NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
दलितों पर हमले और उनका विरोध गये वर्ष भी होते रहें !
जब भी दलितों ने अपनी आवाज़ उठाने की कोशिश की तो उसे पूरी तरह दबा दिया गया। बजट आवंटन राशि घटा दी गई, महत्वपूर्ण नीतियां जो एससी तथा एसटी के उत्थान के लिए थी ख़त्म कर दी गई, इसके अलावा उनके साथ भेदभाव अभी भी जारी है।
पी.जी. अम्बेडकर
01 Jan 2018
 Dalits

मौजूदा केंद्रीय सरकार के शासन का एक और साल बीत गया और इस साल में दलितों के लिए ज़िन्दगी और भी दूभर हो गयी I दलितों और आदिवासियों के लिए इस साल सबसे बड़ा झटका रहा केंद्र सरकार के 2017 के बजट से अनुसूचित जाति सब-प्लान (एससीएसपी) और आदिवासी सब-प्लान (टीएसपी) को निकाल दिया जाना I

70 के दशक में लागू किये गये इन ख़ास कार्यक्रमों का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए चलाये जाने वाले विकास कार्यक्रमों के लिए पैसा आबंटित करना था I एससीएसपी और टीएसपी के तहत अनुसूचित जातियों और जनजातियों के जनसँख्या में अनुपात के अनुसार विभिन्न कार्यक्रमों के लिए फण्ड आबंटित किया जाता था I तथाकथित विकास की होड़ में इन तबकों को शामिल करने के लिए यह प्रक्रिया अपनाई गयी थी I

2017 के बजट से न सिर्फ इस प्रक्रिया को पूरी तरह निकाल दिया गया बल्कि जो फण्ड दिया भी गया वह अनिवार्य अनुपात से बहुत कम था I राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान के अनुसार दलितों और आदिवासियों के लिए क्रमशः 91,386 करोड़ और 47,276 करोड़ रूपये आबंटित किये जाने चाहिए लेकिन साल 2017 के बजट में दलितों के लिए इसका 55% (52,393 करोड़ रूपये) और आदिवासियों के लिए 66.5% (31,920 करोड़ रूपये) ही दिया गया I

शिक्षा दलितों के लिए बहुत अहम पहलू है I 6-14 आयु वर्ग में 81% और 15-16 आयु वर्ग में 60% दलित छात्र स्कूल छोड़ देते हैं I पूर्व-मैट्रिक छात्रवृत्ति स्कूल छोड़ने की दर को कम करने के लिए एक प्रमुख प्रोत्साहन है। फिर भी एससी छात्रों के लिए पूर्व-मैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए बजट आवंटन में कमी देखी गईI पिछले बजट में 510 करोड़ रुपए से कटौती कर इसके लिए इस साल केवल 50 करोड़ रुपए आवंटित हुआ।

जब भी दलितों ने अपनी आवाज़ उठाने की कोशिश की तो उसे पूरी तरह दबा दिया गया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यही हुआ I 5 मई 2017 को सहारनपुर ज़िले के शब्बीरपुर में दलितों पर हमला किया गया और 55 से ज़्यादा दलित घरों को जला दिया गया। दलितों का अपराध सिर्फ़ यह था कि वे 14 अप्रैल 2017 को अपने समुदाय से संबंधित रविदास मंदिर परिसर में डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमा स्थापित करना चाहते थे। राज्य प्रशासन ने इसके लिए अनुमति नहीं दी।

5 मई को राणा प्रताप की प्रतिमा स्थापित करने के लिए पड़ोसी गाँव से गुज़रते हुए ठाकुरों के एक जुलूस ने ये कहते हुए भीड़ इकट्ठा कर ली कि दलितों ने ठाकुरों का अपमान किया और इस बहाने वे आए और दलितों पर हमला किया।

इस क्रूरता के ख़िलाफ़ भीम सेना नाम के एक संगठन ने चन्द्र शेखर रावण के नेतृत्व में विरोध किया। हिंसा को रोकने के बहाने भीम सेना के सभी प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार किया गया और जेल में डाल दिया गया। भीम सेना के सदस्यों की गिरफ्तारी के ख़िलाफ़ पूरे देश में विरोध प्रदर्शन किए गए लेकिन प्रशासन ने इंसाफ़ के लिए कुछ भी नहीं किया।

इसी दिन (5 मई 2017) आंध्र प्रदेश में, पश्चिमी गोदावरी ज़िले के गरागपारु गांव में 400 दलित परिवारों का सामाजिक रूप से बहिष्कार कर दिया गया था। उनकी एकमात्र मांग थी कि डॉ. बीआर अम्बेडकर की प्रतिमा उस क्षेत्र में स्थापित की जाएगी जहां अन्य राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इसके लिए गांव में उक्त जातियों के लोगों को कोई रोज़गार न देने और उनके साथ सभी संबंधों को ख़त्म करने का एक फरमान जारी किया गया। अगर कोई व्यक्ति प्रतिबंधों का उल्लंघन करता है तो उस पर 1000 रुपए का जुर्माना लगाया गया था। इस खबर ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में न्याय की मांग के लिए लोगों को संगठित किया लेकिन लोगों की मांग पूरी नहीं हुई।

