NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
भारत
राजनीति
बोकारो स्टील प्लांट के विस्थापित ग्रामीण त्रासदी की भट्टी में झुलस रहे हैं
क़रीब 70,000 ग्रामीण जो दशकों से सेल द्वारा हासिल की गई विवादित भूमि पर रह रहे हैं, उनकी कोई आधिकारिक मान्यता नहीं हैं और इसलिए वे सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं उठा सकते हैं।
विक्रम राज कुमार
31 Aug 2021
Translated by महेश कुमार
बोकारो स्टील प्लांट

जुलाई के तीसरे सप्ताह में झारखंड के बोकारो स्टील प्लांट के गेट पर करीब 700 युवकों ने धरना दिया था. बोकारो स्टील प्लांट के निर्माण से विस्थापित हुए ग्रामीणों की संस्था डिस्प्लेस्ड एप्रेंटिस एसोसिएशन के बैनर तले एकत्रित हुए प्रदर्शनकारियों ने विरोध के स्वरूप स्टील प्लांट के मुख्य गेट को ताला मार दिया था 

13 जुलाई को शुरू हुआ धरना 18 जुलाई को तब समाप्त हुआ, जब स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) के प्रतिनिधियों ने संघर्षरत युवाओं से मुलाक़ात की और 15 दिनों के भीतर उनकी मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया।

इसे 1965 में सोवियत संघ की सहायता से तैयार किया गया था, और यह भारत का चौथा एकीकृत सार्वजनिक क्षेत्र का इस्पात संयंत्र था जिसे बोकारो स्टील लिमिटेड (बीएसएल) द्वारा प्रबंधित किया जाता था, और इस कंपनी को 1964 में स्थापित किया गया था। 1978 में, सार्वजनिक क्षेत्र की आयरन और स्टील कंपनियों (बीएसएल और सेल) का विलय कर दिया गया था, और ऐसा इस्पात कंपनी पुनर्गठन और विविध प्रावधान अधिनियम के तहत किया गया था।

बोकारो स्टील प्लांट का एक दृश्य।

जब 1956 में जब संयंत्र का प्रस्ताव आया था, तब श्री कृष्ण सिन्हा के नेतृत्व वाली तत्कालीन बिहार सरकार ने प्रस्ताव को तेजी से मंजूरी दे दी थी और इसके लिए करीब 31,287.24 एकड़ भूमि भी प्रदान की थी, जिसमें 26,908.565 एकड़ भूमि अधिग्रहीत भूमि थी, 3,600.215 एकड़ गैर मजरुआ भूमि थी जो मुफ्त थी, और करीब 778.46 एकड़ वन भूमि शामिल थी।  

कुछ ही दिनों में राज्य सरकार ने जमीन खाली कर बोकारो स्टील प्लांट को सौंप दी थी, लेकिन उचित पुनर्वास और योजना पर सहमति के अभाव में करीब 825.855 एकड़ भूमि यानि 20 मौजा भूमि (जिसमें गांवों के कई समूह रहते हैं) को खाली नहीं कराया जा सका। सेल जहां इन 20 मौजा भूमि पर दावा करती है, वहीं गांव वाले इसे अपनी अधिग्रहीत जमीन बताते हैं, जिनका पुनर्वास पिछले छह दशकों से लंबित पड़ा है।

“हमारे परिवार सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। पहली कोविड लहर के दौरान भी, जब सरकार आम आबादी की सहायता कर रही थी, हमें कोई मदद नहीं मिली,” प्रभावित गांवों में से एक, चेताटांड के मूल निवासी राजेश तुरी ने उक्त बातें बताई। स्वयं को विस्थपित और लावारिस कहने वाले ग्रामीणों ने झारखंड विस्थपित समाज नाम से एक संगठन बनाया है।

महुआर मौजा के निवासी अपनी पीड़ा साझा करते हुए। 

ग्रामीण ख़ुद को लावारिस क्यों कहते हैं?

