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भारत
राजनीति
झूठ और पाखण्ड भाजपा की रणनीति है
वीरेन्द्र जैन
02 Mar 2016
क्या आपको याद है कि अफज़ल गुरू की फाँसी से उपजे जिस विवाद पर आज देश गर्म है उससे सम्बन्धित  अपराध अर्थात आज़ाद भारत में संसद पर हमला इससे पहले भी हो चुका है। यह हमला 1966-67 में हुआ था और गौरक्षा के नाम पर चलाये गये उस आन्दोलन में भारतीय जनसंघ भी शामिल था। चिमटाधारी साधु भेषधारी हमलावरों ने सुरक्षाकर्मियों पर हमला करते हुए सदन में घुसने का प्रयास किया था व संसद की सुरक्षा में सुरक्षाकर्मियों को गोली चलाना पड़ी थी। उस समय साधु सन्यासियों के भक्त माने जाने वाले गुलजारी लाल नन्दा गृहमंत्री थे जो सैनिकों को गोली न चलाने की अपील करते हुए सदन से दौड़ कर बाहर आये थे किंतु उनकी सुरक्षा के लिए सैनिकों को उन्हें जबरदस्ती अन्दर ले जाना पड़ा था। आज भारतीय जन संघ का नया संस्करण भाजपा उस घटना को याद भी नहीं करना चाहती।
भाजपा का सबसे बड़ा दुर्गुण उसका दोहरापन है। वे जानते हैं कि उनके लक्ष्यों और कार्यप्रणाली के प्रति देश की जनता का समर्थन नहीं है इसलिए वे येन केन प्रकारेण चुनाव जीत कर सत्ता पर अधिकार कर लेना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें निरंतर झूठ बोलना पड़ता है या अपने वक्तव्यों को गोलमोल और अस्पष्ट बनाना पड़ता है। सत्ता से अर्जित शक्ति और संसाधनों का प्रयोग संघ के दूसरे 62 संगठन करते हैं। इन संगठनों के ऊपर संकट आने पर ये दूरी बना लेते हैं, और उन्हें अपने से अलग बतलाने लगते हैं। सत्ता के संसाधनों से जिन संगठनों का ये पोषण करते हैं उनसे अलग होने का झूठ इन्हें बहुत अविश्वसनीय व हास्यास्पद बना देता है।
 
सत्ता पाने के लिए लोहिया के गैर काँग्रेसवाद की मूल भावना से असहमत होते हुए भी ये उसका समर्थन करने वालों में सबसे आगे रहे व संविद सरकारों का युग प्रारम्भ होने के बाद ये सभी संविद सरकारों में सम्मलित हुए भले ही उनके घटक दलों का मूल चरित्र कुछ भी रहा हो और इन्हें कैसी भी हैसियत में रखा गया हो। राज्यों के सभी संविद सरकारों में सम्मलित रहने के बाद 1977 में जब केन्द्र में गैर काँग्रेस सरकार का पहला प्रयोग हुआ तो उसमें सबको अपने अपने दल को जनता पार्टी में विलीन करने के लिए कहा गया। इस अवसर पर मार्कसवादी कम्युनिष्ट पार्टी ने ऐसा करने से मना कर दिया और केवल सीटों का चुनावी समझौता किया किंतु भारतीय जनसंघ ने सत्ता में साझेदार होने के लिए अपनी पार्टी को विलीन करने का दिखावा दिया। इस मामले में जल्दी ही उनका झूठ पकड़ा गया क्योंकि उनके लोग अभी भी जनता पार्टी के नहीं अपितु संघ के आदेशों पर काम कर रहे थे और उसके प्रति ही बफादार थे। देश की पहली गैरकाँग्रेस सरकार इनके इस झूठ के कारण ही भंग हुयी थी। 1989 में जब वी पी सिंह ने काँग्रेस से अलग होकर जनमोर्चा बनाया था तब उनका झंडा लेकर सबसे पहले ये ही आगे निकले थे किंतु चुनाव के बीच ही उन्हें इनकी योजना की भनक मिल गयी थी और उन्होंने इनसे किनारा कर लिया था। बाद में जीत के आँकड़े ऐसे आये कि उन्हें भाजपा और सीपीएम दोनों के समर्थन की जरूरत थी जिससे उत्साहित होकर ये फिर से सत्ता में सम्मलित होने के लिए उतावले हो गये। किंतु सीपीएम ने अपनी नीतियों के अनुसार सरकार में सम्मलित होने से इंकार कर दिया और समर्थन के लिए शर्त रख दी कि वह तभी दिया जायेगा जब भाजपा को सरकार में सम्मलित न किया जाये। तब इन्हें मजबूरन सत्ता से बाहर रहना पड़ा था। यही समय था जब इन्होंने मंडल कमीशन का विरोध करने के लिए एक ओर काँग्रेस से हाथ मिला लिया व दूसरी ओर राम जन्मभूमि मन्दिर के नाम पर रथयात्राओं की योजना बनायी।
 
