NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
राजनीति
जैव विविधता से लेकर समोसे तक : सब कुछ दूषित?
सरकारें उपभोक्ताओं की सुरक्षा और आधिकारिक तौर पर स्वीकृत नहीं किए गए बीज के किस्मों के प्रसार को रोकने के साथ-साथ उनकी विषाक्तता और कैंसरशीलता की जांच के लिए भी जिम्मेदार होती हैं।
इंद्र शेखर सिंह
13 Aug 2021
जैव विविधता से लेकर समोसे तक : सब कुछ दूषित?
चित्र साभार: रायटर्स

एक दशक से चल रहा बीज-युद्ध, सनसनीखेज कृषि-पैटेंट मामला, करोड़ों का काला बाजार तथा संभावित स्वास्थ्य आपदा, इन सभी को आपस में जो चीज जोड़ती है, वह है बीटी कपास की किस्म। भूरे रंग, बुलेट के आकार के इस किस्म का बीज आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) कपास बीज है, जो नब्बे के दशक के बाद से ही विवादों में रहा है।

शाकनाशी सहिष्णु बीटी कपास मौन्सेंटो/बेयर का एक ऐसा जीएम बीज है, जिसे आधिकारिक तौर पर अभी तक मंज़ूरी नहीं मिली है। यह कपास की खेती के तहत आने वाले कुल क्षेत्र के 25 प्रतिशत हिस्से को कवर करता है और इस समय यह पूरे दक्षिण भारत में फैल चुका है। चार दक्षिणी राज्यों में ही 450 ग्राम के पैकेट वाले इस बीज के 75 लाख से ज्यादा पैकेट इस्तेमाल हो रहे हैं और विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह गंदगी जल्द ही उत्तर भारत के किसानों को भी अपनी आगोश में ले लेगा। इसके बावजूद, कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर ने हाल ही में अपने एक बयान में कहा था कि ‘किसी जोखिम की कोई सूचना नहीं है।’

आधिकारिक बीज कंपनियों ने एक रिपार्ट में बताया है कि 2017 से इस संदूषण, खास तौर पर शाकनाशी सहिष्णु (एचटी) बीटी बीज की कालाबाजारी के चलते सालाना 200-300 करोड़ रुपये के बीच का नुकसान हो चुका है।

सवाल है कि जिस बीज को आधिकारिक तौर पर मंजूरी भी नहीं मिली है, और संभवतः नुकसानदेह और पेटेंट किया गया बीज खुद को खेतों और हमारी प्लेटों में जगह आखिर किस तरह पा लेता है? एचटीबीटी कपास की कहानी भी एक विचित्र कथा है, जिसमें जैविक संदूषण और कॉरपोरेट से होने वाली गड़बड़ियां शामिल हैं। 2008 में ट्रेट डेवेलपर मौन्सेंटो (अब बेयर) ने अपनी भारतीय सहायक कंपनी माहिको के जरिये एचटी ट्रेट के साथ राउंडअप रेडी फ्लेक्स (आरआरएफ) नामक जीएम-बोलगार्ड 2 कपास बीज का आयात किया था। राउंडअप एक ग्लाइफोसेट आधारित कीटनाशक (ग्लाइफोसेट प्लस फॉर्मुलेंट्स) है और इसे कैंसर पैदा करने वाले कीटनाशक के तौर पर जाना जाता है। अमेरिकी अदालतों ने मौन्सेंटो/बेयर को इस समय चल रहे कैंसर से जुड़े मामलों के निपटने को लेकर 10 बिलियन डॉलर का भुगतान करने का आदेश दिया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूयूएचओ) तथा स्वतंत्र वैज्ञानिकों और अदालतों ने ग्लाफोसेट (आधारित हर्बिसाइड) के ज़हरीले होने की पुष्टि की है क्योंकि उनमें आर्सेनिक जैसे भारी धातु पाई गई है। आरआरएफ किस्म राउंडअप सहिष्णु हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जैसे ही राउंडअप का खेत में छिड़काव किया जाता है, आरआरएफ किस्म को छोड़कर अन्य सभी पौधे मर जाते हैं। बेयर ने पहले ही घोषणा कर दी है कि वह अमेरिका में राउंडअप बेचना बंद कर देगी।

जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रेजल कमिटी (जीईएसी) ने माहिको को पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु में एचटीबीटी कपास बीज के लिए बड़े पैमाने पर कृषि परीक्षण करने को मंजूरी दे दी है। तीन महीनों के भीतर, जीईएसी ने पुष्टि कर दी कि एचटी ट्रेट अब पर्यावरण में जा चुका है। फिर भी गुजरात में अवैध एचटीबीटी कपास बीजों के बेचे जाने की खबर है।

जैसे ही यह ट्रेट पर्यावरण के साथ हो गया, वैसे ही इसने कपास के खेतों के बीज को संदूषित करना शुरू कर दिया। एचटी ट्रेट को भारत में खेती के लिए मंजूरी नहीं दी गई है। आठ वर्षों तक ओपेन फील्ड (सामुदायिक) खेती के बाद, 5 जुलाई, 2016 को माहिको ने जारी एचटी-बीजी2 कपास जैव-सुरक्षा परीक्षणों के जीईएसी से अपना आवेदन वापस ले लिया। सितंबर 2017 में ऐसी खबरें थीं कि एचटी कपास को अवैध रूप से खेतों में लगाया जा रहा था। इस कपास का लगभग 5-10 प्रतिशत हिस्सा ऐसा था, जिसके किस्म की आधिकारिक तौर पर मंज़ूरी नहीं मिली थी।

प्रधानमंत्री कार्यालय को सावधान कर दिया गया और एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता के रूप में इस जैव जोखिम पर अंकुश लगाने के लिए एक समिति गठित की गई। अभी भी भारत में बिनौला तेल को खुलेआम रिफांइड तेल के साथ मिश्रित किया जाता है। आम लोगों को एचटीबीटी बिनौला तेल के उपभोग से जुड़े जोखिमों के प्रति सावधान नहीं किया गया है। भारत में, 97 प्रतिशत से अधिक बिनौला बीटी कपास हैं।

यह अवैध घुसपैठ अब बीज कंपनियों के ब्रीडिंग मैटेरियल तथा पैरेंट लाइन यानी जनक किस्म में भी प्रवेश कर चुकी है। इसके परिणामस्वरूप, प्रत्येक वर्ष वैध बिनौले की अर्थव्यवस्था बाधित हो जाती है। सभी भारतीय कंपनियां जो जीईएसी-स्वीकृत बीजी2 बिनौले की बिक्री कर रही हैं, इसकी पहली शिकार होती हैं। बीज अधिनियम 1966 के अनुसार, ट्रेट संदूषण का कारण बनने वाली जमीन पर जुर्माना लगाया जाएगा। प्रदूषण फैलाने वालों के बदले जिन किसानों की फसलें प्रदूषित हो जाती हैं, उन्हें ही दंड भुगतना पड़ता है।

2019 तक आंध्र प्रदेश सरकार ने एचटी जीन की कथित मौजूदगी के लिए 13 बीज कंपनियों के लाइसेंस निलंबित कर दिए थे। महाराष्ट्र सरकार ने भी कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं। दोनों राज्यों में एफआइआर दर्ज कर लाइसेंसप्राप्त बीज कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच की गई कई खेपों में से केवल एक या दो में ही एचटी जीन पाई गई। हालांकि अवैध एचटी सीड ब्रीडर लगतार संदूषण पैदा कर रहे हैं और एचटीबीटी कपास बेच रहे हैं, लाइसेंसप्राप्त भारतीय कंपनियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है और उन्हें उत्पीड़ित किया जा रहा है। वे पीड़ित हैं, अपराधी नहीं।

