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रिकैपटिलाइजेशन : बैंकों को नहीं पूंजीपतियों को बचाने की कोशिश!
सरकार रिकैपटिलाइजेशन जैसे सभ्य शब्द गढ़कर पूंजीपतियों को बचाने की कोशिश करती है लेकिन किसानों की कर्ज़ माफ़ी करना सरकार अर्थव्यवस्था को डुबाने जैसा समझती है।
अजय कुमार
24 Dec 2018
बैंक  रिकैपटिलाइजेशन

देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से प्रबंधन का खेल है। प्रबंधन करने वालों के इरादों को समझिये आपको समझ में आ जाएगा कि अर्थव्यवस्था से किसको फायदा होगा और किसको नुकसान। बात यह है कि सरकार ने सरकारी बैंकों की खस्ताहाली के सुधार के लिए संसद से 41 हजार करोड़ रूपये की अर्जी लगा दी है। इस साल के बजट में सरकार ने बैंकिग सुधार के लिए तकरीबन 65 हजार करोड़ का प्रावधान कर दिया था। बैंकिंग की भाषा में इसे बैंकों की खस्ताहाल के सुधार के लिए बैंकों का पुनः पूंजीकरण यानी रिकैपिटलाइजेशन कहा जाता है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पत्रकरों से मुखातिब होते हुए कहा कि प्रांप्ट एंड करेक्टिव उपायों के तहत जिन बैंकों ने बेहतर तरीके से अपना कामकाज किया है,उन बैंकों के सुधार के लिए इस पैसे का इस्तेमाल किया जाएगा।

यहाँ यह समझने वाली बात है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने 11 सरकारी बैंकों को प्रांप्ट करेक्टिव एक्शन की सूची में डाल दिया था। इन सभी से कहा गया था कि वे एनपीए खातों की पहचान करें, लोन को वसूलें, जो लोन न दे उस कंपनी को बेच दें और नया लोन देना बंद कर दें। बैंकों का एनपीए जब खास सीमा से ज़्यादा हो गया तब यह रोक लगाई गई क्योंकि बैंक डूब सकते थे। आरबीआई और सरकार दोनों के बहुत लम्बे समय तक चले विवाद में यह मुद्दा भी मुख्य तौर पर शामिल था। विवाद का समाधान नहीं हुआ। हुआ यह है कि आरबीआई के दो गवर्नर रघुराम राजन और उर्जित पटेल को आरबीआई की आजादी में सरकार द्वारा दखलंदाजी की वजह से इस्तीफ़ा देना पड़ा। हालिया स्थिति ऐसी है कि 11 में कोई भी बैंक इस स्थिति में नहीं पहुंचा है कि उसे आरबीआई द्वारा लगे प्रतिबंधों से मुक्ति मिले। उदहारण के तौर पर इलाहबाद बैंक। इलाहबाद बैंक के एनपीए में पहले के मुकाबले अधिक इजाफा हुआ है लेकिन फिर भी इस बैंक से प्रतिबन्ध हटा लिया गया है। कहने का मतलब यह है कि सरकार अपनी मनमानी कर रह रही है और सरकार इस मुद्दे पर मनमानी क्यों करती है, इसे आसानी से समझ सकते हैं। असलियत यह कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों का मालिकाना हक सरकार के पास होता है। सरकार और उद्योगपतियों के बीच का खेल किसी से छुपा हुआ नहीं है। उद्योगपति गैर-जिम्मेदाराना तरीके से काम करते हुए खुद के फायदे का जुगाड़ करते रहते हैं। अपने नुकसान की चिंता की जगह राजनीति करने वाली पार्टियों के लिए चुनावी पैसे का इंतजाम करते रहते हैं और उनकी निजी जेब को भरते रहते हैं। एनर्जी और पॉवर सेक्टर से जुडी कम्पनियों की छानबीन करने से यह सच्चाई साफ तौर पर  उभर कर सामने आ जाती है। नेपथ्य में चुनाव है लेकिन परदे पर यह हंगामा हो रहा है कि जब बैंक लोन नहीं देंगे तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार रूक जाएगी। लेकिन सवाल तो यह भी बनता है कि ये उद्योगपति सरकारी बैंकों से ही क्यों लोन मांग रहे हैं,प्राइवेट से क्यों नहीं लेते? 

