NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अर्थव्यवस्था
रिकैपटिलाइजेशन : बैंकों को नहीं पूंजीपतियों को बचाने की कोशिश!
सरकार रिकैपटिलाइजेशन जैसे सभ्य शब्द गढ़कर पूंजीपतियों को बचाने की कोशिश करती है लेकिन किसानों की कर्ज़ माफ़ी करना सरकार अर्थव्यवस्था को डुबाने जैसा समझती है।
अजय कुमार
24 Dec 2018
बैंक  रिकैपटिलाइजेशन

देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से प्रबंधन का खेल है। प्रबंधन करने वालों के इरादों को समझिये आपको समझ में आ जाएगा कि अर्थव्यवस्था से किसको फायदा होगा और किसको नुकसान। बात यह है कि सरकार ने सरकारी बैंकों की खस्ताहाली के सुधार के लिए संसद से 41 हजार करोड़ रूपये की अर्जी लगा दी है। इस साल के बजट में सरकार ने बैंकिग सुधार के लिए तकरीबन 65 हजार करोड़ का प्रावधान कर दिया था। बैंकिंग की भाषा में इसे बैंकों की खस्ताहाल के सुधार के लिए बैंकों का पुनः पूंजीकरण यानी रिकैपिटलाइजेशन कहा जाता है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पत्रकरों से मुखातिब होते हुए कहा कि प्रांप्ट एंड करेक्टिव उपायों के तहत जिन बैंकों ने बेहतर तरीके से अपना कामकाज किया है,उन बैंकों के सुधार के लिए इस पैसे का इस्तेमाल किया जाएगा।

यहाँ यह समझने वाली बात है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने 11 सरकारी बैंकों को प्रांप्ट करेक्टिव एक्शन की सूची में डाल दिया था। इन सभी से कहा गया था कि वे एनपीए खातों की पहचान करें, लोन को वसूलें, जो लोन न दे उस कंपनी को बेच दें और नया लोन देना बंद कर दें। बैंकों का एनपीए जब खास सीमा से ज़्यादा हो गया तब यह रोक लगाई गई क्योंकि बैंक डूब सकते थे। आरबीआई और सरकार दोनों के बहुत लम्बे समय तक चले विवाद में यह मुद्दा भी मुख्य तौर पर शामिल था। विवाद का समाधान नहीं हुआ। हुआ यह है कि आरबीआई के दो गवर्नर रघुराम राजन और उर्जित पटेल को आरबीआई की आजादी में सरकार द्वारा दखलंदाजी की वजह से इस्तीफ़ा देना पड़ा। हालिया स्थिति ऐसी है कि 11 में कोई भी बैंक इस स्थिति में नहीं पहुंचा है कि उसे आरबीआई द्वारा लगे प्रतिबंधों से मुक्ति मिले। उदहारण के तौर पर इलाहबाद बैंक। इलाहबाद बैंक के एनपीए में पहले के मुकाबले अधिक इजाफा हुआ है लेकिन फिर भी इस बैंक से प्रतिबन्ध हटा लिया गया है। कहने का मतलब यह है कि सरकार अपनी मनमानी कर रह रही है और सरकार इस मुद्दे पर मनमानी क्यों करती है, इसे आसानी से समझ सकते हैं। असलियत यह कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों का मालिकाना हक सरकार के पास होता है। सरकार और उद्योगपतियों के बीच का खेल किसी से छुपा हुआ नहीं है। उद्योगपति गैर-जिम्मेदाराना तरीके से काम करते हुए खुद के फायदे का जुगाड़ करते रहते हैं। अपने नुकसान की चिंता की जगह राजनीति करने वाली पार्टियों के लिए चुनावी पैसे का इंतजाम करते रहते हैं और उनकी निजी जेब को भरते रहते हैं। एनर्जी और पॉवर सेक्टर से जुडी कम्पनियों की छानबीन करने से यह सच्चाई साफ तौर पर  उभर कर सामने आ जाती है। नेपथ्य में चुनाव है लेकिन परदे पर यह हंगामा हो रहा है कि जब बैंक लोन नहीं देंगे तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार रूक जाएगी। लेकिन सवाल तो यह भी बनता है कि ये उद्योगपति सरकारी बैंकों से ही क्यों लोन मांग रहे हैं,प्राइवेट से क्यों नहीं लेते? 

