NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
हम लड़ेंगे साथी, जब तक लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है
फैनन के सबसे अहम विचारों में से एक यह है कि कोई बुद्धिजीवी रोज़मर्रा के संघर्ष छोड़ कर सीधा सार्वलौकिक दुनिया में छलाँग नहीं लगा सकता।
ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
15 Mar 2020
हम लड़ेंगे साथी, जब तक लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है
मोहम्मद इस्साखेम, महिला और दीवार, 1970

 ये एक तकलीफ़देह दौर है। नुक़सान और मौत के आँकड़े भयावह हैं। लोग भूख से संघर्ष कर रहे हैं; लगभग 90 लाख लोग हर साल कुपोषण से मर रहे हैं (हर दसवें सेकंड दुनिया के किसी-न-किसी कोने में एक बच्चा मर जाता है)।

हम में से बहुत से पत्रकार और लेखक एक मुंशी की तरह इस पीड़ा को दर्ज करने में लगे हुए हैं। हर तरफ़ उदासी छाई हुई है, आम लोगों की ज़िंदगी वीरान है। आशा और उम्मीद की बातें प्रेरणा नहीं देती, गाली जैसी लगती हैं। जंगल जल रहे हैं। आप्रवास की क्रूर त्रासदियों से ‘बचने’ के लिए लोग भूमध्यसागर में डूबने को मजबूर हैं। चिहुआहुआन रेगिस्तान में महिलाओं के मृत शरीर मिलते हैं। फासीवादी गुंडे दिल्ली की सड़कों पर खुले घूम रहे हैं। आशा-भरी बातों और इन निराशाजनक परिस्थितियों के बीच का अंतर बहुत बड़ा है; इनके बीच कोई पुल नहीं है। हम घाव में रह रहे हैं। ये इसी घाव में से लिखा गया पत्र है।

जिधर देखिए उधर से ही चौंकाने वाली ख़बरें आरही हैं। आज के समय के कीवर्ड्स एकदम स्पष्ट और सरल हैं: COVID-19, वित्तीय संकट, जलवायु परिवर्तन, नारी-संहार, नस्लवाद, और नव-फासीवादी राजनेताओं का बेहूदा ढीठपन और उनके द्वारा गली-मोह्हलों में संचालित की जा रही उपद्रवी भीड़। पूरी दुनिया में जो कुछ हो रहा है जिससे हर कोई आहत है उन परिस्थितियों से भयभीत होने के लिए बहुत गहराई से सोचने की ज़रूरत नहीं है। सामाजिक सम्बंध जितनी तेज़ी से ख़त्म हो रहे हैं वैसे हालात में घबराहट एक सामान्य प्रतिक्रिया है।

सामाजिक बंधनों या समाज के प्रारूप का विचार इस समय के लिए अति-आवश्यक है। शिष्टता से समाज को अनुभव करना लगातार कठिन होता जा रहा है| नव-फासीवाद द्वारा प्रचारित जहरीले पौरुषत्व में राजनीतिक संभाषण मानो गटरों में लिखे जा रहे हैं और जन की पीर के प्रति आम सहानुभूति नदारद होती जा रही है। यह केवल एक राजनीतिक वर्ग की समस्या नहीं है; इस समस्या को व्यक्तिगत जीवन को समृद्ध बनाने वाली राज्य-व्यवस्था और सामाजिक संस्थाओं के क्षरण से जोड़ कर देखा जाना चाहिए। अगर लोग आसानी से नौकरी ना पा सकें, अगर नौकरियाँ तनाव पैदा करें, अगर नौकरी पर पहुँचने में अधिक-से-अधिक समय लगने लगे, अगर चिकित्सा-देखभाल प्राप्त करना महँगा होता जाए, अगर व्यय और कर बढ़ने से पहले ही पेंशन-भत्ते गिरने लगें, और अगर ज़िंदगी जीना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जाए तो समाज में निराशा छा जाएगी और लोगों की मनोदशा आमतौर पर दुःख, ग़ुस्से और कलह से ही परिभाषित होगी।

