वार्मिंग का व्यापक असर। सतोपंथ झील का दायरा हुआ कम, ऋषि गंगा ग्लेशियर भी दस फीसद से ज्यादा पिघला।
मनमीत
29 Sep 2020
सतोपंथ झील और ग्लेशियर
सतोपंथ झील और ग्लेशियर

ग्लोबल वार्मिंग का व्यापक असर हिमालय में दिखने लगा है। वैज्ञानिकों के शोध के अनुसार न केवल ग्लेशियर के पानी से बनी सतोपंथ झील का दायरा कम हो गया है, वहीं  ऋषिगंगा कैचमेंट एरिया के ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से कराए गए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। बीस सालों के अध्ययन में सामने आया है कि ग्लेशियरों में तकरीबन 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

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सतोपंथ झील और रूप कुंड का दायरा पिछले दस सालों में पांच मीटर हुआ कम

1980 में नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के ऋषिगंगा कैचमेंट का कुल 243 वर्ग किमी एरिया बर्फ से ढका था, लेकिन 2020 में यह एरिया 217 वर्ग किमी ही रह गया। वहीं अब इसमें दस प्रतिशत की और गिरावट दर्ज की गई है। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसेक) ने सेटेलाइट डेटा के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है कि 37 सालों में हिमाच्छादित क्षेत्रफल में 26 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। शोध में ये भी सामने आया है कि इस क्षेत्र में पहले स्थायी स्नो लाइन 5200 मीटर पर थी, जो अब 5700 मीटर तक घट बढ़ रही है। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के निदेशक प्रो. एमपीएस बिष्ट के निर्देशन में हुए इस अध्ययन में शोध छात्र डॉ. मनीष मेहता और श्रीकृष्ण नौटियाल भी शामिल थे। 

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ऋषि गंगा के साउथ डाउनफॉल सबसे ज़्यादा प्रभावित

यूसेक के निदेशक और वरिष्ठ भू गर्भीय वैज्ञानिक प्रो. डॉ एमपीएस बिष्ट ने बताया कि ऋषि गंगा कैचमेंट एरिया की उत्तरी ढलान के ग्लेशियर ज्यादा प्रभावित नहीं हुए हैं, लेकिन दक्षिणी ढलान के ग्लेशियर में बदलाव देखा गया है। इस ओर के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के ग्लेशियर यदि इसी तरह से पिघलते रहे तो आने वाले समय में इस क्षेत्र के वन्य जीव जंतुओं और वनस्पतियों पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा।

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ग्लेशियर 25 किमी तक हुए कम

वेस्टर्न डिस्टर्बेंस है मुख्य कारण

असल में, यूरोप के विभिन्न देशों से निकलने वाला प्रदूषण हजारों किलोमीटर दूर हिमालय श्रंखलाओं की सेहत बिगाड़ रहा है। ये प्रदूषण हिमालयी ग्लेशियरों में ब्लेक कार्बन के तौर पर चिपक रहा है। जिस कारण ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार पहले से ज्यादा तेज हो गई है। 

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के ताजा शोध में ये बात निकल कर सामने आई कि ग्लेशियरों में स्थित ब्लैक कार्बन का एक बड़ा कारण, यूरोप से तत्व आधारित गैसों के प्रदूषण का वेस्टर्न डिस्टबेंर्स (पश्चिमी विक्षोभ) के साथ यहां तक पहुंचना है। अब तक यह माना जाता रहा था कि हिमलायी जंगलों में लगने वाली आग के चलते ग्लेशियरों में ब्लैक कार्बन जमता है।

वैज्ञानिक इस बात का पता तो काफी पहले कर चुके थे कि, हिमालयी श्रंखलाओं के लगभग 15 हज़ार ग्लेशियरों के तेज़ रफ़्तार से पिघलने का कारण ब्लैक कार्बन है। लेकिन, उसके बाद भी ये शोध का विषय बना हुआ था कि, मई माह के बाद जनवरी माह में कैसे ग्लेशियरों में ब्लैक कार्बन का स्तर सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। वो इसलिये, क्योंकि आरोप था कि, ये ब्लैक कार्बन वहां की स्थानीय सामाज द्वारा खाना बनाने के लिये लकड़ियां जलाने और बड़े पैमाने पर जंगलों में आग लगने के कारण निकलनी वाली कार्बन-डाइआक्साइड से उत्पन्न होती थी, जिस कारण इस गैस के कण ग्लेशियर में स्थित बर्फ में चिपक जाते हैं और ब्लैक कार्बन बन जाते हैं। 

