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राजनीति
मूंछें रखने पर अहमदाबाद में दलित युवक को पीटा गया
2017 में भी मूंछें रखने पर दलितों की पिटाई की घटनाएं घटी थीं और इनके ख़िलाफ़ दलितों ने सोशल मीडिया पर अपनी मूंछें दिखाकर राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन किए थे।
दमयन्ती धर
28 May 2021
Translated by महेश कुमार
मूंछें रखने पर अहमदाबाद में दलित युवक गई पिटाई
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

अहमदाबाद जिले के वीरमगाम तालुका के काकथल गांव में रहने वाले 22 वर्षीय दलित युवक सुरेश वाघेला को 23 मई की रात को खाना कहाते वक़्त अचानक एक फोन आया। फोन करने वाले ने बताया कि वह धामाभाई बोल रहा है और वह युवक वाघेला से जानना चाह रहा था कि उसने मुंछे क्यों रखी हैं। फोन बंद करने के चंद मिनटों में ही धमाभाई समेत नौ लोग युवक वाघेला के घर पहुंच गए और उस पर हमला कर दिया। 

“रात के लगभग 10 बज रहे थे और रात का खाना खाने के बाद माता-पिता भी सो रहे थे। सबसे पहले, मुझे धमाभाई का फोन आया जिसने मुझसे पूछा कि मैने मूंछ क्यों रखी हैं और इस जुर्रत के लिए उसने मुझे पीटने की धमकी दी। लेकिन मैंने फोन काट दिया और सो गया। कुछ ही मिनटों में दरवाजे पर दस्तक हुई, और पाया कि धमाभाई सहित नौ लोग डंडे और लोहे की छड़ें हाथ में लिए खड़े हुए हैं, ”सुरेश वाघेला ने बताया। “उन्होंने मौखिक रूप से मुझे जाति सूचक गालियां दी और फिर मुझे लाठी और डंडों से पीटने लगे। मुझे प्राथमिक उपचार केंद्र ले जाया गया और फिर अस्पताल में भर्ती करा दिया गया, ”उन्होंने कहा, 

वाघेला ने कहा, "उन लोगों से मेरी कोई दुश्मनी नहीं थी, फिर भी उन्होंने मुझ पर सिर्फ मूंछ रखने के कारण हमला किया।"

अन्य आरोपों के साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के तहत छह नामजद और कई गुमनाम लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है। उल्लेखनीय बात यह है कि जिन आरोपियों की पहचान हुई उनमें धामाभाई ठाकोर, कौशिक वलैंड, अत्रिक ठाकोर, संजय ठाकोर, विजय ठाकोर और आनंद ठाकोर शामिल हैं, वे सभी काकथल गांव के निवासी हैं, जो ठाकोर समुदाय से संबधित हैं, जो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की श्रेणी में आते हैं और उन्हे दलितों की तुलना में सामाजिक पदानुक्रम में ऊंचा माना जाता है।

प्राथमिकी के अनुसार, युवक वाघेला के पिता ने दरवाजा खोला और वे बाहर जाने ही वाले थे कि युवक वाघेला बाहर आया और धामाभाई से बाहर जाकर मिले। युवक वाघेला ने उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने (आरोपियों) जातिवादी गालियां दीं और उस पर हमला कर दिया। वाघेला को बचाने के लिए परिवार के अन्य सदस्यों ने बीच-बचाव किया तो आरोपियों ने उनकी भी पिटाई कर दी।

जीआईडीसी, सानंद में वोल्टास में काम करने वाले युवक वाघेला ने प्राथमिकी में कहा कि, हमले के बाद जब "मेरे परिवार के सदस्य रोने और चीखने लगे तो अन्य ग्रामीण भी मौके पर आ गए थे और वे लोग (आरोपी) भाग गए।"

अहमदाबाद ग्रामीण पुलिस ने सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है.

