NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कटघरे में कानून
नेहा दीक्षित
21 Feb 2015

“अगर सरकार अगले आने वाले दिनों मै कुछ नहीं करती है, तो मै वो करुँगी जो दामिनी नहीं कर सकी। मै मुजफ्फरनगर शहर के बीच में अपने बच्चों के साथ खुद को आग के हवाले कर दूंगी,” यह बात एस ने फ़ोन पर कही, दो दिन के बाद इनके बलात्कार के दो दोषियों को जमानत दे दी गयी। जब मै उससे जुलाई में मिली, एस अपने पति के साथ मिलकर ‘सिलाई प्रशिक्षण केंद्र’ की शुरुवात करने वाली थी और साथ ही अपने साथ हुए अन्याय के विरुद्ध न्याय हासिल करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध भी।

वह जिस दामिनी के सन्दर्भ में बात कर रही है उसे आप निर्भया के नाम से जानते होंगे, या फिर आप उसे सीधे तौर पर ‘दिल्ली गैंगरेप पीड़िता’ के रूप में भी जानते होंगे। एस का 8 सितम्बर, 2013 को शामली जिले के लांख गाँव में तीन लोगो ने सामूहिक बलात्कार किया था (इसके लिए आउटलुक की 4अगस्त, 2014 के अंक मै छपी कहानी शैडो लाइन्स पढ़े), लेकिन उसकी और उन सब सैकड़ों महिलाओं जिनका यौन शोषण और सामूहिक बलात्कार हुआ, की कठिन परीक्षा उस वक्त हुयी जब उनके मामलों को “मुजफ्फरनगर दंगों” की व्यापक श्रेणी में सम्मिलित कर दिया गया। यह पागलपन ही था – कि उत्तर प्रदेश के ‘अधिकारिक’ रिकॉर्ड के अनुसात्र इस दंगे में 60 हत्याएं हुयी, 7 बलात्कार और 40,000 लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा। इससे किसी को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए अगर हम वास्तविक तौर पर हुयी 200 मौतों, 1,20,000 लोगों के विस्थापन और बिना रिपोर्ट हुए सैकड़ों बलात्कार के केसों पर नज़र डालते हैं।

एस की यह दर्दनाक दास्ताँ कई मायनों में निर्भया मामले से कहीं ज्यादा आगे जाती है। अपराधी संसोधन कानून, 2013 जिसे कि वर्मा आयोग ने तैयार किया था और जिसका गठन 16 दिसंबर 2012 में हुए दिल्ली सामूहिक बलात्कार के बाद किया गया था, को फरवरी 2013 से लागू किया गया। जबकि इस कानून के तहत यौन हिंसा के सम्बन्ध में कई संशोधनों को पेश किया गया, कानूनविदों ने पहली बार ये ज़हमत उठायी कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान महिलाओं के विरुद्ध होने वाली व्यवस्थित हिंसा पर खास ध्यान दिया जाए। इसके परिणामस्वरूप एक महत्त्वपूर्ण संसोधन – धारा 376(2)(ग) को भारतीय दंड सहिंता में जोड़ा गया।

अन्य बातों के अलावा, यह धारा कहती है, “सांप्रदायिक हिंसा के दौरान कोई भी बलात्कार करता है उसे कड़ी-से-कड़ी सजा मिलनी चाहिए जिसकी सीमा 10 साल से कतई कम नहीं होनी चाहिए, और यह सज़ा उम्र कैद तक भी बढाई जा सकती है,साथ ही दोषी पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

मुजफ्फरनगर के दंगे इस कानून के लागू होने के पांच महीने बाद हुए। हिंसा की शुरुवात 7 सितम्बर को हुयी और अगले दिन तक जारी रही। 7 महिलाओं का 8 सितम्बर की सुबह सामूहिक बलात्कार हुआ, और केस दर्ज हुए। भारतीय इतिहास में’ ये पहले मामले थे जिन्हें इस नए बने कानून धारा 376(2)(ग) के तहत चलाया जाना था। इन मामलों के कानूनी पहलु को एक मिसाल कायम करने की रौशनी में देखना होगा।

