NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
आरबीआई 'विलफुल डिफॉल्टर्स' के नामों का खुलासा करेगा?
सूचना आयुक्त आचार्युलु के पत्र से पता चलता है कि केंद्रीय सूचना आयोग पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर रहा है।
विवान एबन
21 Nov 2018
RBi defaulters

इस वर्ष 16 नवंबर को सूचना आयुक्त एम श्रीधर आचार्युलु ने भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के उस आधार को ख़ारिज करते हुए एक आदेश दिया था जिसमें बैंक ने 50 करोड़ रुपए और उससे अधिक के क़र्ज़ वाले विलफुल डिफॉल्डर्स का नाम को उजागर करने से इंकार कर दिया था। संदीप सिंह जादौन द्वारा दायर सूचना अधिकार अधिनियम (आरटीआई अधिनियम) के तहत एक आवेदन के बाद ये मामला सामने आया, जिन्होंने विलफुल डिफॉल्टर्स के ब्योरे की मांग के अलावा श्रम तथा रोज़गार मंत्रालय से संबंधित असफल सरकारी परियोजनाओं के विवरण की मांग की थी। हालांकि आचार्युलु द्वारा पारित आदेश सराहनीय हैं, मुख्य सूचना आयुक्त आरके माथुर को उनके द्वारा लिखे गए एक पत्र से पता चलता है कि पारदर्शिता के लिए देश के उच्चतम संस्थान में सबकुछ ठीक नहीं हैं।

आरबीआई के ख़िलाफ़ आदेश देने के तीन दिन बाद आचार्युलु ने केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त आरके माथुर को इस आदेश से एक सप्ताह पहले 8नवंबर को हुई बातचीत के बारे में लिखा था। आचार्युलु के पत्र के अनुसार ऐसा लगता है कि माथुर आरबीआई से संबंधित मामलों के बारे में बात करने के लिए उनके कमरे में आए थे। आचार्युलु के पत्र ने कथित रुप से माथुर की चार टिप्पणियों और उनकी प्रतिक्रिया पर प्रकाश डाला। यहां ध्यान दिया जाना चाहिए कि चर्चा करने का मामला जो आचार्युलु द्वारा कारण बताओ नोटिस से संबंधित है वह इस वर्ष 20 सितंबर को जारी किया गया था।

आचार्युलु के पत्र के अनुसार माथुर ने उन्हें कहा था कि जब आरटीआई अपील का एक ज़्यादातर हिस्सा अन्य सूचना आयुक्तों को आवंटित विषयों से संबंधित है तो इसे अन्य आयुक्तों को भेजा जाना चाहिए। ऐसा नहीं करने से अलिखित प्रोटोकॉल का उल्लंघन होगा। इसके प्रति आचार्युलु की प्रतिक्रिया यह थी कि अपील में कोई मामला पृथक नहीं किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कभी इस मामले की मांग नहीं की थी और यह सामान्य रूप से उनके पास आया था। इसके अलावा उन्होंने कहा कि यह पहली बार था जब उन्होंने इस अलिखित प्रोटोकॉल के बारे में सुना था।

इस पत्र के अनुसार माथुर ने यह भी उल्लेख किया कि आचार्युलु के कार्रवाई ने इस मामले के लिए काम करने वाले अन्य सूचना आयुक्त को शर्मनाक स्थिति में डाल दिया था और इसे रोका जाना चाहिए था। इस पर आचार्युलु की प्रतिक्रिया यह थी कि एक सूचना आयोग का प्राथमिक कर्तव्य आरटीआई अधिनियम को बनाए रखना और उसे लागू करना है। सूचना आयुक्त अन्य अधिकारियों को दिशानिर्देश जारी करते हैं भले ही इस मामले को किसी अन्य आयुक्त द्वारा किया गया हो।

