NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
दिल्ली चुनाव: बडबोलेपन की हार और जनता की जीत
महेश कुमार
11 Feb 2015

दिल्ली विधान सभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की भारी जीत ने भाजपा को बेआबरू कर दिया है। देश के चुनावी इतिहास में इतनी शर्मनाक हार का सामना तो शायद ही किसी राजनितिक दल ने किया होगा। इसी वेबसाइट पर मैंने अपने पिछले लेख में कह दिया था कि भाजपा एक बड़ी हार की तरफ बढ़ रही है। लेकिन यह हार इतनी बड़ी होगी कि जिस हार से हार को भी शर्म आ जाए, ऐसा मैंने भी नहीं सोचा था। कुल मिलाकर लोक सभा चुनाव के बाद दिल्ली चुनाव में भाजपा की यह सबसे बड़ी हार है। शायद यह कहना भी सही होगा कि यहाँ से भाजपा को अब अगले चुनावों में हार की आदत डाल लेनी चाहिए क्योंकि आने वाले चुनाव भी बडबोलेपन और जनता के असली मुद्दों के बीच होंगे। हाल ही में हुए चुनावों में यह शायद पहला चुनाव है जिसमें भाजपा और उसके नेताओं के बडबोलेपन और जनता के असली मुद्दों के बीच सीधी टक्कर हुयी है। इस चुनाव ने यह साबित कर दिया है कि अगर चुनावों में जनता के ज्वलंत मुद्दों को केन्द्रित कर चुनाव लड़ा जाता है तो जीत आम जनता की होगी।

बडबोलेपन की राजनीती

यु.पी.ए. -2 की सरकार ने जो आर्थिक संकट देश में पैदा किया और आम जनता पर जो आर्थिक बोझ डाला उसे भाजपा सरकार ने संबोधित करने के बजाय ओर बढ़ा दिया। भाजपा सरकार की नीतियां भी यु.पी.ए. -2 की नीतियों का अनुपालन करती नज़र आई और उन्होंने महंगाई, बेरोज़गारी को तेज़ी से बढ़ा दिया और ग्रामीण रोजगारों में मंरेगा के बजट में कटौती करने से रोजगार दर बहुत नीचे चली गयी। गरीबों के जीवन से खिलवाड़ वह भी बडबोलेपन के जरिए शायद ज्यादा दिन चलने वाली कहानी नहीं थी। यह कारण है कि दिल्ली चुनाव में मोदी के सीधे कूदने के बावजूद भाजपा कोई करामात नहीं दिखा पायी और बुरी तरह से चुनाव हार गई। ‘विकास’ नाम की जिस चिड़िया को मोदी चुनावों का नारा बना कर लाये थे वह भी ठंडा पड़ गया, क्योंकि आम जनता को यह विकास केवल और केवल पूंजीपतियों के विकास का नारा लगा। आम जनता के भीतर इस बात के एहसास ने भाजपा को हाशिये पर फैंक दिया। दिल्ली के इतिहास में भाजपा ने इतनी करारी हार का सामना कभी नहीं किया और वह भी तब जब वह लोकसभा में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में कब्ज़ा जमाये बैठी है।

                                                                                                                                

झूठे नारे और व्यक्तिगत आरोप   

भाजपा ने लोकसभा चुनावों के विकास के नारे को दफ़न कर दिया क्योंकि आम जनता के सामने इस नारे की पोल पूरी तरह खुल चुकी थी। भाजपा के नेताओं ने इस चुनाव को व्यक्तिगत आरोपों का केंद्र बना दिया और आम आदमी पार्टी के नेताओं खासकर केजरीवाल पर शर्मनाक आरोप लगाए। मोदी भी इसमें पीछे नहीं रहे। उन्होंने केजरीवाल को अराजक तत्व से लेकर नक्सल तक कह दिया। उन्होंने कहा की केजरीवाल और उनकी पार्टी केवल धरना देना जानती है और हम सत्ता चलाना। उनके इन सभी बयानों में घमंड की बू आ रही थी। जनता की नज़रों में यह साफ़ हो गया कि भाजपा फिर उन्हें झूठे नारों और व्यक्तिगत आरोपों के जरिए गुमराह करना चाहती है इसलिए दिली की जनता ने एक आवाज़ में भाजपा के खिलाफ वोट दिया।

