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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: सड़क से कोर्ट तक संघर्ष करती महिलाएं सत्ता को क्या संदेश दे रही हैं?
एक ओर शाहीन बाग़ से लेकर किसान आंदोलन तक नारे लगाती औरतों ने सत्ता की नींद उड़ा दी है, तो वहीं दूसरी ओर प्रिया रमानी की जीत ने सत्ता में बैठे ताक़तवर लोगों के खिलाफ महिलाओं को खुलकर बोलने का हौसला दिया है।
सोनिया यादव
07 Mar 2021
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

यूं तो आप हर साल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च के अवसर पर महिलाओं को स्पेशल फील करवाने वाली कई खबरें और सरकारी बयानों को पढ़ते होंगे, लेकिन आज हज़ारों महिलाएं जो सड़क से लेकर कोर्ट तक अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं उन्होंने इसकी अलग ही परिभाषा गढ़ दी है। एक ओर शाहीन बाग़ से लेकर किसान आंदोलन तक नारे लगाती औरतों ने सत्ता की नींद उड़ा दी है, तो वहीं दूसरी ओर प्रिया रमानी की जीत ने सत्ता में बैठे ताक़तवर लोगों के खिलाफ महिलाओं को खुलकर बोलने का हौसला दिया है।

अब महिलाएं बड़ी संख्या में बाहर आ रही हैं, खुलकर बात कर रही हैं और कोई उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर पा रहा है। पितृसत्तात्मक समाज में जहां औरतों का दायरा घर की चारदीवारी ही समझा जाता है। वहीं अब महिलाओं ने इस मुनवादी सोच को चुनौती देकर तमाम आंदोलनों में न सिर्फ अपनी हिस्सेदारी दिखाई है बल्कि उन आंदोलनों की अगुआई भी की है। आज महिलाएं न सिर्फ़ अपने समुदाय के बल्कि सभी के अधिकारों के लिए सड़क की लड़ाई लड़ रही हैं।

हम कमज़ोर नहीं, मज़बूत महिलाएं हैं!

चाहे तस्वीरों में पुलिस से भिड़ती कॉलेज की लड़कियाँ हो या हाड़ कंपाने वाली सर्दी में बैठी शाहीन बाग़ की दादियां, या फिर कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ गाँव-गाँव से राष्ट्रीय राजधानी का सफ़र तय करने वालीं महिलाएं। औरतों ने ये जाहिर कर दिया कि अब वो चुपचाप सब कुछ होते नहीं देखेंगी, वो बदलाव के लिए संघर्ष करेंगी। कभी शांत प्रदर्शनकारी बनकर, तो कभी सरकारों से लोहा लेकर। कभी पुलिस की लाठियों का मुक़ाबला कर तो कभी अपने अधिकारों के लिए लंबी न्यायिक लड़ाई लड़, अब वो ये साबित कर देना चाहती हैं कि हम कमज़ोर नहीं, मज़बूत महिलाएं हैं।

आइए इस महिला दिवस पर उन सभी महिलाओँ के योगदान का सम्मान करते हैं, जिनकी दृढ़ता और साहस समाज में आए नए परिवर्तन का संकेत है और ये परिवर्तन कितनी दूर जा सकता है, इसका उदाहरण सर्द रातों में देश के भीतर क्रांति की एक नई मशाल बनी शाहीन बाग़ की औरते हैं। इसका सबूत विषम परिस्थितियों में 100 दिन से अधिक देश की राजधानी की सीमाओं पर डटी हुई हज़ारों महिला किसान हैं, जो अपने हक़ की लिए लड़ाई लड़ रही हैं। इसकी ताज़ा मिसाल पत्रकार प्रिया रमानी की जीत है, जिन्होंने कभी सत्ता के शीर्ष पद पर रहे एमजे अकबर की आंखों में आंखें डाल अपने सम्मान के लिए आवाज़ उठाई।

“तेरे गुरूर को जलाएगी वो आग हूं, आकर देख मुझे मैं शाहीन बाग़ हूं”

