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भारत
राजनीति
गाय और हिंदुत्वः मिथक और वास्तविकता
गो-रक्षा का धार्मिक कर्तव्य निभाने वाले यह आपराधिक तत्व सही मायनों में हत्यारे होने के साथ लुटेरे भी हैं।
शम्सूल इस्लाम
17 Jun 2017
गाय और हिंदुत्वः मिथक और वास्तविकता

‘राम’, ‘लव जिहाद’ और ‘घर वापसी’ (मुसलमानों व ईसाइयों को ज़ोर-ज़बरदस्ती से हिंदू बनाना) जैसे मुद्दों के बाद हिंदुत्ववादी ताकतों के हाथ में अब गो-रक्षा का हथियार है। पवित्र गाय को बचाने के नाम पर मुसलमानों व दलितों को हिंसक भीड़ द्वारा घेरकर मारने, उनके अंग-भंग कर देने और उनके साथ लूटपाट करने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। याद रहे कि ऐसी कई घटनाओं का तो पता ही नहीं चल पाता है। डींग हांकने या अपनी बहादुरी दिखाने के लिए इन हिंसक तत्वों द्वारा सोशल मीडिया पर डाले गए वीडियो उस मारपीट तथा जुल्म व प्रताड़ना की तस्वीर दिखाते हैं, जिसे देख-सुन कर विभाजन के समय की क्रूरतापूर्ण हिंसक घटनाएं याद आ जाती हैं। इन्हें देख के साफ लगता है कि इन हिंसक व अराजक तत्वों को सरकार का वरदहस्त प्राप्त है तथा इन्हें कानून का कोई डर नहीं है। यह शर्मनाक वीडियोज हमें दिखा रहे हैं कि कैसे यह हिंदूवादी हिंसक तत्व किसी को पीट-पीट कर मार डालने या उसे अधमरा कर देने पर खुशियां मनाते, उसका आनंद लेते हैं। गो-रक्षा का धार्मिक कर्तव्य निभाने वाले यह आपराधिक तत्व सही मायनों में हत्यारे होने के साथ लुटेरे भी हैं। यह इससे सिद्ध हो जाता है, जब हम उन्हें प्रताड़ितों को घेरकर मारने से पहले उन की पूँजी और सामान की लूटमार करते देखते हैं।

आरएसएस के वरिष्ठ स्वयंसेवक और नीतिकार, हमारे प्रधानमंत्री द्वारा अगस्त 2016 में गो माता के इन अराजक व हिंसक भक्तों को असामाजिक तत्व ठहरा दिए जाने के बावजूद इनका हिंसक तांडव जारी है। प्रधानमंत्री ने कहा थाः 'यह देख मुझे बहुत गुस्सा आता है कि लोग गो रक्षा के नाम पर दुकानें चला रहे हैं... कुछ लोग रात के समय अनैतिक कार्यों में लिप्त रहते हैं और दिन में वह गो रक्षकों का आवरण ओढ़ लेते हैं।'

प्रधानमंत्री द्वारा की गई इस सख्त टिप्पणी को लगभग एक साल होने को आया लेकिन गाय के नाम पर की जाने वाली हिंसा इस अरसे में और बढ़ गई तथा देश के बड़े हिस्से में फैल गई है। यह ज्यादा भीषण हो गई और अनियंत्रित भी। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि प्रधानमंत्री ने दिखावे के लिए यह बातें बोली हों, ताकि इन आपराधिक कृत्यों के खिलाफ समाज में पनप रहा गुस्सा कम किया जा सके। दूसरा यह कि उक्त गो रक्षक असामाजिक तत्व नहीं हैं, बल्कि वास्तविक गो-रक्षक हैं जिन्हें प्रधानमंत्री का आशीर्वाद प्राप्त है। परंतु इसमें कोई शक नहीं कि इन गैंगस्टर्स को आरएसएस तथा प्रशासन द्वारा प्रश्रय दिया जाता है।