शिष्टता सिर्फ दृष्टिकोण का विषय नहीं है। शिष्टता संसाधनों का विषय भी है। यदि विश्व के प्रचुर संसाधनों का इस्तेमाल हम एक दूसरे के लिए अच्छी आजीविका सुनिश्चित करने, चिकित्सा व देखभाल सुनिश्चित करने और लोगों की समस्याओं को सामूहिक रूप से हल करने में लगाएँ तो सबके पास दोस्तों के साथ और अपने समुदायों में समय बिताने व नए लोगों को जानने की फ़ुर्सत होगी; ज़ाहिर है लोग तनावग्रस्त और क्रोधित भी कम होंगे। इसी तरह ‘आशा’ या ‘उम्मीद’ व्यक्तिगत भावनाएँ नहीं है; ये समुदाय-निर्माण और अपने मूल्यों के लिए मिलजुल कर काम करने वाले लोगों में ही फलती हैं।

1.JPG

डॉसियर का बैनर

‘महान घाव’ का विचार हमें फ्रांत्ज फैनन से मिलता है, जिन्होंने ‘द अल्जीरियन फैमिली’ (1959) में लिखा है कि क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों को ‘अल्जीरिया की वास्तविकता को बहुत बारीकी से देखना चाहिए। हमें केवल इसके ऊपर से उड़ नहीं जाना चाहिए। बल्कि, अल्जीरियाई मिट्टी और अल्जीरियाई लोगों पर किए गए इस महान घाव के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए’। अल्जीरिया अपना राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष लड़ रहा था; जिसे फ़ैनन ने फ्रांस के खिलाफ उसका ‘भ्रमात्मक युद्ध’ कहा था। इस 'महान घाव' में से उठे मानव-मूल्य के प्रतिज्ञान पर औपनिवेशिक हिंसा का क़हर बरपा था। बढ़ती हिंसा और विकट होते हिंसा के तरीक़ों में, हमारा घाव भी उसी तरह से ‘भ्रमात्मक’ है और संघर्ष की तात्कालिकता को चिह्नित करता है।

ट्राईकॉन्टिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान के जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) कार्यालय ने मार्च 2020 का डॉसियर-26 ‘फ्रांत्ज फैनन: एक धातु की चमक’ तैयार किया है। फैनन के मूल लेखों और उनसे प्रभावित व उनके विचारों को विकसित करने वाले अन्य लेखकों के काम से प्रेरणा लेकर ये डॉसियर वर्तमान समय के लिए एक महत्वपूर्ण विचारक के काम का सबसे अच्छा व संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करता है। फैनन के सबसे अहम विचारों में से एक यह है कि कोई बुद्धिजीवी रोज़मर्रा के संघर्ष छोड़ कर सीधा सार्वलौकिक दुनिया में छलाँग नहीं लगा सकता; डॉसियर बताता है कि फैनन अपने ‘वर्तमान की विशिष्ट स्थितियों में स्थायी, साहसी, और उग्र रूप से गतिवान थे’। क्योंकि घाव से मुक्ति ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं मिलती; नई मानवता के निर्माण के लिए हीगल के अनुसार ‘गम्भीरता, पीड़ा, धीरता और नकारात्मकता के श्रम की आवश्यकता होती है’; और फैनन के अनुसार, अपने समय व परिस्थितियों के संघर्षों में प्रतिबद्ध रहने की ज़रूरत होती है।
2.JPG