सितंबर, 2018 में बैंकों का एनपीए 8 लाख 69 हज़ार करोड़ का हो गया है। जबकि यह एनपीए सितंबर 2017 में 7 लाख 34 हज़ार करोड़ था। यानी जब एनपीए बढ़ रहा है तो यह कैसे कहा जाता है कि आरबीआई द्वारा सरकारी बैंकों पर लगाए गये प्रतिबन्ध से बैंकों के कामकाज में सुधार हुआ है। ऐसे हालत में सरकार बैंकिंग सुधार के लिए इतना पैसा क्यों दे रही है? जबकि आंकड़ें यह कहते हैं कि सरकारी बैंकों ने उद्योगपतियों को जमकर लोन दिया है। तकरीबन 15फीसदी की दर से।

अब तक सात राज्यों में करीब पौने दो लाख करोड़ से अधिक कर्ज़माफ़ी का एलान हो चुका है। लेकिन महाराष्ट्र, यूपी, पंजाब और कर्नाटक में 40 प्रतिशत किसानों का ही लोन माफ हुआ है। दो राज्य बीजेपी के हैं और दो कांग्रेस के।

उत्तर प्रदेश में लघु और सीमांत किसानों के एक लाख तक के कर्ज़ माफ होने थे। अप्रैल 2017 में फैसले का ऐलान हो गया। दावा किया गया था कि 86 लाख किसानों को लाभ होगा। इस पर364 अरब रुपये ख़र्च होंगे। लेकिन 21 महीने बीत जाने के बाद मात्र 44 लाख किसानों की ही कर्ज़ माफी हुई है।

कहने का मतलब यह है कि अर्थव्यवस्था का प्रबंधन ऐसा है कि सरकार रिकैपटिलाइजेशन जैसे सभ्य शब्द गढ़कर पूंजीपतियों को बचाने की कोशिश करती है लेकिन किसानों की कर्ज़ माफ़ी करना सरकार अर्थव्यवस्था को डुबाने जैसा समझती है। किसानों पर जितना बैंकों का बकाया है उससे कहीं ज्यादा बकाया किसानों का सरकार के ऊपर है। सरकार ने राष्ट्रीय किसान आयोग की एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के तहत 2007 की सिफारिशें लागू नहीं कीं। इसका एक मतलब यह भी होता है कि बीते ग्यारह सालों में सरकार ने किसानों को उनके हिस्से के 22लाख करोड़ रुपये नहीं दिये। किसानों पर अभी तमाम तरह के बैंकों का कुल कर्ज़ 14 लाख करोड़ रुपये का है। जाहिर है, सरकार पर किसानों का बकाया इससे कहीं ज्यादा है। फिर भी सरकार किसानों के लिए कर्ज़ मुक्ति का मतलब कर्ज़ माफ़ी समझती है और वोट बैंक हासिल करने के लिए कर्ज़ माफ़ करने की बात करती है लेकिन चुनाव जीतकर आने के बाद एक लाख, दो लाख जैसे सीमा के अंदर कर्ज़ माफ़ करने की बात करती है। और यह बात भी अभी जाकर शुरू हुई है जब सड़क से लेकर मीडिया तक की गलियों में किसान खुद की मौजूदगी बताने के लिए लड़ने लगा है, जबकि उद्योगपतियों के लिए कर्ज़ माफ़ी की बात साल 1986 से चलती आ रही है और हर साल विकास के नाम पर इन्हें दिए गये कर्ज़ को माफ़ किया जाता रहा है।

 इस तरह से हमारे देश की अर्थव्यवस्था का इरादा साफ़ रहता है कि गाँव और किसानी से कोई उम्मीद नहीं है। गाँव और किसानी में जुटे लोग शहरों और उद्योगों की तरफ जायेंगे तभी तथाकथित विकास होगा। और विकास के इस सोच से चलने वाली सरकारें एनपीए जैसी बातों की चिंता नहीं करती केवल इस बात की चिंता करती हैं कि उद्योंगों को कर्जा आसानी से मिले और विकास का छलावा बना रहे। जबकि जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग होती है।

 

 

 

 

 

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