दुर्भाग्य से न्याय पालिका, जिसके बारे में माना जाता है कि वह देश के शासकों को विधि सम्मत रूप से शासन करने पर बाध्य करेगी, कई बार उसने जनहित के मुद्दों पर प्रभावशाली काम किए भी, लेकिन पता नहीं क्यों इस बार वह इन आपराधिक तत्वों के आगे चुप है। बल्कि राजस्थान हाईकोर्ट के एक जज ने ‘गो भक्तों’ द्वारा किए गए अपराधों की पड़ताल करने के बजाय (गो रक्षा के नाम पर की जाने वाली हिंसा में राजस्थान प्रथम स्थान पर है। कुछ समय पहले ही वहां इन गो रक्षकों ने पहलू खान को बर्बरतापूर्वक मार डाला। इस घटना का पूरा वीडियो भी अपलोड किया गया था।) गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने तथा उसकी हत्या करने वाले को मृत्यु दंड देने के निर्देश जारी किए।

भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने तो, जो आरएसएस के महत्वपूर्ण विचारक भी हैं, गाय की पवित्रता पर एक नई 'वैज्ञानिक' खोज तक का हवाला दे डाला। आरएसएस पदाधिकारियों के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा जारी एक रिपोर्ट का जिक्र किया और कहा कि "गाय में 80 प्रतिशत जींस ऐसे पाए गए हैं, जो इंसानों में भी मौजूद हैं।" साथ ही उन्होंने भारतीय नागरिकों से "गाय की रक्षा और उसकी पूजा करने" का आह्वान भी किया।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आरएसएस के यह स्वयंसेवक, राजनाथ सिंह इस मामले में न केवल अधकचरी सोच वाले बल्कि पक्षपाती और गलत भी थे। विश्वस्तरीय प्रतिष्ठित पत्रिकासाइंस की खोज के आधार पर भारत के एक प्रमुख अंगरेजी दैनिक ने यह स्पष्ट किया है कि अन्य कई पशुओं के जींस, गाय के जींस से ज्यादा मानव जींस से मिलते हैं। चिंपांज़ी (गोरिल्ले), बिल्ली, चूहे व कुत्ते में क्रमशः 96, 90, 85 और 84 प्रतिशत जींस मानव जींस के समान मिलते हैं। केवल यह प्राणी ही नहीं, फलों में भी यही स्थिति है, जैसे केले में 60 प्रतिशत जींस मानव जींस के समान होते हैं। अब देखना यह है कि राजनाथ सिंह कब इन्हें भी पवित्र घोषित करते हैं। हमें उनसे यह जानने की भी जरूरत है कि अल्पसंख्यक और दलित इंसान हैं या नहीं, उनमें भी गौ-माता के जींस हैं या नहीं, और उनकी जानें हिंसक भीड़ से बचाई जाना जरूरी है कि नहीं।

गो रक्षकों के ताजा शिकार (चैन्ने स्थित) आईआईटी-एम के बीफ खाने वाले लोग हुए हैं। संस्थान के केंपस में आरएसएस के विद्यार्थी संगठन (abvp अभाविप) के कार्यकर्ताओं ने इन पर प्राणघातक हमला किया। हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं द्वारा गाय के नाम पर लगातार किए जा रहे इन हिंसक हमलों से एक बात तो पूरी तरह स्पष्ट है कि यह फासीवादी तत्व हमारे आज के भारत के बारे में कुछ नहीं जानते तथा भारतीय इतिहास के मामले में भी निरे जाहिल हैं। खासतौर से भारत के वेदिक इतिहास से तो यह पूरी तरह अनभिज्ञ ही हैं, जिसे यह स्वर्ण काल के रूप में निरूपित करते हैं।