एफ.आई.आर. : सात में से पांच सामूहिक बलात्कार के मामलों में एफ़.आई.आर. बलात्कार होने के तीन हफ्ते के भीतर दर्ज कर ली गयी। छठा मामला 9 अक्तूबर, 2013 को और सातवाँ मामला जोकि एस से सबंधित था ने दर्ज होने में सबसे ज्यादा समय लिया। एस ने अपनी एफ.आई.आर दुर्घटना के पांच हफ्ते बाद 22 अक्टूबर, 2013 को मुजफ्फरनगर के फुगाना थाने को रजिस्टर पोस्ट से भेजी जिसमे उसने तीन अभियुक्तों का नाम लिया था। पुलिस ने न तो एफ.आई.आर दर्ज की और न ही शिकायत प्राप्ति पर कोई जानकारी दी। एफ.आई.आर 18 फरवरी, 2014 को तभी दर्ज हुयी जब सातों बलात्कार के मामलों में न्यायालय में पेश हो रही वकील वृंदा ग्रोवर ने शिकायत की कॉपी उतार प्रदेश सरकार का प्रतिनिद्धित्व कर रहे वकील को दी।

डाक्टरी जांच: कानून के अनुसार शिकायत दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर-भीतर डाक्टरी जांच हो जानी चाहिए। सभी सात महिलाओं का सामूहिक बलात्कार 8 सितम्बर 2013 को हुआ। हालांकि उनकी डाक्टरी जांच 29 सितम्बर, 2013 और 22 फरवरी, 2014 के बीच हुयी। दुर्घटना और जांच के बीच के इस अंतराल के चलते जांच रिपोर्ट बलात्कार होने पक्के ‘प्रमाण’ पर नहीं पहुँच पायी।

इलहाबाद हाई कोर्ट ने एफ.आई.आर और डाक्टरी जांच में हुयी देरी की वजह से 15 अक्टूबर, 2014 को सामूहिक बलात्कार की पीड़िता एफ के बलात्कारी को जमानत दे दी, जोकि उन सात महिलाओं में से एक है। यह जमानत इस आधार पर मिली क्योंकि “एफआईआर दायर करने मै 14 दिनों से ज्यादा समय का विलंब था और इसलिए पीड़ित महिला के बयान को स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि डाक्टरी जांच में उसके शरीर पर ज़ख्म के निशान नहीं पाए गए”। राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ अपील करना सही नहीं समझा।

मुवावजा : 26 मार्च, 2014 को सर्वोच्च न्यायालय ने मुजफ्फरनगर के साम्प्रदायिक दंगों पर दायर विभिन्न याचिकाओं जिसमें वृंदा ग्रोवर और कामिनी जैसवाल और उन सात महिलाओं की तरफ से दायर याचिकाएं भी शामिल थी, पर ध्यान देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि चार हफ्ते के भीतर-भीतर इन सात महिलाओं को मुवावजा प्रदान करे, जिसका कि आदेश के मुताबिक़ 26 अप्रैल, 2014 से पहले भुगतान करना था। सातों महिलाओं ने 9 अप्रैल, 2014 को मुवावजे के लिए अपनी अर्जियां दाखिल की।

मुवावजे की रकम अन्य लाभ के अलावा 5 लाख रूपए थी। जबकि पांच को यह मुवावजा 8 मई, 2014 को मिला और छठे को 22 मई, 2014 को और सातवें को 25 अक्टूबर 2014 को मिला, यानी कि घटना घटने के एक साल से भी ज्यादा वक्त गुजरने के बाद । वह भी उस वक्त मिला जब वकील वृंदा ग्रोवर और कामिनी जैसवाल ने न्यायालय की अवमानना का मामला कोर्ट में 25 सितम्बर 2014 को दायर किया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुवावज़े के अतिरिक्त यु.पी. सरकार से कहा कि इन महिलाओं को वित्तीय सहायता दी जाए ताकि ये अपने जीवन को पुन: स्थापित कर सके। यु.पी. सरकार ने हालांकि इन्हें भी अन्य साम्प्रदायिक दंगे के पीड़ितों/परिवारों की तरह मुवावजे/सहायता के रूप में कम्बल भेंट किये।