शाहीन बाग़ का आंदोलन पहले दिन से ही सुर्खियों में था। ये एक आंदोलन से ज़्यादा नागरिक चेतना का प्रतीक था, इसकी वजह वहां धरने पर बैठी औरतें थी। वो औरतें जो सीएए-एनआरसी के विरोध में तमाम बंदिशों को तोड़ कर अपने अधिकार और पहचान के लिए सड़कों पर उतरीं थी। कड़ाके की ठंड और पुलिस की लाठियों की परवाह किए बिना उन्होंने अपने संघर्ष को कई महीनों तक लगातार जारी रखा।

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महिलाएं 'आज़ादी' और 'हम संविधान बचाने निकले हैं, आओ हमारे साथ चलो' जैसे नारे लगाती थी और 'संविधान की प्रस्तावना' को हर दिन पढ़ती थीं। आलम यह हुआ कि दिल्ली से लेकर बंगाल तक, बिहार से लेकर बंबई और अन्य कई राज्यों में महिलाएं लामबंद हुईं और सत्ता की आंखों में आंख डालकर सवाल करने लगीं, उन्हें बाबा साहेब के संविधान की याद दिलाने लगीं।

संघर्ष को बदनाम करने की कोशिशों के बीच महिलाओं का बेबाक जवाब

शाहीन बाग़ ने देश की महिलाओं के जीवित होने का एहसास पूरे देश को कराया। इस आंदोलन को बेइंतिहा मोहब्बत के साथ कई गुना नफ़रत भी मिली। महिलाओं के इस संघर्ष को बदनाम करने की खूब कोशिशें हुई। तरह-तरह के फ़ेक फ़ोटो और झूठे दावों के साथ इन महिलाओं का चरित्र-हनन किया गया।

कई मुख्यमंत्रियों और बड़े नेताओं द्वारा महिलाओं को अपशब्द कहे गए। लेकिन धरने पर डटी औरतों का हौसला कम नहीं हुआ। वो और उत्साह से इस आंदोलन में शिरकत करने लगीं। टीवी चैनलों के डिबेट से लेकर न्यूज़ एंकरों के सवालों तक सबका बेबाकी से जवाब देने लगीं। आज़ाद भारत में ऐसा पहली बार हुआ जब इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम औरतें अपने हक के लिए सड़कों पर उतरीं।

किसान आंदोलन का संदेश ‘महिलाओं की ज़रूरत सड़क पर है, संघर्ष में है’

कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ किसान आंदोलनों में भागीदारी करती गांव-गांव से आईं महिलाएं, ‘दिल्ली चलो’ आंदोलन की महज़ समर्थक ही नहीं बल्कि उसमें बराबर की भागीदार भी हैं। इस बात का सबूत है कि वो समय आने पर कृषि क्षेत्र में अपने अदृश्य योगदान से पर्दा उठाकर, देश को ये एहसास करा सकती हैं कि खेती-बाड़ी में उनकी भूमिका कितनी बड़ी और महत्वपूर्ण है।

इसे भी पढ़ें: महिला किसान दिवस: खेत से लेकर सड़क तक आवाज़ बुलंद करती महिलाएं

किसान आंदोलन में शामिल दिल्ली के सिंघु, टिकरी और गाज़ीपुर बॉर्डर पर बैठी औरतों ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे को भी जवाब दिया, जिन्होंने इस आंदोलन में महिलाओं की भूमिका को लेकर कई टिप्पणियां की थीं। इन टिप्पणियों को महिला किसानों रूढ़िवादी और समाज की पितृसत्तामक सोच की नुमाइश बताया। महिलाओं ने एक सुर में चीफ़ जस्टिस को ये संदेश दिया की ‘महिलाओं की ज़रूरत सड़क पर है, संघर्ष में है।