अगर कोई झूठ और धोखाधड़ी में महारत हासिल करने के लिए किसी गुरुकुल या यूनिवर्सिटी की तलाश में है तो निश्चित ही आरएसएस से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती है। इस क्षेत्र में उनकी दक्षता से किसी की कोई तुलना नहीं की जा सकती। भारत के हिंदुओं द्वारा बीफ ग्रहण करने के बारे में वे वास्तविकताओं को झुठला कर जिस प्रकार की बातें करते हैं, इससे एक बार फिर उनकी यह विशेषज्ञता सिद्ध हो रही है। वे ऐतिहासिक तथ्यों को आपराधिक रूप से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हुए यह दावा करते हैं कि भारत में बीफ खाने का चलन मुस्लमान/ईसाई शासकों के आगमन के बाद से शुरू हुआ तथा इन शासकों ने हिंदुओं और उनकी पवित्र धार्मिक मान्यताओं का निरादर करने के लिए भारत में बीफ खाने पर जोर दिया। एक प्रश्न कि “हमारे देश (भारत) में गो वध कैसे प्रारंभ हुआ?” के उत्तर में पूरी तरह झूट बोलते बेशर्मी से, आरएसएस के महान गुरु, गोलवालकर ने कहा: “इसका प्रारंभ हमारे देश में विदेशी आक्रांताओं के आगमन के साथ हुआ। लोगों को गुलामी के लिए तैयार करने के लिए उन्होंने सोचा कि हिंदुओं के आत्म सम्मान से जुड़ी हर चीज का निरादर करो...इसी सोच के चलते गो वध भी शुरू किया गया।”

यहाँ यह जानना रोचक होगा की आरएसएस ने अपनी स्थापना  (1925) से लेकर भारत की आज़ादी तक, अंग्रेजी राज में कभी भी गो वध बंद करने के लिए किसी भी तरह का आंदोलन नहीं चलाया।   

अलबत्ता उसके द्वारा किए गए इस प्रकार के दुष्प्रचार ने बीफ खाने या इसका व्यवसाय करने वाले देश के दो अल्पसंख्यक समुदायों और दलितों को आतंकित करने में महती भूमिका निभाई। यहां इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि हिन्दुत्वादी राजनीति के उत्थान के साथ ही गाय ऐसा संवेदनशील मुद्दा बना दिया गया, जिसने देश में मुसलमानों व दलितों के खिलाफ हिंसा भड़काने के ज्यादातर मामलों में केंद्रीय भूमिका निभाई। नाज़ी दुष्प्रचारक पॉल जोसेफ गोएबल्स के भारतीय उत्तराधिकारियों के लिए, जो यह दावा करते हैं कि भारत में बीफ खाना मुसलमानों/ईसाइयों के आगमन के साथ शुरू हुआ, भारतीय इतिहास के वेदिक काल का हिंदू लेखकों द्वारा किया गया वर्णन निरर्थक ही था।

आरएसएस द्वारा हिंदुत्ववादी विचारक के रूप में प्रतिष्ठित स्वामी विवेकानंद ने प्साडेना, कैलिफोर्निया (अमेरिका) के शेक्सपीयर क्लब में 2 फरवरी 1900 को ‘बुद्धिस्ट इंडिया’ विषय पर अपने संबोधन में कहाः
“आप अचंभित रह जाएंगे यदि प्राचीन वर्णनों के आधार पर मैं कहूं कि वह अच्छा हिंदू नहीं है, जो बीफ नहीं खाता है। महत्वपूर्ण अवसरों पर उसे आवश्यक रूप से बैल की बलि देना व उसे खाना चाहिए।”

इस कथन को वेदिक काल के इतिहास व संस्कृति विशेषज्ञ सी कुन्हन राजा की बात से बल मिलता है। महत्वपूर्ण यह है कि राजा ने यह शोध कार्य विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के अंतर्गत किया है। इसमें उन्होंने कहा हैः  
“वेदिक आर्यंस, जिनमें ब्राह्मण भी शामिल थे, मछली, मांस, यहां तक कि बीफ भी खाते थे। एक सम्मानित अतिथि के आतिथ्य सत्कार में बीफ परोसा जाता था। हालांकि वेदिक आर्यंस बीफ खाते थे लेकिन उसके लिए दुधारू गायों का वध नहीं किया जाता था। ऐसी गायों के लिए अग्नय (जिन्हें मारना नहीं है) का शब्द इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन एक अतिथि गोघना (जिसके लिए गो वध किया जाना है) माना जाता था। उस समय केवल बैल, बांझ गाय और बछड़ों का वध किया जाता था।”