राज्य और पुलिस की भूमिका : 26 मार्च 2014 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यु.पी. सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया। फैसले में कहा “ हम दंगे होने की स्थिति को सही वक्त पर न भापने और उन्हें रोकने के लिए सही कदम न उठाने के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार मानते हैं” पुलिस हिंसा पर काबू पाने में पूरी तरह नाकामयाब रही; पीड़ितों को तभी बचाया जा सका जब केंद्र सरकार ने अर्धसैनिक बालों को राज्य में भेजा।

मामलों की जांच भी करीब एक महीने की देरी से शुरू हुयी। मुजफ्फरनगर जिले की पुलिस अधीक्षक कल्पना दीक्षित ने कहा कि दंगों से सम्बंधित यौन हमलों की जांच में इस लिए देरी हुयी क्योंकि सितम्बर में जो भी पुलिस अफसर जांच दल बनाए गए उनमे पुलिस की तरफ से एक भी महिला अफसर शामिल नहीं थी। माला यादव जोकि जांच अफसर है उन्हें विशेष जांच दल में नवम्बर 2013 में शामिल किया गया।

इस पूरे काल में और उसके बाद बलात्कार की शिकार इन सातों महिलाओं ने पुलिस के पास कईं शिकायते दर्ज की, जिसमें उन्होंने स्पष्ट तौर पर दोषियों द्वारा अपने प्रति और उनके परिवारों/रिश्तेदारों  के प्रति दी जा रही धमकियों के बारे में तफ्तीश से लिखा। इस समय राहत शिविरों में रह रही इन महिलाओं और उनके परिवारों को एफ.आई.आर दर्ज करने के 9 महीने बाद पुलिस सुरक्षा मिली। 

माला यादव के खिलाफ भी गंभीर शिकायतें थी। बलात्कार की शिकार महिलाओं में से एक ने कहा “माला यादव जोकि जांच अधिकारी हैं जब मेरा बयान दर्ज करने आई, उसने कैंप में मौजूद लोगो से कहा क्या उन्होंने जब मै वहां आई थी, उस दिन मेरे वस्त्र फटे हुए देखे थे । उसने यहाँ तक यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भेजे गए अकेले गार्ड से सुरक्षा नहीं होगी इसलिए बेहतर होगा की मै समझौता कर लूं।” एफ ने भी असंवेदनशील जांच की शिकायत की। जब वही अफसर इसके मामले की जांच करने आई, एफ ने बताया कि उसने शिविर के अन्य लोगों से पूछा , ‘क्या आपने इसे रोते/चिल्लाते हुए देखा? क्या इसने तुम्हे बलात्कार के बारे में बताया?” जाहिर है जिस आदमी का नाम उसने शिकायत में दर्ज किया था वह इसके हर-एक शब्द के बारे में जानता था जोकि उसने यादव को बताया था। “मै एक औरत हूँ जोकि कह रही है उसका बलात्कार सार्वजनिक तौर पर हुआ, जो अन्य औरतों के साथ नहीं हुआ। मै झूठ क्यों बोलूंगी? पुलिस के विवेक में कमी के चलते शिविर में जांच के दौरान यहाँ तक कि उन लोगो को भी पता चल गया जिनको नहीं मालूम था कि मेरे साथ बलात्कार हुआ है”।

                                                                                                                           

यहाँ तक कि  केएफ ने भी 29 मई, 2014 को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के समक्ष एक आवेदन दायर किया जिसमें उसने यादव के जांच करने के तौर तरीकों के बारे में लिखा और पूछा कि क्या उसका केस किसी निष्पक्ष जांच अधिकारी को दिया जा सकता है। तब तक कोई भी कदम नहीं उठाया गया जब तक कि वकील वृंदा ग्रोवर और जैसवाल ने सर्वोच्च न्यायालय में माला यादव के खिलाफ न्यायालय की अवमानना का मामला 2 नवम्बर, 2014 को दर्ज नहीं कर दिया। 23 नवम्बर, 2014 को सामूहिक बलात्कार होने एक साल से भी ज्यादा के बाद यादव को इस केस से हटाया गया।