सुहाद ख़ातिब, फ्रांत्ज फैनन, इंक ऑन पेपर, 18x24, 2019

फ़ैनन ने कहा था कि, हर पीढ़ी को अपने लिए एक मिशन मिल जाता है। फ़ैनन के समय पर यह मिशन राष्ट्रीय मुक्ति के लिए संघर्ष करना था; उनका मानना था की राष्ट्रीय मुक्ति वास्तविक अंतर्राष्ट्रीयता का अहम पहलू है। यही कारण है कि मार्टीनिक में जन्मे फैनन अल्जीरियाई लोगों के संघर्ष में शामिल हो गए; वो अल्जीरिया के संघर्ष को तीसरी दुनिया के संघर्षों से अलग करके नहीं देखते थे। वो पहली बार बतौर अल्जीरियाई प्रतिनीधि दिसंबर 1958 में घाना की ऑल-अफ्रीकन पीपुल्स कांग्रेस में शिरकत करने गए। घाना में ही उन्हें क्वामे नक्रमा (घाना), जूलियस न्येरे (तंजानिया), सेको टूरे (गिनी) और पैट्रिस लुमंबा (कांगो) से मिलने का मौक़ा मिला। फ़ैनन ने अल्जीरिया में दक्षिणी सीमा के माध्यम से हथियार मंगवाने के लिए घाना, गिनी और माली से समर्थन जुटाने की कोशिश की (उन्होंने सितंबर 1960 में माली से अल्जीरिया तक के पुराने व्यापार मार्गों को परखने के लिए यात्राएँ की)। जब अगस्त 1960 में कांगो में लुमंबा को धमकाया जाने लगा तो फैनन ने ऑल-अफ्रीकन पीपुल्स कांग्रेस के सदस्यों से सरकार की सहायता के लिए एक अफ्रीकी सेना भेजने का आग्रह किया, हालाँकि ऐसा नहीं किया गया। फ़ैनन में उपनिवेशित अफ़्रीका और अन्य औपनिवेशित देशों के आज़ाद होने की आशा की कोई सीमा नहीं थी।

जब 17 जनवरी 1961 को लुमंबा की हत्या कर दी गई, तो फ़ैनन ने उनके लिए एक मार्मिक शोक-संदेश लिखा। लुमंबा को क्यों मारा गया? फैनन ने लिखा कि, ‘लुमंबा को अपने मिशन में विश्वास था’— अपने लोगों को आज़ाद करने का मिशन, और ये सुनिश्चित करने का भी कि संपन्न कांगो में आम जन गरीबी में और तिरस्कार से जीने को मजबूर ना हों। लुमंबा अपने इसी मिशन के लिए मारे गए थे; फैनन का भी इस मिशन पर पक्का विश्वास रहा। ‘यदि लुमंबा रास्ते में आता है तो, लुमंबा गायब कर दिया जाएगा’ फैनन ने लिखा था। फ़ैनन के लिए जीवित होने का मतलब है ख़ुद को किसी ऐसे मिशन में समर्पित कर देना, आने वाले संघर्षों में शामिल होना; इन्हीं से मानव-मुक्ति का ‘सृजन’ होता है। लुमंबा 1961 में मारे गए, लेकिन ‘अगले लुमंबा का नाम किसी को नहीं पता’— फ़ैनन ने वास्तविकता और गहरी आशा के साथ लिखा था। संघर्ष की ज़रूरत ही नए नेतृत्व के साथ नया आंदोलन खड़ा करेगी; यह अपरिहार्य था। ‘आशा’ इसी अपरिहार्यता में मौजूद है।

3.JPG

फ़ैनन के दर्शन एवं प्रासंगिकता पर चर्चा

5 मार्च को, जोहान्सबर्ग के एक जीवंत छात्र जिले -ब्रैमफोंटीन- के ‘द फोर्ज’ में फ़ैनन के दर्शन एवं प्रासंगिकता पर चर्चा के दौरान डॉसियर 26 लॉन्च किया गया। इस सभा में ज़मीनी-स्तर के क्रांतिकारियों, ट्रेड यूनियन सदस्यों, कलाकारों, छात्रों और शिक्षाविदों ने भाग लिया; इनके साथ ही माबोगो पी॰ मोर और ‘विद्रोही बिशप’ कहे जाने वाले रुबिन फिलिप सरीखे प्रख्यात दार्शनिक भी शामिल थे। फ़ैनन के विचारों पर लिखने/शोध करने वाले अग्रणी विद्वानों में निगेल गिब्सन, लुईस गॉर्डन, माइकल नियोकोसमोस, और ज़िखोना वैलेला ने एक शिक्षक, चिकित्सक और सिद्धांतकार के रूप में फैनन के विभिन्न लेखों पर चर्चा की। ये चर्चा उपनिवेशवाद के बाद की परिस्थितियों के भीतर से नई प्रेक्सिस (अवतारित सैद्धांतिक अभ्यास) की रचना की सम्भावनाओं और ‘महान घाव’ के प्रतिरोध और इससे निकलने में संगठन की भूमिका पर केंद्रित थी। इस तरह की चर्चाओं से क्रांतिकारी उम्मीद पैदा होती है, और संघर्षों की गहनता से गुज़रते हुए ये मुक्तिवादी विचार धातु की चमक ले लेते हैं।4.JPG