माथुर ने कथित रूप से उनसे कहा कि केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) को सर्वसम्मति से बोलना चाहिए और दो आयुक्तों के आदेशों के बीच कोई अंतर नहीं होना चाहिए। आचार्युलु के अनुसार माथुर ने आयोग के एक डिवीजन बेंच के आदेश का हवाला दिया जो कि आचार्युलु द्वारा दिए गए आदेश के असंगत था। इस संदर्भ में आचार्युलु ने यह कहते हुए प्रतिक्रिया दिया कि डिवीजन बेंच ने इस मामले पर कभी निर्णय नहीं दिया था और इसे अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया था क्योंकि इसी तरह की याचिका जो आरटीआई अधिनियम के अस्तित्व के पहले दायर की गई थी वह सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित थी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2015 के फैसले का हवाला दिया जिसने 11 याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया था जिसे सूचना का खुलासा करने के लिए सीआईसी के आदेशों के ख़िलाफ़ आरबीआई द्वारा दायर किया गया था।

आख़िरी कथित बयान यह था कि माथुर ने आचार्युलु को कहा था कि जब कारण बताओ नोटिस लंबित है तो मीडिया से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आचार्युलु की प्रतिक्रिया ने कारण बताओ नोटिस और आदेश के बीच अंतर किया। जब कोई आदेश दे दिया जाता है तो इसका मतलब मामला निपटा लिया गया है। वहीं जब कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया जाता है तो इसका मतलब है कि क़ानूनी कार्यवाही शुरू की गई है। उन्होंने कहा, "विलफुल डिफॉल्टर के खुलासे के बारे में क़ानूनी स्थिति की व्याख्या करने के लिए मीडिया से बात करना पूरी तरह से कानूनी, उचित और आवश्यक है। यह किसी भी अलिखित संहिता का उल्लंघन नहीं है। इसके वैधता की व्याख्या करना पारदर्शी होने का एक हिस्सा है। इसे संदिग्ध व्यवहार कहना अनुचित है। संदेह को दूर करने के लिए मीडिया से बात करना पारदर्शिता के अनुसरण में नैतिक कार्य है। लोगों को सूचित करना हमारा कर्तव्य है।"

आचार्युलु का पत्र इसी बिंदु की व्याख्या करते हुए समाप्त हुआ, और अंतिम अनुरोध शामिल किया कि, "कृपया पूर्व सीआईसी श्री शैलेश गांधी के आदेशों को लागू करने के लिए कदम उठाएं जैसा कि जयंती लाल एन मिस्त्री मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुष्टि की गई थी ताकि हमारे लोगों का विश्वास आरटीआई अधिनियम में बनी रहे और इस संस्थान को मज़बूती मिले। "

16 नवंबर का आदेश

आरबीआई ने देश के अन्य बैंकों के साथ 'भरोसेमंद रिश्ते' के लिए विभिन्न बैंकिंग नियमों में अनिवार्य गोपनीयता का हवाला देते हुए जानकारी साझा करने से इंकार कर दिया था। जो चीज इस विवाद को दिलचस्प बनाता है वह यह कि 16 दिसंबर 2015 को भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई के इसी मुद्दे से संबंधित सीआईसी के विभिन्न निर्णयों की अपील की सुनवाई के दौरान इस मामले को विराम दे दिया था।

'भरोसेमंद रिश्ते' के बारे में जिसका आरबीआई ने दावा किया था उसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि किसी भरोसेमंद रिश्ते की मुख्य विशेषताएं यह है कि एक पक्ष को दूसरे पक्ष द्वारा विश्वास की शक्ति दी जाएगी और यह शक्ति अन्य पक्ष के लाभ के लिए इस्तेमाल की जाएगी। इस तरह के रिश्ते का एक उदाहरण एक नाबालिग़ और अभिभावक का है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि आरबीआई बैंकों के हित में कार्य करने के लिए बाध्य नहीं है-चाहे वह सरकारी हो या निजी- बैंकों के साथ इसका संबंध पूरी तरह वैधानिक है और न कि स्वभाव में भरोसेमंद।

आचार्युलु ने मुख्य रूप से सर्वोच्च न्यायालय के 2015 के फैसले को मानते हुए आरबीआई के ख़िलाफ़ आदेश दिया था। उनके आदेश ने आरबीआई के ख़िलाफ़ कठोर टिप्पणी भी की।