राम जन्मभूमि मन्दिर की याद इन्हें न तो उत्तर प्रदेश में संविद सरकारों के दौर में आयी थी और न ही केन्द्र में जनता पार्टी में सम्मलित रहते हुए ही आयी थी। बाद में भी अटलबिहारी की केन्द्र में सरकार के समय व उत्तर प्रदेश में मायावती के साथ सरकार बनाने के बाद इन्होंने मुद्दे को फिर दबा कर रखा। इससे स्पष्ट हो गया कि ये मुद्दा उनकी आस्था का नहीं अपितु चुनावी कूटनीति का था। वोटों के लिए उन्होंने जब भी सम्भव हुआ इस मुद्दे से लोगों की आस्थाओं का विदोहन किया और कभी भी अपनी नीति स्पष्ट नहीं की। रथयात्रा से पूरे देश में घूमते हुए जब अडवाणी जी अपने पीछे एक रक्तरंजित लकीर छोड़ते आ रहे थे और उनके कार्यकर्ताओं के उत्तेजक नारे बाबरी मस्ज़िद को तोड़ने का वातावरण बनाते आ रहे थे तब उसे तोड़ने के बाद उन्होंने साफ झूठ कहा कि हमारा कोई इरादा मस्ज़िद तोड़ने का नहीं था और मैं [अडवाणी] तो उन्हें वापिस बुला रहा था, किंतु वे मराठीभाषी होने के कारण मेरी बात समझ नहीं पाये।
 
इससे पूर्व राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने आश्वासन दिया था कि मस्ज़िद की रक्षा की जायेगी किंतु मस्ज़िद गिरने के बाद में कहा कि राष्ट्रीय एकता परिषद की कोई संवैधानिक भूमिका नहीं है। इस मामले में इन लोगों ने न केवल देश को धोखा दिया अपितु अपने आस्थावान कार्यकर्ताओं और समर्थकों को भी धोखे में रख कर अपनी सुविधानुसार मुद्दे को भुनाया या भुलाया। राम के नाम पर अपने अन्दोलन चलाने के बाद भी वचनों के प्रति दृढ नहीं रहे।
 
अन्ना के भ्रष्ट्राचार विरोधी आन्दोलन के समय इन्होंने उसे हथियाने की कोशिश की, आन्दोलनकारियों के भोजन की व्यवस्था की, किंतु इनके सत्तालोलुपता के इतिहास को देखते हुए जब इन्हें किनारे कर दिया गया तब इन्होंने अन्ना का साथ छोड़ दिया व उस आन्दोलन के घटकों के विरोधी हो गये।
 