फील्ड इंस्पेक्शन एंड सांइटिफिक इवैल्यूएशन कमिटी (एफआइसीईसी) की एक रिपोर्ट में पाया गया कि ‘एकत्र किए गए 14 अवैध हाइब्रिड को दो प्रमुख समूहों में बांटा जा सकता है, जो कुछ कंपनियों द्वारा संगठित आधार गतिविधियों को दर्शाते हुए बहुत ही संकीर्ण आनुवंशिक आधारों की तरफ संकेत करता है। ‘इसके अतिरिक्त, इसमें कहा गया कि अध्ययनों में भी बीजों की तस्करी की संलिप्तता नहीं पाई गई, क्योंकि जीनोटाइप भारत के मूल में पाए गए।’ यह भारतीय बीज सेक्टर की बेगुनाही साबित करता है और ‘कुछ कंपनियों’ की भूमिका की तरफ़ इशारा करता है।

फिर सरकार ने इन कंपनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की और क्यों नहीं जैव विविधता अधिनियम को बनाए रखा? इसका एक उत्तर शेतकारी संगठन के अध्यक्ष तथा कृषि कानून पर सुप्रीम कोर्ट की कमिटी के सदस्य अनिल घनवत जैसे सार्वजनिक नेताओं द्वारा एचटीबीटी किस्मों का सक्रिय रूप से प्रचार किया जाना है। इस संगठन ने महाराष्ट्र से लेकर तेलंगाना तक, सार्वजनिक रूप से एचटीबीटी बीजों के उपयोग का समर्थन किया है। उनका संगठन इन अस्वीकृत बीजों के उपयोग को ‘बीज सत्याग्रह’ का नाम देता है, जबकि यह जैवविविधता को नुकसान पहुंचाता है।

इतिहास में खुद को बदलने का एक अजीब तरीका होता है। संदूषण के रूप में बीटी कपास1 को भारत में 1996 में भी पेश कर दिया गया था। नवभारत कांड इसका गवाह है। उसके बाद ही मौन्सैंटो ने भारतीय बाजार में प्रवेश किया। और अब, मौन्सैंटो/बेयर का कपास बीजों पर एकाधिकार है।

घनवत और उनका संगठन एक ऐसे खतरनाक रास्ते पर चल रहे हैं, जो स्वास्थ्य और कानूनी बीज व्यवसाय को तबाह कर सकता है। भारत सरकार को कानून का मजाक बनाने वाले ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।

ऐसे उल्लंघनों का सार्वजनिक स्वास्थ्य निहितार्थों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि बिना जैव सुरक्षा परीक्षणों के एचटीबीटी कपास बीज वनस्पति तेलों में बिना किसी जांच के मिश्रित हो सकते हैं। बिनौले तेल का चलन जोर पकड़ रहा है, क्योंकि यह कम खर्चीला विकल्प है। इस समय भारत में कपास बीज के लगभग 99 प्रतिशत जीएम (एचटी नहीं) हैं। और नमकीन से लेकर समोसों तक लगभग सभी में बिनौला तेल के अवशेष शामिल होते हैं। लेकिन, अधिकांश उपभोक्ताओं को यह पता ही नहीं होता कि इस तेल के जीएम होने की सर्वाधिक संभावना है और यह भी कि यह एचटी किस्म भी हो सकती है। एफएसएसएआइ भी जीएम/एचटी बीटी किस्मों को लेबल करने में विफल रहा है। अगर इसे रोका नहीं गया तो भारत को एक बड़े कृषि और स्वास्थ्य संकट का सामना करना पड़ सकता है-जबकि इसे टाल पाना आसान है।

(इंद्र शेखर एक स्वतंत्र नीति-विश्लेषक और कृषि एवं पर्यावरण विषयों के लेखक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Biodiversity and Samosas: Poisoned Together?

health care
glyphosate
Environment
food
opinion
Science
Chemicals
cotton cultivation
GM food
HTBt cotton
genetic traits

Related Stories

जलवायु परिवर्तन : हम मुनाफ़े के लिए ज़िंदगी कुर्बान कर रहे हैं

उत्तराखंड: क्षमता से अधिक पर्यटक, हिमालयी पारिस्थितकीय के लिए ख़तरा!

