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आंदोलन
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भारत
राजनीति
कृषि कानूनों की वापसी का कारण सिर्फ़ विधानसभा चुनाव नहीं
ऐतिहासिक किसान आंदोलन महज 3 काले कानूनों की वापसी और एमएसपी के कानून बनाने आदि की कुछ मांगों तक सीमित नहीं रह गया है। यह हर किस्म के दमन, नाइंसाफी, देश की संपत्तियों व संसाधनों की लूट और सत्ता के तानाशाही रवैये के खिलाफ प्रतिरोध का मजबूत मंच बन गया है।
अफ़ज़ल इमाम
23 Nov 2021
kisan
लखनऊ महापंचायत की तस्वीर। साभार : किसान एकता मोर्चा

प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर अपनी चिरपरिचित शैली में कृषि से जुड़े तीन विवादित कानूनों को निरस्त करने की घोषणा करके सभी को चौंका दिया है। 19 नवंबर की सुबह हुई इस घोषणा के बाद गोदी मीडिया के एंकर्स और स्क्रिप्ट राइटर्स दोनों के सुर-ताल बिगड़ गए। किसी के समझ में नहीं आ रहा था कि बोलना क्या है? 

रिपोर्टर कैमरे लेकर फील्ड की ओर दौड़ पड़े और फिर दोपहर से बताया जाने लगा कि ‘मोदी जी मैन ऑफ एक्शन’ हैं और यह उनका 'मास्टर स्ट्रोक' है, जिससे विपक्ष चारों खाने चित हो गया है...।  

वैसे आमतौर पर कहा जा रहा है कि यूपी, उत्तराखंड और पंजाब के चुनावों में भाजपा की जमीनी स्थिति को भांपते हुए मोदी ने इन कानूनों को वापस लेने का फैसला किया है। काफी हद तक यह बात सही भी है, लेकिन बड़ी वजह यह है कि ऐतिहासिक किसान आंदोलन महज 3 काले कानूनों की वापसी और एमएसपी के कानून बनाने आदि की कुछ मांगों तक सीमित नहीं रह गया है। यह हर किस्म के दमन, नाइंसाफी, देश की संपत्तियों व संसाधनों की लूट और सत्ता के तानाशाही रवैये के खिलाफ प्रतिरोध का मजबूत मंच बन गया है।

साथ ही यह देश पर मंडराते क्रोनी कैपिटलिज्म व कुलीन तंत्र (Oligarchy) के खतरे और  इसका रास्ता साफ करने वाली सामाजिक बंटवारे की राजनीति की राह में रोड़ा बन रहा है। इतना ही नहीं इसने हताश-निराश पड़े विपक्ष को भी ऑक्सीजन दी है, जो अब पहले से अधिक मुखर हुआ है। यह सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में काम करने वाले मजदूरों-कामगारों व युवाओं के आंदोलनों का भी प्रेरणा स्रोत बन रहा है।

दरअसल खेती-किसानी से जुड़ी समस्याओं को लेकर किसानों में गुस्सा तो पिछले कई वर्षों से पनप रहा था, लेकिन एक झटके में इन तीनों कानूनों को पारित करने के बाद इसमें उबाल आ गया और वे पंजाब, हरियाणा, यूपी, उत्तराखंड व मध्य प्रदेश आदि राज्यों से दिल्ली की ओर कूच करने को मजबूर हो गए।

पंजाब से आ रहे किसानों को रोकने के लिए सड़कें खोद दी गईं, सीमेंट के बैरिकेट्स लगा दिए गए, पुलिस ने लाठियां भांजी और वाटर कैनन का इस्तेमाल हुआ, लेकिन इन सारी बाधाओं को पार करते हुए वे दिल्ली की सीमाओं तक पहुंच गए और वहीं अपना डेरा-डंडा जमा दिया। इन तीनों कानूनों के बनने के बाद किसानों को लगा कि देश के 25 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक के कृषि उपज कारोबार पर कुछ पूंजीपतियों का पूरी तरह से कब्जा हो जाएगा और उनकी स्थिति एक बंधुआ मजदूर जैसी हो जाएगी। बड़ी पूंजी वाली कंपनियां जब चाहेंगी कीमत गिरा कर किसानों से उपज खरीद कर स्टाक कर लेंगी और फिर कुछ समय बाद उसे अपने मनमाने रेट पर बेचेंगी।

यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहा है, लेकिन कारपोरेट घरानों व पूंजीपतियों के खिलाफ गुस्सा इतना ज्यादा बढ़ गया कि कुछ लोगों ने पंजाब में एक दिग्गज कंपनी के कुछ मोबाइल टावरों को नुकसान पहुंचा दिया। यह वही कंपनी है, जिसके विज्ञापन पर पीएम मोदी की तस्वीर छपी थी। तोड़फोड़ की घटना कुछ ही जगहों पर हुई थी, लेकिन इसने समूचे कॉर्पोरेट जगत और सिस्टम को झकझोर कर रख दिया। उन्हें एहसास हो गया कि गांवों में रहने वाली आम जनता अब सब कुछ अच्छी तरह समझने लगी है।

इसके बाद से ही गोदी मीडिया के कुछ चैनलों पर सांप्रदायिक और जहरीली बहसों का सिलसिला तेज हो गया और माहौल को दूसरी तरफ मोड़ने की कोशिश की जाने लगी। फिर दो माह बाद कोरोना की दूसरी लहर आ गई, जिसके बाद सब कुछ ठप्प पड़ा गया। दूसरी लहर इतनी प्रचंड थी कि इस बार गोदी मीडिया कोई नया ‘मरकज़’ या ‘कोरोना जेहादी’ भी नहीं खोज पाया।