हालांकि, आचार्युलु द्वारा लगाए गए आरोप की व्याकुलता यह है कि केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा पारित आदेश लागू करना लगभग असंभव है। इस बात पर विचार करते हुए कि एक पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त को अपने आदेश लागू करने के लिए आयोग में शिकायत दर्ज करनी थी, यह संभावना नहीं है कि आचार्युलु का आदेश लागू किया जाएगा या नहीं। यह स्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्णयों को लागू करने के लिए एक व्यवस्था पर चर्चा करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।

RBI
Central Information Commission
CIC
NPAs
R K Mathur

Related Stories

लंबे समय के बाद RBI द्वारा की गई रेपो रेट में बढ़ोतरी का क्या मतलब है?

आम आदमी जाए तो कहाँ जाए!

महंगाई 17 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर, लगातार तीसरे महीने पार हुई RBI की ऊपरी सीमा

रिपोर्टर्स कलेक्टिव का खुलासा: कैसे उद्योगपतियों के फ़ायदे के लिए RBI के काम में हस्तक्षेप करती रही सरकार, बढ़ती गई महंगाई 

आज़ादी के बाद पहली बार RBI पर लगा दूसरे देशों को फायदा पहुंचाने का आरोप: रिपोर्टर्स कलेक्टिव

RBI कंज्यूमर कॉन्फिडेंस सर्वे: अर्थव्यवस्था से टूटता उपभोक्ताओं का भरोसा

नोटबंदी: पांच साल में इस 'मास्टर स्ट्रोक’ ने अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया

तबाही मचाने वाली नोटबंदी के पांच साल बाद भी परेशान है जनता

नोटबंदी की मार

तत्काल क़र्ज़ मुहैया कराने वाले ऐप्स के जाल में फ़ंसते नौजवान, छोटे शहर और गाँव बने टार्गेट


बाकी खबरें

  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर विपक्ष का सवाल !
    17 Jan 2022
    न्यूज़चक्र में अभिसार बात कर रहे हैं समाजवादी पार्टी के चुनाव आयोग पर किए गए सवालों और धर्म संसद के मामले में हुई गिरफ़्तारी की
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    यति नरसिंहानंद न्यायिक हिरासत में, उत्तराखंड बीजेपी में खलबली और अन्य ख़बरें
    17 Jan 2022
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी हरिद्वार धर्म संसद मामला, उत्तराखंड बीजेपी में चल रही हलचल और अन्य ख़बरों पर
  • poisonous liquor
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः पूर्ण शराबबंदी के बावजूद ज़हरीली शराब से जा रही लोगों की जानें
    17 Jan 2022
    "ज़हरीली शराब से हुई मौतों के प्रति सरकार व प्रशासन का रवैया असंवेदनशील व ग़ैर ज़िम्मेदाराना है। सत्ता के संरक्षण व पुलिस तंत्र के सहयोग से ज़िला में शराब का ग़ैरक़ानूनी तंत्र चल रहा है।"
  • akhilesh
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव:  बीजेपी को नहीं पचा अखिलेश का ‘अन्न संकल्प’
    17 Jan 2022
    सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने किसानों के वोट साधने के लिए अन्न संकल्प लिया है, और किसानों से कई वादे किए हैं। जिसके बाद बीजेपी भी अखिलेश यादव पर हमलावर हो गई।
  • Scenes from the Kashmir press club
    अनीस ज़रगर
    कश्मीर प्रेस क्लब पर जबरन क़ब्ज़े पर पत्रकारों की संस्थाओं ने जताई नाराज़गी और हैरानी
    17 Jan 2022
    केपीसी में “राज्य समर्थित” तख़्तापलट पर पत्रकारों द्वारा बड़े पैमाने पर आक्रोश जताया जा रहा है। इसे जम्मू-कश्मीर में स्वतंत्र अभिव्यक्ति और स्वतंत्र पत्रकारिता के दमन को तेज करने के लिए उठाया गया क़दम…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License