इस ब्लैक कार्बन के कारण बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ जाती थी। लेकिन, मई में तो ये बात ठीक थी, तो फिर जनवरी में ग्लेशियरों में ब्लैक कार्बन का स्तर मई माह के बराबर पहुंचने का क्या कारण था? क्योंकि जनवरी में उत्तराखंड में रहने वाला समाज ग्लेशियरों से लगभग सौ किलोमीटर पीछे चले जाता है। लिहाजा, न तो वो उस दौरान ग्लेशियरों के पास आग जलाते हैं और न ही जनवरी में जंगलों में आग लगती है। 

इस शोध के लिये वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ भूवैज्ञानिक डॉ पीएस नेगी के नेतृत्व में गौमुख से पहले 3600 मीटर की  ऊंचाई में स्थित चीड़बासा में उपकरण लगाये गये। जिससे कुछ साल बाद जो नतीजे मिले वो चौंकाने वाले थे। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी ने बताया,  "शोध में पता चला कि जनवरी में ब्लैक कार्बन भारत से नहीं, बल्कि यूरोप के देशों से पश्चिमी विक्षोभ के साथ आ रहा है। जनवरी में जब पश्चिमी विक्षोभ बारिश लेकर आता है, उसी के साथ ये गैस भी हवाओं के साथ आती है। इसका मतलब, ग्लेशियरों के पिघलने का कारण जितना लोकल है और राष्ट्रीय है, उतना ही ग्लोबल भी है।"

दो तरह का प्रदूषण पहुंच रहा है हिमालय में

इस समय हिमालय में दो तरह का प्रदूषण पहुंच रहा है। एक है बायो मास प्रदूषण (कार्बन डाइऑक्साइड) और दूसरा है एलिमेंट पोल्यूशन (तत्व आधारित प्रदूषण) जो कार्बन मोनोऑक्साइड उत्पन्न करता है। ये दोनों ही तरह के प्रदूषण ब्लैक कार्बन बनाते हैं जो ग्लेशियर के लिये खतरनाक होते हैं। वरिष्ठ भू वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी बताते हैं कि, यूरोप से केवल तत्व आधारित प्रदूषण ही हिमालय तक पहुंच रहा है। इसको हम अंतर्राष्ट्रीय फोरम पर रखकर विरोध जतायेंगे।

क्या होंगे दुष्प्रभाव

तेज़ी से पिघलते ग्लेशियर आने वाले वक्त के लिए घातक साबित हो सकते हैं। इससे नदियों में पानी का स्तर कम हो सकता है। जिससे न केवल सिंचाई व्यवस्थाओं पर बल्कि हाइड्रो प्रोजेक्ट्स भी बेकार साबित होंगे। वहीं बागवानी की बात करें तो ‘गोल्डन डिलीसियस’ और ‘रेड डिलीसियस’ खत्म होने के कागार पर पहुंच गई है। वहीं स्नो लाइन के पचास मीटर और नीचे खिसकने से काश्तकारों के सामने बड़ी मुसीबत आ सकती है। सेब की सबसे उम्दा प्रजाति गोल्डन डिलीसियस और रेड डिलीसियस के बगीचे स्नो लाइन के खत्म होने के बाद से ही शुरू होते है। उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में सत्तर फीसदी तक दोनों प्रजाती की क्वालिटी घट गई है। ऐसा, मध्य हिमालय में परमनेंट स्नो लाइन (स्थाई हिम रेखा) के काफी पीछे चले जाने से हुआ है। सेबों की पैदावार की ख़राब क्वालिटी होने से उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू कश्मीर के सीमांत काश्तकारों ने तो सेब के बजाए अन्य विकल्पों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है।

सभी फोटो : मनमीत

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और यायावर हैं।)

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Uttrakhand
Environment
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