बोकारो स्टील सिटी में स्थित, यह क्षेत्र बोकारो थर्मल पावर प्लांट, चंद्रपुरा पावर प्लांट और चंदनकियारी टाउनशिप सहित कई उद्योगों से घिरा हुआ है। चूंकि गांव विवादित भूमि पर स्थित हैं, इसलिए 20 मौजा भूमि में से 19 में कोई पंचायत नहीं है।

हालांकि इन 19 मौजा में रहने वाले लगभग 70,000 ग्रामीणों में से अधिकांश मतदाता सूची का हिस्सा हैं, लेकिन आधिकारिक मान्यता की कमी के कारण वे ग्रामीण योजनाओं के हक़दार नहीं हैं।

महामारी के चरम पर पहुँचने के कारण तेजी से बढ़ी बेरोजगारी के बाद भी ग्रामीणों को मजदूरी पर नहीं रखा गया था। शिबुटांड गांव के मूल निवासी झरीलाल महतो ने बताया कि सेल सड़कों का निर्माण कर रही है और यहां गेल का प्लांट भी लगाया जा रहा है. “हमें स्टेडियम बनाने की योजना के बारे में भी पता चला है। लेकिन ये कंपनियां हमें इस डर से मजदूरों के रूप में काम पर नहीं रखती हैं कि इससे हमारी आधिकारिक पहचान बन सकती है।” उन्होंने कहा कि गांव वालों को काम के लिए शहर में साइकिल चला कर जाना पड़ रहा है क्योंकि बेरोजगारी अधिक बढ़ गई है।

विकास तले अंधेरा

यद्यपि, ठेका श्रमिकों या मजदूरों के रूप में सेल में काम पर रखे गए कुछ ग्रामीणों का आरोप है कि भ्रष्ट ठेकेदारों और अधिकारियों के कारण उन्हें तय राशि से कम भुगतान किया जा रहा है। “हमारे वेतन का एक बड़ा हिस्सा ठेकेदार खा जाते हैं, अगर हम विरोध करते हैं तो हमें धमकी दी जाती है। सेल के कई वरिष्ठ अधिकारियों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हुए हैं पौर उनकी जांच चल रही है।'

एक अन्य ग्रामीण कुंवर राजन सिंह ने बताया कि जब संयंत्र स्थापित किया जा रहा था, तो “हमारे पूर्वजों से विकास, रोज़गार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं का वादा किया गया था। जल्द ही, यह एक बुरे सपने में बदल गया। मेरे पूर्वजों ने सरकार को बहुत सस्ते दामों पर अपनी जमीन बेच दी थी। लेकिन न तो सरकार और न ही सेल प्रशासन ने वे वादे पूरे किए।

कारखाने के कचरे को डालने से कभी उपजाऊ भूमि अब बंजर हो गई है।

आधिकारिक तौर पर अधिग्रहण की गई ज़मीन पर कुछ भी बनाने की कोशिश करने पर ग्रामीणों को पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। “हमारी भूमि संयंत्र की वजह से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण से बंजर हो गई है। स्थानीय कार्यकर्ता बिनोद राय ने बताया, कि हमारी आजीविका का प्राथमिक स्रोत जो कृषि होता था वह अब संभव नहीं है। दामोदर नदी की धाराएं भी, जो हमारे पीने के पानी का स्रोत होती थीं, अब दूषित हो गई हैं”।

कभी पीने योग्य पानी का स्रोत, दामोदर नदी में कुछ किलोमीटर आगे जाकर मिलने वाली धारा अब नाले में बदल गई है।