भेदभाव का एक अन्य स्वरूप जो दलितों को सामना करना पड़ रहा है वह है सफाई क्षेत्र जिसमें ज्यादातर दलित हैं। इस वर्ष पूरे देश में नाले की सफाई करने के दौरान क़रीब 130कर्मचारी मारे गए। ये मौत रोकी जा सकती थी लेकिन कोई संजीदा कोशिश नहीं किए गए। सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान (स्वच्छ भारत कार्यक्रम) पर हजारों करोड़ रुपए खर्च किए लेकिन इन मौतों को रोकने के लिए तकनीकों के इस्तेमाल को लेकर कोई बेहतर प्रयास नहीं किया गया।

शैक्षणिक संस्थानों में 2016 में रोहित वमूला की संस्थागत हत्या के बाद सख़्त प्रतिरोध के बावजूद दलितों के ख़िलाफ़ भेदभाव ग़ैर चुनौतीपूर्ण हो गया। छात्रों के भेदभाव और आत्महत्या को रोकने के लिए कोई उपाय नहीं किए गए। सिर्फ जेएनयू में दलित समुदाय के दो शोधकर्ता छात्र- मुथु कृष्ण और घनश्याम दास - ने संकटग्रस्त छात्रों के लिए संस्थागत सहयोग की कमी के चलते अपनी ज़िंदगी समाप्त कर ली थी ।

कई हमलों के बावजूद दलित अपने तौर पर इन अत्याचारों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। लोग सड़कों पर पीड़ितों के लिए न्याय की मांग की और न्याय पाने के लिए दमनकारी सामाजिक संरचनाओं के लिए लड़ाई की। उदाहरण स्वरूप कौशल्या अपने दलित पति शंकर के लिए न्याय के लिए लड़ी। उसने परिवार के सदस्यों के ख़िलाफ़ अदालत में गवाही दी जिससे दोषियों को सजा मिली। उसने उन दंपत्तियों के लिए लड़ने का संकल्प किया है जो जातिगत संरचनाओं और विवाह के ख़िलाफ़ जाते हैं।

Dalits
Scheduled Caste
Bhim Army
BR Ambedkar
Rohith Vemula

Related Stories

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

क्या पुलिस लापरवाही की भेंट चढ़ गई दलित हरियाणवी सिंगर?

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

दलितों में वे भी शामिल हैं जो जाति के बावजूद असमानता का विरोध करते हैं : मार्टिन मैकवान

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

बागपत: भड़ल गांव में दलितों की चमड़ा इकाइयों पर चला बुलडोज़र, मुआवज़ा और कार्रवाई की मांग

मेरे लेखन का उद्देश्य मूलरूप से दलित और स्त्री विमर्श है: सुशीला टाकभौरे


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामले घटकर 10 लाख से नीचे आए 
    08 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 67,597 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 9 लाख 94 हज़ार 891 हो गयी है।
  • Education Instructors
    सत्येन्द्र सार्थक
    शिक्षा अनुदेशक लड़ रहे संस्थागत उत्पीड़न के ख़िलाफ़ हक़ की लड़ाई
    08 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने शिक्षकों को आश्वस्त किया था कि 2019 तक उन्हें नियमित कर दिया जायेगा। लेकिन इस वादे से भाजपा पूरी तरह से पलट गई है।
  • Chitaura Gathering
    प्रज्ञा सिंह
    यूपी चुनाव: मुसलमान भी विकास चाहते हैं, लेकिन इससे पहले भाईचारा चाहते हैं
    08 Feb 2022
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गांव के मुआयने से नफ़रत की राजनीति की सीमा, इस इलाक़े के मुसलमानों की राजनीतिक समझ उजागर होती है और यह बात भी सामने आ जाती है कि आख़िर भाजपा सरकारों की ओर से पहुंचायी जा…
  • Rajju's parents
    तारिक़ अनवर, अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव : गांवों के प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या की कहानी
    08 Feb 2022
    महामारी की शुरूआत होने के बाद अपने पैतृक गांवों में लौटने पर प्रवासी मज़दूरों ने ख़ुद को बेहद कमज़ोर स्थिति में पाया। कई प्रवासी मज़दूर ऐसी स्थिति में अपने परिवार का भरण पोषण करने में पूरी तरह से असहाय…
  • Rakesh Tikait
    प्रज्ञा सिंह
    सरकार सिर्फ़ गर्मी, चर्बी और बदले की बात करती है - राकेश टिकैत
    08 Feb 2022
    'वो जाटों को बदनाम करते हैं क्योंकि उन्हें कोई भी ताक़तवर पसंद नहीं है' - राकेश टिकैत
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License