क्लाउडिया जोन्स, 1915-1964

क्लाउडिया जोन्स का जन्म फ़ैनन से दस साल पहले स्पेन के बंदरगाह (त्रिनिदाद और टोबैगो) में हुआ था। जोन्स अपने माता-पिता के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका चली गयीं; और 1936 में स्कॉट्सबोरो प्रतिवादियों को बचाने के अभियान के दौरान जोन्स कम्युनिस्ट बन गयीं। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स (CPUSA) की सदस्य, जोन्स को 1955 में यूनाइटेड किंगडम भेज दिया गया (वहाँ उन्होंने नॉटिंग हिल कार्निवल की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई)। जोन्स ने USSSR और चीन के साथ-साथ दुनिया भर में यात्राएँ की और महिला इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक फेडरेशन की कोपेनहेगन में 1952 की बैठक सहित अनेकों बैठकों में शामिल रहीं।

1949 में जोन्स ने CPUSA की सैद्धांतिक पत्रिका -पॉलिटिकल अफेयर्स- में एक ऐतिहासिक निबंध लिखा। इस निबंध का शीर्षक था ‘नीग्रो महिलाओं की समस्याओं की अनदेखी ख़त्म होनी चाहिए’। यह निबंध नस्लवाद और उसकी अकर्मण्यता के सवाल से सीधे जुड़ता है। अपने निबंध में कई बार, जोन्स ‘विशेषकर’ शब्द का उपयोग करती हैं। वह ज़ोर देकर कहती हैं कि, किसी भी संख्या में लोगों पर अत्याचार होता हो, या कि काले श्रमिकों का प्रखर शोषण हो रहा हो, लेकिन फिर भी व्यवस्था ‘विशेषकर’ काली महिला श्रमिकों को ‘असाधारण क्रूरता’ से दंडित करती है। इस ‘असाधारण क्रूरता’ को ध्यान में रखते हुए वो कहती हैं कि मुक्ति/आज़ादी का कोई भी विश्लेषण उत्पीड़न के विभिन्न पदानुक्रमों के विशिष्ट मूल्यांकन से गुज़रना चाहिए, और उत्पीड़न की प्रत्येक परत (जिसे जोन्स ‘स्ट्रेटम’ कहती हैं) के विशिष्ट तर्क इस मूल्यांकन में शामिल होने चाहिए। उत्पीड़न की ‘विशिष्टता' इस बात पर जोर देती है कि मुक्ति/आज़ादी के विश्लेषण में वर्ग, नस्ल और जाति को गंभीरता से लिए जाने के साथ, ये विश्लेषण और उससे उभरने वाली प्रेक्सिस लिंग/जेंडर के सवालों पर केंद्रित होनी चाहिए। (ट्राइकांटिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान से प्रकाशित नारीवादी अध्ययन # 1 में हम इस बात को स्वीकारते हैं)।

इस विश्लेषणात्मक विशिष्टता के साथ जोन्स मानती हैं कि, दुनिया भर में पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष काली महिलाओं की अगुवाई में होने चाहिए। जोन्स लिखती हैं कि काली महिलाओं की विशिष्ट स्थिति और उनपर होने वाली ‘असाधारण क्रूरता’ को गंभीरता से लिया जाना चाहिए; काली महिलाओं को व्यापक संघर्षों से अलग-थलग करने के लिए नहीं; बल्कि इसलिए कि यदि काली महिलाओं के मुद्दों को ‘उठाया’ जाएगा, ‘तो वे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के सर्वहारा नेतृत्व’ में अपनी ‘सही जगह' ले लेंगी, और ‘अपनी सक्रिय भागीदारी से पूरे अमेरिकी श्रमिक वर्ग में अहम भूमिका निभाएँगी’। अमेरिकी श्रमिक वर्ग का ‘ऐतिहासिक मिशन एक समाजवादी अमेरिका की स्थापना करना रहा है— जहाँ स्त्री-मुक्ति की अंतिम और पूर्ण गारंटी सुनिश्चित होगी’। यहां प्रमुख शब्द ‘नेतृत्व’ है।