भारतीय राजनीति, धर्म और संस्कृति के विशेषज्ञ व अद्भुत शोधकर्ता, डॉ. अम्बेडकर ने इस विषय पर ‘क्या हिंदुओं ने कभी बीफ नहीं खाया?’ शीर्षक से उत्कृष्ठ लेख लिखा है। वे लोग जो वास्तव में प्राचीन भारत को जानना-समझना तथा अल्पसंख्यकों को किनारे कर उनका सफाया करने के लिए गढ़े जाने वाले मिथकों की असलियत जानना चाहते हैं, उन्हें डॉ. अम्बेडकर का यह ऐतिहासिक आलेख अवश्य पढ़ना चाहिए।

अनेकानेक वेदिक काल और उत्तर-वेदिक काल की हिंदू पांडुलिपियों का अध्ययन करने के बाद डॉ. अम्बेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि “जब भी पढ़े-लिखे ब्राह्मण इस पर बहस करें कि हिंदुओं ने कभी बीफ नहीं खाया और वे तो गाय को पवित्र मानते हैं तथा उन्होंने सदा ही गो वध का विरोध किया है तो उनकी बात को स्वीकार करना असंभव है।”

दिलचस्प बात यह है कि डॉ. अम्बेडकर के अनुसार गायों की बलि इसलिए दी जाती थी, उनका मांस इसलिए खाया जाता था कि वे पवित्र थीं। उन्होंने लिखा: “ऐसा नहीं था कि वेदिक काल में गाय को पवित्र नहीं माना जाता था, बल्कि उसके पवित्र होने के चलते ही वाजस्नेयी संहिता में यह निर्देश दिए गए हैं कि बीफ खाना चाहिए।” (धर्म शास्त्र विचार इन मराठी, पृ. 180)। यह कि ऋग्वेद के आर्यंस आहार के लिए गायों का वध करते थे और उनका बीफ खाना ऋग्वेद से ही सिद्ध होता है। ऋग्वेद (x. 86.14) में इंद्रा कहती हैः ‘उन्होंने एक बार 20 बैलों का वध किया’। ऋग्वेद (x.91.14) में है कि अग्नि के लिए घोड़ों, बैलों, बांझ गायों और भेड़ों की बलि दी गई। ऋग्वेद से ही यह भी पता चलता है कि गायों का वध तलवार या कुल्हाड़ी से किया जाता था।”

अपने लेख का समापन अम्बेडकर ने इन शब्दों पर किया हैः “इन सब सबूतों के रहते किसी को संदेह नहीं हो सकता कि एक समय था जब हिंदू, चाहे वे ब्राह्मण हों या अन्य न सिर्फ मांसभक्षी थे बल्कि वे बीफ भी खाते थे।”

हिंदुत्ववादियों द्वारा भारत के कमजोर वर्गों के विरुद्ध की जा रही हिंसा आरएसएस के दोग़लेपन को ही उजागर करती है, जो उसकी रीति-नीति का अभिन्न अंग है। वास्तव में तो, किसी भी मुद्दे पर दो-तीन तरह की बातें करना आरएसएस के लिए बहुत कम ही माना जाएगा। हिंदुत्ववादी संगठन, खास कर आरएसएस से जुड़े, साधारण इन्साफ पसंद भारतीयों की, बेधड़क हत्याएं कर रहे हैं, न केवल गो वध के लिए बल्कि इन पशुओं के परिवहन करने पर भी। हद तो यह है कि उन दलितों को भी मौत के घाट उतरा जा रहा है, जो क़ानूनी तौर पर मुर्दा गायों की खाल उतर रहे थे। इसी के समानांतर आरएसएस/भाजपा की सत्ता वाले राज्य गोवा, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर हैं, जहां गो वध वैद्य है और बीफ वहां के मुख्य आहार में शामिल है। आरएसएस का तरीका कुछ ऐसा है कि कुछ क्षेत्रों में गो-वध की बात तो दूर रही, गऊ के साथ पाए जाने पर आपको ‘नर्क’ भेजा जा सकता है और कुछ क्षेत्रों में इस से जुड़े लोग गो वध कराते हुए राज कर रहे हैं। याद रहे हमारे देश में केरल जैसे राज्य भी है जहाँ बीफ़ 'सेक्युलर' खाना है!    