सेल ने प्रदर्शन कर रहे युवाओं को 15 दिनों के भीतर उनकी मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया है, अब एक महीने से अधिक समय बीत चुका है। ग्रामीण एक बार फिर उम्मीद खोने के कगार पर हैं। “हमने जिला प्रशासन, सांसदों, विधायकों और मुख्यमंत्री को अपनी पीड़ा से अवगत कराया है, लेकिन उन सभी से हमें निराशा ही हाथ लगी है। झारखंड क्रांतिकारी मजदूर संघ और विस्थपित साझा मंच के सदस्य अरविंद कुमार ने कहा कि हमारे पास सड़कों पर आंदोलन करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है क्योंकि पिछले पांच दशकों में सभी सरकारों ने हमें निराश किया है।“

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को विस्थापितों की ओर से भेजा गया पत्र।

विक्रम राज एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं

Jharkhand
Bokaro Steel Plant
Hemant Soren
Steel
Bokaro
unemployment
SAIL
pollution

Related Stories

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

जनवादी साहित्य-संस्कृति सम्मेलन: वंचित तबकों की मुक्ति के लिए एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप

मध्य प्रदेश : एलपीजी की क़ीमतें बढ़ने के बाद से सिर्फ़ 30% उज्ज्वल कार्ड एक्टिव

हम भारत के लोगों की असली चुनौती आज़ादी के आंदोलन के सपने को बचाने की है

​गत 5 वर्षों में पदों में कटौती से सरकारी नौकरियों पर छाए असुरक्षा के बादल

हम भारत के लोग : इंडिया@75 और देश का बदलता माहौल

हम भारत के लोग : हम कहां-से-कहां पहुंच गये हैं

संविधान पर संकट: भारतीयकरण या ब्राह्मणीकरण

झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध

हम भारत के लोग:  एक नई विचार श्रृंखला


बाकी खबरें

  • aicctu
    मधुलिका
    इंडियन टेलिफ़ोन इंडस्ट्री : सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के ख़राब नियोक्ताओं की चिर-परिचित कहानी
    22 Feb 2022
    महामारी ने इन कर्मचारियों की दिक़्क़तों को कई गुना तक बढ़ा दिया है।
  • hum bharat ke log
    डॉ. लेनिन रघुवंशी
    एक व्यापक बहुपक्षी और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता
    22 Feb 2022
    सभी 'टूटे हुए लोगों' और प्रगतिशील लोगों, की एकता दण्डहीनता की संस्कृति व वंचितिकरण के ख़िलाफ़ लड़ने का सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि यह परिवर्तन उन लोगों से ही नहीं आएगा, जो इस प्रणाली से लाभ उठाते…
  • MGNREGA
    रबीन्द्र नाथ सिन्हा
    ग्रामीण संकट को देखते हुए भारतीय कॉरपोरेट का मनरेगा में भारी धन आवंटन का आह्वान 
    22 Feb 2022
    ऐसा करते हुए कॉरपोरेट क्षेत्र ने सरकार को औद्योगिक गतिविधियों के तेजी से पटरी पर आने की उसकी उम्मीद के खिलाफ आगाह किया है क्योंकि खपत की मांग में कमी से उद्योग की क्षमता निष्क्रिय पड़ी हुई है। 
  • Ethiopia
    मारिया गर्थ
    इथियोपिया 30 साल में सबसे ख़राब सूखे से जूझ रहा है
    22 Feb 2022
    इथियोपिया के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में लगभग 70 लाख लोगों को तत्काल मदद की ज़रूरत है क्योंकि लगातार तीसरी बार बरसात न होने की वजह से देहाती समुदाय तबाही झेल रहे हैं।
  • Pinarayi Vijayan
    भाषा
    किसी मुख्यमंत्री के लिए दो राज्यों की तुलना करना उचित नहीं है : विजयन
    22 Feb 2022
    विजयन ने राज्य विधानसभा में कहा, ‘‘केरल विभिन्न क्षेत्रों में कहीं आगे है और राज्य ने जो वृद्धि हासिल की है वह अद्वितीय है। उनकी टिप्पणियों को राजनीतिक हितों के साथ की गयी अनुचित टिप्पणियों के तौर पर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License