जब महामारी का असर कम हो गया तो जून से वही तमाशा फिर से शुरू हो गया। कभी सहारनपुर में हैंडपंप विवाद तो कभी गाजियाबाद में बुजुर्ग की दाढ़ी काटने का मामला तो कभी धर्मांतरण और जनसंख्या नीति का ड्राफ्ट। इस दौरान तालिबान के मुद्दे का भी जमकर इस्तेमाल हुआ। अगस्त में इंदौर में तस्लीम नामक युवक की धर्म के पर पिटाई गई। इसके बाद कानपुर में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने जयश्री राम का नारा लगाते हुए अफसार नमक रिक्शा चालक को उसकी मासूम बेटी के सामने पीटा। सितंबर में यूपी कैडर के एक आईएएस अधिकारी इफ्तिखारउद्दीन का वीडियो आने के बाद धर्मांतरण के मुद्दे पर फिर से हंगामा शुरू हो गया। गोदी चैनलों ने इसे काफी बढ़ा चढ़ा कर दिखाया।

इस तरह के कुछ अन्य छिटपुट मामलों को लेकर माहौल को दूषित करने के प्रयास किया गया। फिर इसी माह अलीगढ़ में 14 तारीख को एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें पीएम मोदी ने राजा महेंद्र सिंह विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी। इसमें भी गोदी मीडिय़ा ने अपना ज्यादा समय यह बताने में खर्च किया कि प्रधानमंत्री ने इसके जरिए जाट बिरादरी को बड़ा संदेश दे दिया है। संभवतः ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि धरने में बड़ी संख्या उन किसानों की है जिनका संबंध जाट बिरादरी से है। इस मौके पर अलीगढ़ का नाम हरिगढ़ करने का मुद्दा भी जोरशोर से उठाया गया। अक्टूबर के अंत में त्रिपुरा से हिंसा की खबरें आती रहीं, जिसे गोदी मीडिया बार-बार झुठलाता रहा। फिर 7 नवंबर को दिल्ली में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई जिसमें यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शामिल हुए और उन्होंने ही राजनीतिक प्रस्ताव पेश किया। बैठक खत्म होने के ठीक दूसरे दिन वे पश्चिमी यूपी के कैराना पहुंचे और वहां 250 करोड़ रूपए की लागत से बनने वाले पीएसी बटालियन परिसर का शिलान्य़ास किया। इस मौके पर आयोजित रैली में उन्होंने पलायन का मुद्दा जोरशोर से उठाया। पिछले विधानसभा चुनाव के समय भी यह मामला काफी गर्म हुआ था।

कैराना में योगी की रैली खत्म ही हुई थी कि कासगंज से आल्ताफ नामक 21 वर्षीय नौजवान की पुलिस हिरासत में मौत की खबर आ गई, जिसके बारे में बताया गया कि उस नौजवान ने जमीन से ढाई फीट ऊपर लगे प्लास्टिक के पाइप से लटक कर आत्महत्या कर ली। सावरकर, जिन्ना व हिन्दुत्व आदि मुद्दों को भी लगातार गरम करने की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन आम जनता की इनमें कोई दिलचस्पी नहीं है। लोग अपनी दाल-रोटी का इंतजाम करने में व्यस्त हैं। कहने का अर्थ यह कि यदि उपरोक्त घटनाक्रमों को देखा जाए तो इनसे समाज में वैमनस्य और ध्रुवीकरण बढ़ना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके उलट दिल्ली से सटे गुड़गांव से आई एक खबर ने सभी को चौंका दिया। वहां कुछ स्थानीय हिंदुओं और सिखों ने मुसलमानों को जुमें की नमाज़ पढ़ने के लिए अपनी जगहें मुहैया कराने की पेशकश कर दी है। सिखों ने नमाज़ के लिए अपने गुरुद्वारे खोल दिए हैं। गुरुग्राम में जुमे की नमाज़ लबें अर्से से विवाद विषय बनी हुई है। मस्जिदों की संख्या कम होने व दूरी के कारण वहां काम करने वाले मुसलमान प्रशासन की अनुमति से कुछ सार्वजनिक जगहों पर जुमें की नमाज पढ़ते हैं, लेकिन दक्षिणपंथी संगठनों ने इसके खिलाफ अभियान छेड़ दिया है।

सिर्फ गुरुग्राम ही नहीं देश के अन्य हिस्सों से भी सद्भभाव और भाईचारे की खबरें सोशल मीडिया के जरिए निरंतर आ रही हैं। जाहिर है यह उन लोगों व संगठनों के लिए परेशानी का सबब है, जो समाज में घृणा और उन्माद पैदा कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकते हैं। वर्तमान में इनके मंसूबे कामयाब नहीं हो पा रहे हैं, तो उसकी एक बड़ी वजह किसान आंदोलन है, जिसने जनता को उसके बुनियादी सवालों और देश हित के बारे में सोचने पर मजबूर किया है। अब 3 कानूनों की वापसी की घोषणा कर इस आंदोलन को खत्म कराने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं।

हो सकता है कि आने वाले दिनों में किसानों की बाकी मांगों पर भी आश्वासन दे दिए जाएं, जिसके बाद वे अपने घरों व खलिहानों का रुख कर लें। निश्चित रूप से कोई आंदोलन हमेशा के लिए नहीं होता है, लेकिन अपने पीछे वह जो विचार और संदेश छोड़ जाता है, उसका असर लंबे लम्बे समय तक रहता है।  

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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