इस बात के दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं कि गाय के धंधे और बीफ पर रोक ने, पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों में घिरे, अपने अस्तित्व के लिए जूझते किसानों के लिए और मुसीबतें पैदा कर दी हैं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद किसानों की आत्महत्या दर 30 प्रतिशत बढ़ गई। ऐसे में गाय के विक्रय पर रोक लगाना किसानों को कुएं में धक्के देना जैसा है।

बतौर किसान नेता राजनीति में पदार्पण करने वाले चर्चित राजनीतिज्ञ, शरद पवार गो सेवा के बारे में एक अद्भुत प्रस्ताव लाए हैं। उनका कहना है कि आरएसएस के निर्देश पर मोदी सरकार गायों के क्रय-विक्रय व गो-वध पर रोक लगा रही है। इससे प्रभावित होने वाले किसानों को चाहिए कि वे अपने यहां की बांझ या बेकार गायें आरएसएस को सौंप दें, ताकि वह भी गौमाता की अच्छे-से सेवा करने के पवित्र काम में हिस्सेदारी कर सके। आरएसएस को इससे कोई समस्या भी नहीं होगी, क्योंकि भारत सरकार के बाद सब से ज़्यादा ज़मीनें इसी के पास हैं। पंवार ने यह मांग भी की है कि आरएसएस को नागपुर के रेशम बाग स्थित अपना मुख्यालय, एक गोशाला में तब्दील कर लेना चाहिए, जिससे गरीब किसानों पर इन गायों का पेट भरने का बोझ न पड़े तथा आरएसएस को गायों की सेवा का पुण्य मिलता रहे।

इस पवित्र युद्ध का एक स्पष्ट एजेंडा मांस के कारोबार से जुड़े कुरैशियों (मुसलमान), खटीक (हिन्दू) और चमड़े के कारोबार से जुड़े दलितों की आर्थिक व्यवस्था ध्वस्त करना भी है। इससे फुटकर व्यापार की तरह होने वाला यह असंगठित उद्योग मर जाएगा। जिस का नतीजा यह होगा की भारत जैसी बड़ी मंडी विश्व की उन बड़ी मांस कम्पनियों के हवाले कर दी जाएगी जो प्रोसेस्ड मांस कारोबार पर एकाधिकार रखते हैं।  

आरएसएस अनेक मुँहों से बोलते हुए, अनेक गुप्त एजेंडों पर काम करने के फ़ासीवादी संस्कृति को निभाने में माहिर है। देशवासियों को विभाजित करने वाला कोई एक एजेंडा जब अपना प्रभाव खोने लगता है या ज्यादा विवादित होने लगता है, तब वे थैले से कोई दूसरा एजेंडा निकाल लेता है। ‘राम मंदिर’, ‘घर वापसी’, ‘लव जिहाद’ और अब बारी है गाय के नाम पर देश को बांटने की। गाय का मुद्दा देश का एकमात्र मुद्दा बन  गया है। यह मुद्दा असल में ध्यान भटकाने के लिए छलावा मात्र है। गरीबी, बेरोजगारी, दंगे, अल्पसंख्यकों, दलितों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों से ध्यान भटकाने का। आरएसएस-भाजपा से जुड़ा शासक वर्ग समझता है कि वे सब लोगों को हर समय मूर्ख बनाते रहेंगे। निश्चि ही वे गलत सिद्ध होंगे। लेकिन जब तक इन का पर्दाफ़ाश होगा, तब तक तो लोकतांत्रिक, धर्म निरपेक्ष भारत और इसके लोगों का बुरा हाल हो चुका होगा।  

[अंग्रेज़ी से अनुवाद: जावेद आलम, इंदौर]

Courtesy: सबरंग इंडिया
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