फैसला मोदी के खिलाफ

दिल्ली की जनता यह फैसला सीधे मोदी सरकार के काम-काज पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। गरीब, मेहनतकश और माध्यम वर्ग की जनता की समस्याओं की अनदेखी करना, बेरोजगारों पर काबू न पाना, जन-विरोधी भूमि अधिग्रहण से जैसे कानून को अअध्यादेश के जरिए पास करना, मंरेगा जोकि ग्रामीण रोज़गार का एकमात्र जरिया है, को बेअसर करना, दिल्ली में महंगा बिजली-पानी मुहैया करना, नगर निगम में भरष्टाचार का बोलबाला होना, अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं का चरमराना, सरकारी स्कूलों में बच्चों को जरूरी सुविधाओं का न मिलना, खाने की वस्तुओं के आसमान छूती दामों को न रोकना, कुल मिलाकर आम जनता की जवलंत समस्याओं से पूरी तरह से आखें मूँद लेना। अगर सरकार ऐसा करेगी तो उसे फिर सत्ता में क्यों लाया जाए। इस चुनाव में आम जनता ने ऐसा ही कुछ सोचा है। बेशक किरण बेदी भाजपा की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार थी लेकिन केजरीवाल के खिलाफ मोदी और अमित शाह सीधे चुनाव लड़ रहे थे। उन्हें इसका खामियाजा आने वाले चुनावों में भी झेलना पड़ेगा।

चुनाव का सन्देश 

इस चुनाव का सन्देश बहुत स्पष्ट है। आम जनता ने यह साफ़ कर दिया है कि जनता से कोई भी बड़ा नहीं है। उसका फैसला अन्तिम फैसला होगा। अगर कोई भी राजनितिक दल जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करेगा तो उसका हश्र भी भाजपा की तरह ही होगा। भाजपा ने यह सीख कांग्रेस की गिरती हालत से नहीं ली इसलिए उसे इस शर्मनाक हार का मुहं देखना पड़ा और वह अपने बडबोलेपन में मारी गयी। जनता के पास ज्यादा वक्त नहीं है, वह काम देखना चाहती है अगर आम आदमी पार्टी ने ठीक से जनता के हक में काम नहीं किया तो उसे भी जनता उसकी औकात बता देगी। यह चुनावी जीत इस बात का भी संकेत देती है कि राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी पार्टियों के गठजोड़ के उभरने की जरूरत है ताकि पूरे देश की जनता उनका जीने का हक दिया जा सके। यही वक्त कि देश की राष्ट्रीय राजनीती ग्रीस की तरह करवट ले और राष्ट्रीय पैमाने पर भी एक आम जनता की हितैषी सरकार बन सके। इसके लिए आम आदमी पार्टी को उन सभी छोटे दलों को अपने साथ लेकर चलाना होगा जो इस लड़ाई में जनता की हुकूमत लाना चाहते हैं।

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

 

 

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव
आम आदमी पार्टी
अरविन्द केजरीवाल
नरेन्द्र मोदी
भाजपा

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों 10 सितम्बर को भारत बंद

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी

क्या भाजपा शासित असम में भारतीय नागरिकों से छीनी जा रही है उनकी नागरिकता?


बाकी खबरें

  • नीलांजन मुखोपाध्याय
    यूपी: योगी 2.0 में उच्च-जाति के मंत्रियों का दबदबा, दलितों-पिछड़ों और महिलाओं की जगह ख़ानापूर्ति..
    02 Apr 2022
    52 मंत्रियों में से 21 सवर्ण मंत्री हैं, जिनमें से 13 ब्राह्मण या राजपूत हैं।
  • अजय तोमर
    कर्नाटक: मलूर में दो-तरफा पलायन बन रही है मज़दूरों की बेबसी की वजह
    02 Apr 2022
    भारी संख्या में दिहाड़ी मज़दूरों का पलायन देश भर में श्रम के अवसरों की स्थिति को दर्शाता है।
  • प्रेम कुमार
    सीबीआई पर खड़े होते सवालों के लिए कौन ज़िम्मेदार? कैसे बचेगी CBI की साख? 
    02 Apr 2022
    सवाल यह है कि क्या खुद सीबीआई अपनी साख बचा सकती है? क्या सीबीआई की गिरती साख के लिए केवल सीबीआई ही जिम्मेदार है? संवैधानिक संस्था का कवच नहीं होने की वजह से सीबीआई काम नहीं कर पाती।
  • पीपल्स डिस्पैच
    लैंड डे पर फ़िलिस्तीनियों ने रिफ़्यूजियों के वापसी के अधिकार के संघर्ष को तेज़ किया
    02 Apr 2022
    इज़रायल के क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों में और विदेशों में रिफ़्यूजियों की तरह रहने वाले फ़िलिस्तीनी लोग लैंड डे मनाते हैं। यह दिन इज़रायली क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ साझे संघर्ष और वापसी के अधिकार की ओर प्रतिबद्धता का…
  • मोहम्मद सज्जाद, मोहम्मद ज़ीशान अहमद
    भारत को अपने पहले मुस्लिम न्यायविद को क्यों याद करना चाहिए 
    02 Apr 2022
    औपनिवेशिक काल में एक उच्च न्यायालय के पहले मुस्लिम न्यायाधीश, सैयद महमूद का पेशेवराना सलूक आज की भारतीय न्यायपालिका में गिरते मानकों के लिए एक काउंटरपॉइंट देता है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License