मूंछों पर जातिवाद 

सितंबर 2017 में, इसी तरह की दो घटनाओं के बाद, जिसमें दलित युवकों को मूंछें रखने के लिए पीटा गया था, इसके खिलाफ पूरे गुजरात में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जहां दलितों ने #Jativadnavirodmaa (जातिवाद के खिलाफ विरोध), #Piyushbhainasamarthanmaa (पीयूषभाई के साथ एकजुटता में) और #samvidhannasamarthanmaa (संविधान के समर्थन में) जैसे हैशटैग के साथ मूंछें दिखाते हुए सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें पोस्ट की थी। 

इन घटनाओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत गांधीनगर के कलोल तालुका के लिम्बोदरा गांव से हुई थी, जहां दो दलित युवकों, पीयूष परमार और कुणाल महेरिया की पिटाई की गई थी। ध्यान देने योग्य बात यह है कि गांव में केवल 100 दलित परिवार हैं, जबकि लगभग 2,000 घरों वाले गांव में दरबार (क्षत्रिय जाति) का वर्चस्व है।

25 सितंबर, 2017 को, 24 वर्षीय पीयूष परमार अपने चचेरे भाई के साथ जब गरबा (एक गुजराती नृत्य उत्सव) करके लौट रहा था, तो तब उनका सामना दरबार समुदाय के चार लोगों से हो गया। उन पुरुषों ने मूंछें रखने पर परमार और उसके चचेरे भाई को जातिवादी गालियां दीं और उनके साथ मारपीट की।

बाद में लिंबोदरा गांव के सभी चार दरबार पुरुषों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।

घटना के चार दिन बाद 29 सितंबर को लिंबोदरा में मूंछ रखने पर क्रुणाल महेरिया की पिटाई की गई थी। 30 वर्षीय कानून के छात्र महेरिया एक दोस्त से मिलने जा रहा था, रास्ते में दरबार समुदाय के लोगों ने उसे गालियां दीं और उसकी पिटाई की। गंभीर रूप से घायल महेरिया को गांधीनगर के सिविल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

महेरिया ने घटना के बाद मीडिया को बताया कि, "उन्होंने मुझे पुलिस के डंडों से पीटा और कहते रहे कि मैंने मूंछें क्यों रखी, और क्या तुम दरबार बनने की हिम्मत कर रहे हो।" 

मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई और आरोपी की पहचान चार दिन पहले पीयूष परमार पर हमला करने वाले एक व्यक्ति के रिश्तेदार के रूप में हुई थी।

गौरतलब है कि यह गुजरात के किसी एक गांव की कहानी नहीं है। ग्रामीण गुजरात लंबे समय से जातिगत भेदभाव की ऐसी कई घटनाओं का गवाह रहा है।

गुजरात में जाति आधारित अत्याचार का इतिहास

गुजरात के कई गांवों में, दलितों को गांवों की उच्च जातियों के समुदाय द्वारा तय नियमों का पालन करना पड़ता है, जैसे कि नए कपड़े नहीं पहनना, मूंछें नहीं रखना, शादी के दिन घोड़े पर नहीं चढ़ना, गांव के नाई से दाढ़ी नहीं बनवाना, ऊंची जातियों के कुएं या ट्यूबवेल से पानी नहीं लेना और दलितों के लिए बने अलग श्मशान घाट का इस्तेमाल करना।

गौरतलब बात है कि गुजरात में दलितों के साथ काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन नवसर्जन ट्रस्ट ने 2007 से 2010 के बीच 14 जिलों के 1,489 गांवों का एक सर्वेक्षण किया था। सर्वेक्षण में पाया गया कि अस्पृश्यता के 98 तरह के रूप मौजूद हैं जिन्हे अभी भी दलितों के खिलाफ उच्च जाति के लोग इस्तेमाल करते हैं, जबकि 99 प्रकार की अस्पृश्यता दलितों की 32 उप-जातियों में भी प्रचलित है।

सात साल बाद, 15 अगस्त, 2017 को, जब नवसर्जन ट्रस्ट के प्रमुख मार्टिन मैकवान ने अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान फिर से शुरू किया, तो एनजीओ के सदस्यों ने मुख्यमंत्री को 125 फीट/ 83.3 फीट का हाथ से बुना हुआ एक राष्ट्रीय ध्वज पेश किया था। एक संवैधानिक प्रतीक के रूप में और उनसे दलितों पर होने वाले जातिगत अत्याचार और अस्पृश्यता के खिलाफ कदम उठाने की मांग की गई थी। हालांकि, मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने राष्ट्रीय ध्वज लेने से इनकार कर दिया। इसके बजाय, गांधीनगर के तत्कालीन कलेक्टर ने राष्ट्रीय ध्वज लिया, और ज्ञापन के जरिए मुख्यमंत्री से वर्ष 2047 तक कम से कम एक गांव को अस्पृश्यता मुक्त घोषित करने की अपील की गई थी। 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें।

Dalit Youth Thrashed in Ahmedabad for Sporting Moustache

dalit atrocity
SC ST Prevention of Atrocities Act
untouchability
Casteism
Gujarat

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