प्रिया रमानी की जीत से महिलाओं को मिला एक नया हौसला

इंडिया टुडे, द इंडियन एक्सप्रेस और द मिंट का हिस्सा रह चुकी वरिष्ठ पत्रकार प्रिया रमानी ने मीटू अभियान के दौरान तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर पर यौन दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था। वो एमजे अकबर पर यौन शोषण का आरोप लगाने वाली पहली महिला थीं। हालांकि प्रिया के यह पोस्ट करने के कुछ घंटों के अंदर ही कई और महिलाओं ने उनकी बात से हामी भरते हुए अकबर पर उनके साथ अनुचित व्यवहार करने के आरोप लगाए। प्रिया के बाद #MeToo अभियान के तहत ही 20 महिला पत्रकारों ने अकबर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।

इन महिलाओं का आरोप था कि द एशियन एज और अन्य अख़बारों के संपादक रहते हुए अकबर ने उनका यौन उत्पीड़न किया था। अकबर ने न्यूज़रूम के अंदर और बाहर उनके साथ अश्लील हरकतें की थीं। चारों ओर से घिरे एमजे अकबर को इन आरोपों के बाद 17 अक्तूबर 2018 को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा देना पड़ा था।

इसे भी पढ़ें: प्रिया रमानी की जीत महिलाओं के जीत है, शोषण-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सच्चाई की जीत है!

न जाने कितनी औरतें अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न की कहानियां अपने दिल में ही लिए सालों साल जीती हैं और शायद उस दर्द को अपने अंदर ही समेटे दुनिया छोड़ जाती हैं लेकिन मीटू अभियान और प्रीया रमानी केस का यही हासिल है कि अब भविष्य में शायद औरतें दिल में यौन उत्पीड़न का दर्द लिए नहीं मरेंगी, एक नई उम्मीद से अपनी आवाज़ बुलंद करेंगी फिर चाहें सामने कोई भी क्यों न हो, शोषण करने वाला कितना भी बड़ा व्यक्ति या ताकतवर क्यों न हो, उन्हें एक नया हौसला मिलेगा।

महिलाओं के संघर्ष ने एक लंबा सफ़र तय किया है!

गौरतलब है कि आज़ादी की लड़ाई से लेकर चिपको आंदोलन तक देश में महिलाओं के संघर्ष की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। यूं तो निर्भया मामले से लेकर किसान मोर्चे तक महिलाओं में ये सजगता और साहस पहले भी कई मौक़ों पर दिखा है।

साल 2012 में निर्भया मामले के बाद बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चियां इंडिया गेट पर जमा हुईं। उन्होंने पुलिस की लाठियां और वॉटर कैनन झेले, लेकिन अपने हौसले और दृढ़ता से महिलाओं ने सरकार को यौन हिंसा के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानून बनाने के लिए बाध्य किया।

महाराष्ट्र में मार्च 2018 में महिला किसानों के छिले हुए नंगे पैरों की तस्वीरें आज भी इंटरनेट पर मिल जाती हैं। ये नासिक से मुंबई तक किसानों की एक लंबी रैली थी। इसमें महिला किसानों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उनके इसके बाद नवंबर 2018 में क़र्ज़ माफ़ी की माँग को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों से किसान महिलाएं विरोध प्रदर्शन के लिए दिल्ली पहुँची थीं।

रूढ़ीवादी परंपरा को तोड़ती हुई औरतें, सबरीमाला मंदिर हो या हाजी अली दरगाह, हिंसक प्रदर्शनकारियों के सामने अपनी जान जोख़िम में डालकर भी मंदिर पहुँचीं। महिलाओं की इस ताक़त में उम्र की कोई सीमा नहीं है। युवा, उम्रदराज़ और बुज़ुर्ग, हर उम्र की महिला के हौसले बुलंद नज़र आते हैं।

यूं तो महिलाओं के संघर्ष ने एक लंबा सफ़र तय किया है लेकिन साल 2020 में जिस तरह नागरिक संशोधन कानून के खिलाफ महिलाएं बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरीं और जिस तरह साल 2021 की सर्द रातों में महिलाओं ने किसान आंदोलन में अपनी आवाज़ बुलंद की, उसने आने वाले दिनों में महिला आंदोलनों की एक नई इबारत लिख दी है।

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