जोन्स को फिर से पढ़ते हुए, मैं कल्पना कर रहा हूँ उन्हें फैनन से इन अंतरराष्ट्रीय बैठकों में से किसी एक बैठक में मिलते हुए - ताशकंत या बेरूत में कहीं। मैं इन दोनों को अपने-अपने क्रांतिकारी सिद्धांतों पर चर्चा करते हुए देखने लगता हूँ; कैरिबियन के दो परिवर्तनवादी चिंतक जैसे मार्क्स का ‘थोड़ा विस्तार’ करने पर बात-चीत कर रहे हों। ये समुचित ही था कि फैनन को अल्जीरिया में दफनाया गया था, और जोन्स को लंदन के हाईगेट कब्रिस्तान में मार्क्स के बाईं ओर। ये दोनों उल्लेखनीय बुद्धिजीवी इस बात पर जोर देते हैं कि बुद्धिजीवी अपने समय के ज़रूरी मिशन में भाग लें और उत्पीड़न की विशिष्टताओं को गहराई से समझते हुए महान घाव से बाहर निकलने में लोगों की मदद करें।

Fainen
Algeria
Karl Marx
Revolutionary intellectual
Illusionary War
Coronavirus

Related Stories

समाजवाद और पूंजीवाद के बीच का अंतर

महाशय, आपके पास क्या मेरे लिए कोई काम है?

मज़दूर दिवस : हम ऊंघते, क़लम घिसते हुए, उत्पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे

प्रधानमंत्री जी... पक्का ये भाषण राजनीतिक नहीं था?

कोविड-19 टीकाकरण : एक साल बाद भी भ्रांतियां और भय क्यों?

लॉकडाउन-2020: यही तो दिन थे, जब राजा ने अचानक कह दिया था— स्टैचू!

एक महान मार्क्सवादी विचारक का जीवन: एजाज़ अहमद (1941-2022)

कोरोना के दौरान सरकारी योजनाओं का फायदा नहीं ले पा रहें है जरूरतमंद परिवार - सर्वे

जिनकी ज़िंदगी ज़मीन है: तंजानिया में किसानों के संघर्ष

हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक


बाकी खबरें

  • Kapur Commission Report and Savarkar's Role in Gandhi’s Assassination
    न्यूज़क्लिक टीम
    कपूर कमीशन रिपोर्ट और गाँधी की हत्या में सावरकर की भूमिका
    14 Nov 2021
    हाल ही में AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि सावरकर दरअसल गाँधी की हत्या का ज़िम्मेदार थाI इससे गाँधी की हत्या से जुड़े सवाल एक बार फिर बहस के केंद्र में आ गएI 'इतिहास के पन्ने' के इस अंक में…
  • elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव पर न्यूज़क्लिक का नया कार्यक्रम- चुनाव चक्र
    14 Nov 2021
    आज देश अहम मोड़ पर खड़ा है। इस मोड़ से आगे का रास्ता देश में अगले साल 2022 की शुरुआत में पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों से तय होगा। तय होगा कि 2024 के आम चुनाव में देश क्या फ़ैसला लेगा…
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : जवाहरलाल नेहरू जन्मदिन विशेष
    14 Nov 2021
    भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन और बाल दिवस के मौक़े पर पढ़िये उन पर लिखी 2 नज़्में... 1. जवाहरलाल नेहरू: अबरार किरतपुरी
  • malnutrition
    राज वाल्मीकि
    कुपोषित बच्चों के समक्ष स्वास्थ्य और शिक्षा की चुनौतियां
    14 Nov 2021
    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नवम्बर 2020 तक देश में 9.28 लाख से ज्यादा बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित थे। इनमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में और फिर बिहार में हैं।
  • साभार : सुमन सिंह के फेसबुक वाल से
    डॉ. मंजु प्रसाद
    पर्यावरण, समाज और परिवार: रंग और आकार से रचती महिला कलाकार
    14 Nov 2021
    ऐसा कलाकार जब प्रकृति को ठोस मेटलिक माध्यम द्वारा कठोर नुकीले घास के रूप में निर्मित करती हैं, यह अत्यंत गंभीर विषय है जो केवल पर्यावरण को ही नहीं वर्तमान मनुष्य जीवन को और उसके संकट को भी दर्शाता…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License