एक्स जोकि टी के पति हैं, एक बलात्कार की शिकार महिला, ने भी दावा किया कि उनके बयान का दर्ज विडियो गाँव में अभियुक्त को दिखाया गया। उन्होंने भी इस अवसर पर विध्वंसक रणनीति दिखाई ताकि महिलाओं को रोका जा सके। जनवरी 2014 में, एक्स के भाई पर दंगे, डकैती और यहाँ तक उसके लश्कर-ए-तयबा के साथ संपर्क होने के लिए केस दर्ज किया गया! जब मीडिया में इसका समाचार आया तो पुलिस ने उस पर से रातो-रात केस हटा लिया।

पुलिस के खिलाफ न तो इस बात के लिए कोई कार्यवाही की कि उसने एस द्वारा लिखित शिकायत करने के बावजूद एफ.आई.आर दर्ज क्यों नहीं की, जोकि भारतीय दंड सहिंता की धारा 166ए के तहत गुनाह है।

आरोपपत्र : कानून के विपरीत जिसके अनुसार एफ.आई.आर अपराध होने के 90 दिन के भीतर होनी चाहिए, एक केस में आरोप पत्र 19 अप्रैल, 2014 को दाखिल की गयी, अन्य पांच केसों में 24 मई, 2014 को और एक अन्य केस में दिसंबर, 2014 को दाखिल की गई ।

गिरफ्तारी : सर्वोच्च न्यायालय ने 26 मार्च 2014 को यु.पी सरकार से कहा जांच को तेजी से आगे बढाए और सभी दोषियों को गिरफ्तार करे। रपट पेश करने के 6 महीने बाद 29 अभियुक्तों में से केवल 3 को ही गिरफ्तार किया गया। वकीलों द्वारा न्यायालय की अवमानना का कोर्ट में केस दाखिल करने, कोर्ट के फैसले के 6 महीने  और एफ.आई.आर दर्ज होने के करीब एक साल बाद ही राज्य प्रशासन सकते में आया और अन्य अभियुक्तों को गिरफ्तार किया, यानी बलात्कार होने के एक साल और तीन महीनों के बाद।

इस अंतरिम राहत के बाद भी, मजदूर वर्ग की पृष्ठभूमि से आई ये महिलायें – चाहे वे लुहार, खेत मजदूर, कारपेंटर आदि हो, को अभियुक्तों द्वारा नियमित तौर पर धमकाया गया। ये अभियुक्त प्रभुत्व वाली जात समुदाय से सम्बन्ध रखते हैं, जिनके पास गाँव में जमीने हैं और राज्य प्रशासन पर अपने धन-बल के चलते काफी प्रभाव है।

ट्रायल: सी.आर.पी.सी. की धारा 309 कहती है कि बलात्कार के मामले में आरोप पत्र दाखिल होने बाद दो महीने के भीतर मामले का निपटारा हो जाना चाहिए। और इन सात मामलों तो अभी तक ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ है, जबकि अभियुक्तों ने अभी से ही ज़मानत लेने की कवायद शुरू कर दी है। तीन अभियुक्तों को पहले से ही ज़मानत मिल गयी है, और 9 जनवरी 2015 को एस के केस में तीन में से दो लोगों को भी ज़मानत दे दी गयी है। उसके अगले ही दिन, एस की भतीजी जोकि स्थानीय राशन की दूकान पर राशन लेने गयी थी, को अभियुक्त परिवार के सदस्यों ने काफी धमकाया।  

हालात पर बोलते हुए इन महिलाओं की वकील वृंदा ग्रोवेर कहती हैं, “इन केसों की शुरुवात होने में हुई देरी गलती से नहीं बल्कि जानबूझकर की गयी है। राज्य सरकार वोट बैंक राजनीति में उलझ रही है और इसलिए वह इस इलाके की प्रभुत्व वाले समुदाय के अभियुक्तों को बचा रही है। इन सातों महिलाओं को लगातार जान से मारने की धमकी दी जा रही है। केस को मुजफ्फरनगर से बाहर दिल्ली में स्थानातरित किया जाना चाहिए ताकि वे कोर्ट के सामने बिना किसी भय के पेश हो सकें”। वकील की गवाहों की सुरक्षा की मांग को उस वक्त बल मिला जब 11 जनवरी, 2015 को बलात्कार के मामले मै आसाराम बापू के खिलाफ एक गवाह को मुजफ्फरनगर में ही गोली मार दी गयी थी।