गुजरात 2002 में किसी व्यक्ति विशेष के प्रति आक्रोश से उपजी आगजनी की घटना को साम्प्रदायिक उन्माद में बदलकर भयानक नरसंहार होने दिया और पूरे प्रदेश को साम्प्रदायिक आग में झौंक दिया। सूचना माध्यमों पर सबसे पहले अधिकार करने वाले इनके संगठन ने जब जनता पार्टी में मौका मिला था तब सूचना प्रसारण मंत्रालय उनकी पहली पसन्द थी जिस दौरान अडवाणीजी ने सारे सूचना माध्यमों में अपने लोग भर डाले थे। 2002 में साबरमती एक्सप्रैस के ‘एक डिब्बे में लगी आग’ को उन्होंने ‘कार सेवकों से भरी ट्रैन’ में आग लगाना बताया। जबकि सच यह था कि इस दुखद घटना में जो 59 लोग जल कर मरे थे उनमें कार सेवक केवल दो थे। शेष मृतकों में मासूम बच्चे और महिला यात्री थीं। इतने बेगुनाग लोगों का मारा जाना भी बेहद दुखद और दिल दहला देने वाली घटना है किंतु घटना का मूल चरित्र उस तरह से साम्प्रदायिक व राम मन्दिर आन्दोलन से जुड़ा नहीं था जिस तरह से उसे प्रचारित करके उन्माद पैदा किया गया। जिन लोगों पर आरोप लगाया गया उनमें से आधे से अधिक लोगों को अदालत ने निर्दोष पाकर छोड़ दिया किंतु उनकी ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण बीस बरस जेल में ही कट गये। इन निर्दोषों में से दो की मृत्यु तो जेल में ही हो गयी थी। बाद में हरेन पंड्या की हत्या से लेकर गवाहों को बदलने आदि की सैकड़ो कहानियां स्टिंग आपरेशन में सामने आयीं।
 
इसी तरह छोटे मोटे स्तर पर ‘कैश फार वोट’, राम सेतु, रोहित वेमुला, आदि की हजारों कहानियां इनसे जुड़ी हैं। जे एन यू का ताज़ा विवाद भी देश की राजधानी में मीडिया के सहारे एक ज्वलंत सच को झुठलाने का घृणित उदाहरण है जो देश की राजधानी की इलैक्ट्रोनिक पारदर्शिता व सोशल मीडिया के कारण सच जल्दी सामने आ गया। नारेबाजी की इस घटना को राष्ट्रद्रोह से जोड़ कर अपने ही लाखों समर्थक लोगों को भ्रमित करके उत्तेजित किया है। अभी तक पीड़ित पक्ष अपने लिए राहत पाकर चुप हो जाता था किंतु अब समानांतर मीडिया और सोशल मीडिया के साथ साथ लगभग प्रत्येक व्यक्ति के पास मौजूद मोबाइल कैमरा झूठ को ज्यादा चलने नहीं दे सकता। जिस व्यक्ति या संस्था ने देश की सुरक्षा से जुड़ी इतनी बड़ी घटना में के मूल स्वरूप को अपने टुच्चे राजनीतिक स्वार्थ के लिए बदला है व जिस मीडिया ने जान बूझ कर उसे चलाया है उसे माफ करना भी देशद्रोह है। जरूरत पड़ने पर उनसे सख्त पूछ्ताछ होना चाहिए भले ही नार्को टेस्ट का सहारा क्यों नहीं लेना पड़े। भाजपा में जो लोग षड़यंत्र रचने में लगे हैं वे अपने विरोधियों से ज्यादा तो अपने मासूम समर्थकों के साथ धोखा करते हैं जो इनके दुष्प्रचार से प्रभावित होकर हिंसा में उतर जाते हैं। आई टी सैल के प्रद्योत बोरा के साथ जे एन यू के एबीवीपी के तीन पदाधिकारियों का त्यागपत्र कुछ बोलता है, भले ही रामजेठमलानी, कीर्ति आज़ाद, शत्रुघ्न सिंहा, भोला सिंह, आर के सिंह, शांता कुमार आदि की मुखर और मार्गदर्शक मंडल की मौन असहमति को अब तक उपेक्षित रखा जा रहा हो।  
 
डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।
भाजपा
आरएसएस
नरेन्द्र मोदी
रोहित वेमुला
कन्हैया कुमार

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