मध्यप्रदेशः सागर की एग्रो प्रोडक्ट कंपनी से कई गांव प्रभावित, बीमारी और ज़मीन बंजर होने की शिकायत

बनारस में गंगा के बीचो-बीच अप्रैल में ही दिखने लगा रेत का टीला, सरकार बेख़बर

दिल्ली से देहरादून जल्दी पहुंचने के लिए सैकड़ों वर्ष पुराने साल समेत हज़ारों वृक्षों के काटने का विरोध

जलविद्युत बांध जलवायु संकट का हल नहीं होने के 10 कारण 

समय है कि चार्ल्स कोच अपने जलवायु दुष्प्रचार अभियान के बारे में साक्ष्य प्रस्तुत करें

पर्यावरण: चरम मौसमी घटनाओं में तेज़ी के मद्देनज़र विशेषज्ञों ने दी खतरे की चेतावनी 

जलवायु बजट में उतार-चढ़ाव बना रहता है, फिर भी हमेशा कम पड़ता है 

अर्जेंटीना कांग्रेस में अमेरिकन एक्सप्रेस की बेशुमार ख़रीदारी


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी: अयोध्या में चरमराई क़ानून व्यवस्था, कहीं मासूम से बलात्कार तो कहीं युवक की पीट-पीट कर हत्या
    19 Mar 2022
    कुछ दिनों में यूपी की सत्ता पर बीजेपी की योगी सरकार दूसरी बार काबिज़ होगी। ऐसे में बीते कार्यकाल में 'बेहतर कानून व्यवस्था' के नाम पर सबसे ज्यादा नाकामी का आरोप झेल चुकी बीजेपी के लिए इसे लेकर एक बार…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ट्रेड यूनियनों की 28-29 मार्च को देशव्यापी हड़ताल, पंजाब, यूपी, बिहार-झारखंड में प्रचार-प्रसार 
    19 Mar 2022
    दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को सफल बनाने के लिए सभी ट्रेड यूनियन जुट गए हैं। देश भर में इन संगठनों के प्रतिनिधियों की बैठकों का सिलसिला जारी है।
  • रवि कौशल
    पंजाब: शपथ के बाद की वे चुनौतियाँ जिनसे लड़ना नए मुख्यमंत्री के लिए मुश्किल भी और ज़रूरी भी
    19 Mar 2022
    आप के नए मुख्यमंत्री भगवंत मान के सामने बढ़ते क़र्ज़ से लेकर राजस्व-रिसाव को रोकने, रेत खनन माफ़िया पर लगाम कसने और मादक पदार्थो के ख़तरे से निबटने जैसी कई विकट चुनौतियां हैं।
  • संदीपन तालुकदार
    अल्ज़ाइमर बीमारी : कॉग्निटिव डिक्लाइन लाइफ़ एक्सपेक्टेंसी का प्रमुख संकेतक है
    19 Mar 2022
    आम तौर पर अल्ज़ाइमर बीमारी के मरीज़ों की लाइफ़ एक्सपेक्टेंसी 3-12 सालों तक रहती है।
  • पीपल्स डिस्पैच
    स्लोवेनिया : स्वास्थ्य कर्मचारी वेतन वृद्धि और समान अधिकारों के लिए कर रहे संघर्ष
    19 Mar 2022
    16 फ़रवरी को स्लोवेनिया के क़रीब 50,000 स्वास्थ्य कर्मचारी काम करने की ख़राब स्थिति, कम वेतन, पुराने नियम और समझौते के उल्लंघन के ख़िलाफ़ हड़ताल पर चले गए थे।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License