ग्रोवर यह भी कहती हैं कि राज्य सरकार ने शुरुवात में धारा 376(2) (ग) को केस में लागू नहीं किया था जोकि खासतौर पर साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान हुयी यौन हमलो से सम्बंधित है। “इसे केवल हमारे जोर देने पर ही इन केसों से मई के महीने में जोड़ा गया”, वृंदा ग्रोवर ने कहा।

एस तब से अपने घर से नहीं निकली है जब से उसका बलात्कारी जेल से छूट कर बाहर आया है। उसने अस्थायी रूप से अपने सिलाई प्रशिक्षण केंद्र को बंद कर दिया है, जोकि उसका कमाई का एक मात्र जरिया था। उसने पूछा “ इसे आप क्या कहेंगे कि जब अभियुक्त आजादी से घूमता है और पीड़िता को घर में अपने आपको बंद करने के लिए मज़बूर होना पड़ता है?” जवाब में केवल माहौल में सन्नाटा है ।

 

यह लेख outlook पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है ।

(अनुवाद:महेश कुमार)

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

मुज़फ्फरनगर दंगे
वर्मा कमिटी रिपोर्ट
साम्प्रदायिकता
सांप्रदायिक ताकतें
भाजपा
आर.एस.एस
समाजवादी पार्टी

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी

क्या भाजपा शासित असम में भारतीय नागरिकों से छीनी जा रही है उनकी नागरिकता?

बिहार: सामूहिक बलत्कार के मामले में पुलिस के रैवये पर गंभीर सवाल उठे!


बाकी खबरें

  • Barauni Refinery Blast
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बरौनी रिफायनरी ब्लास्ट: माले और ऐक्टू की जांच टीम का दौरा, प्रबंधन पर उठाए गंभीर सवाल
    20 Sep 2021
    भाकपा (माले) और मज़दूर संगठन ऐक्टू की जांच टीम ने घटनास्थल का दौरा किया और अपनी एक जाँच रिपोर्ट दी, जिसमें उन्होंने कहा कि 16 सितंबर को बरौनी रिफाइनरी में हुआ ब्लास्ट प्रबन्धन की आपराधिक लापरवाही का…
  • New Homes, School Buildings, Roads and Football Academies Built Under Kerala Govt’s 100-Day Programme
    अज़हर मोईदीन
    केरल सरकार के 100-दिवसीय कार्यक्रम के तहत नए घर, विद्यालय भवन, सड़कें एवं फुटबॉल अकादमियां की गईं निर्मित  
    20 Sep 2021
    100-दिवसीय कार्यक्रम में शामिल परियोजनाओं के कार्यान्वयन पर नजर रखने के लिए बनाये गए राजकीय नियंत्रण-मंडल की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों के विभिन्न विभागों के तहत…
  • Afghanistan
    एम. के. भद्रकुमार
    शांघाई सहयोग संगठन अमेरिका की अगुवाई वाले क्वाड के अधीन काम नहीं करेगा
    20 Sep 2021
    एससीओ यानी शांघाई सहयोग संगठन, अमेरिका की अगुवाई वाले चार देशों के गठबंधन क्वाड के अधीन काम नहीं करेगा।
  • Indigenous People of Brazil Fight for Their Future
    निक एस्टेस
    अपने भविष्य के लिए लड़ते ब्राज़ील के मूल निवासी
    20 Sep 2021
    हाल ही में इतिहास की सबसे बड़ी मूल निवासियों की लामबंदी ने सत्ता प्रतिष्ठानों के आस-पास की उस शुचिता की धारणा को को तोड़कर रख दिया है जिसने सदियों से इन मूल निवासियों को सत्ता से बाहर रखा है या उनके…
  • Government employees in Jammu and Kashmir
    सबरंग इंडिया
    जम्मू-कश्मीर में सरकारी कर्मचारियों से पूर्ण निष्ठा अनिवार्य, आवधिक चरित्र और पूर्ववृत्त सत्यापन भी जरूरी
    20 Sep 2021
    16 सितंबर को जारी सरकारी आदेश में कहा गया है कि अगर किसी कर्मचारी के खिलाफ किसी भी तरह की प्रतिकूल रिपोर्ट की पुष्टि होती है तो उसे बर्खास्त किया जा सकता है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License