सितंबर, 2018 में बैंकों का एनपीए 8 लाख 69 हज़ार करोड़ का हो गया है। जबकि यह एनपीए सितंबर 2017 में 7 लाख 34 हज़ार करोड़ था। यानी जब एनपीए बढ़ रहा है तो यह कैसे कहा जाता है कि आरबीआई द्वारा सरकारी बैंकों पर लगाए गये प्रतिबन्ध से बैंकों के कामकाज में सुधार हुआ है। ऐसे हालत में सरकार बैंकिंग सुधार के लिए इतना पैसा क्यों दे रही है? जबकि आंकड़ें यह कहते हैं कि सरकारी बैंकों ने उद्योगपतियों को जमकर लोन दिया है। तकरीबन 15फीसदी की दर से।

अब तक सात राज्यों में करीब पौने दो लाख करोड़ से अधिक कर्ज़माफ़ी का एलान हो चुका है। लेकिन महाराष्ट्र, यूपी, पंजाब और कर्नाटक में 40 प्रतिशत किसानों का ही लोन माफ हुआ है। दो राज्य बीजेपी के हैं और दो कांग्रेस के।

उत्तर प्रदेश में लघु और सीमांत किसानों के एक लाख तक के कर्ज़ माफ होने थे। अप्रैल 2017 में फैसले का ऐलान हो गया। दावा किया गया था कि 86 लाख किसानों को लाभ होगा। इस पर364 अरब रुपये ख़र्च होंगे। लेकिन 21 महीने बीत जाने के बाद मात्र 44 लाख किसानों की ही कर्ज़ माफी हुई है।

कहने का मतलब यह है कि अर्थव्यवस्था का प्रबंधन ऐसा है कि सरकार रिकैपटिलाइजेशन जैसे सभ्य शब्द गढ़कर पूंजीपतियों को बचाने की कोशिश करती है लेकिन किसानों की कर्ज़ माफ़ी करना सरकार अर्थव्यवस्था को डुबाने जैसा समझती है। किसानों पर जितना बैंकों का बकाया है उससे कहीं ज्यादा बकाया किसानों का सरकार के ऊपर है। सरकार ने राष्ट्रीय किसान आयोग की एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के तहत 2007 की सिफारिशें लागू नहीं कीं। इसका एक मतलब यह भी होता है कि बीते ग्यारह सालों में सरकार ने किसानों को उनके हिस्से के 22लाख करोड़ रुपये नहीं दिये। किसानों पर अभी तमाम तरह के बैंकों का कुल कर्ज़ 14 लाख करोड़ रुपये का है। जाहिर है, सरकार पर किसानों का बकाया इससे कहीं ज्यादा है। फिर भी सरकार किसानों के लिए कर्ज़ मुक्ति का मतलब कर्ज़ माफ़ी समझती है और वोट बैंक हासिल करने के लिए कर्ज़ माफ़ करने की बात करती है लेकिन चुनाव जीतकर आने के बाद एक लाख, दो लाख जैसे सीमा के अंदर कर्ज़ माफ़ करने की बात करती है। और यह बात भी अभी जाकर शुरू हुई है जब सड़क से लेकर मीडिया तक की गलियों में किसान खुद की मौजूदगी बताने के लिए लड़ने लगा है, जबकि उद्योगपतियों के लिए कर्ज़ माफ़ी की बात साल 1986 से चलती आ रही है और हर साल विकास के नाम पर इन्हें दिए गये कर्ज़ को माफ़ किया जाता रहा है।

 इस तरह से हमारे देश की अर्थव्यवस्था का इरादा साफ़ रहता है कि गाँव और किसानी से कोई उम्मीद नहीं है। गाँव और किसानी में जुटे लोग शहरों और उद्योगों की तरफ जायेंगे तभी तथाकथित विकास होगा। और विकास के इस सोच से चलने वाली सरकारें एनपीए जैसी बातों की चिंता नहीं करती केवल इस बात की चिंता करती हैं कि उद्योंगों को कर्जा आसानी से मिले और विकास का छलावा बना रहे। जबकि जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग होती है।

 

 

 

 

 

BANK RECAPITALISATION
Arun Jatley
prompt and corrective measure
PSU
power sector and rbi
RBI
rbi and government tussle

Related Stories

लंबे समय के बाद RBI द्वारा की गई रेपो रेट में बढ़ोतरी का क्या मतलब है?

आम आदमी जाए तो कहाँ जाए!

रिपोर्टर्स कलेक्टिव का खुलासा: कैसे उद्योगपतियों के फ़ायदे के लिए RBI के काम में हस्तक्षेप करती रही सरकार, बढ़ती गई महंगाई 

आज़ादी के बाद पहली बार RBI पर लगा दूसरे देशों को फायदा पहुंचाने का आरोप: रिपोर्टर्स कलेक्टिव

केरल: एचएलएल के निजीकरण के ख़िलाफ़ युवाओं की रैली

RBI कंज्यूमर कॉन्फिडेंस सर्वे: अर्थव्यवस्था से टूटता उपभोक्ताओं का भरोसा

नोटबंदी: पांच साल में इस 'मास्टर स्ट्रोक’ ने अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया

तबाही मचाने वाली नोटबंदी के पांच साल बाद भी परेशान है जनता

नोटबंदी की मार

तत्काल क़र्ज़ मुहैया कराने वाले ऐप्स के जाल में फ़ंसते नौजवान, छोटे शहर और गाँव बने टार्गेट


बाकी खबरें

  • kisan
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसानों ने देश को संघर्ष करना सिखाया - अशोक धवले
    25 Dec 2021
    किसान आंदोलन ने इस देश के मजदूरों और किसानों को नई हिम्मत दी है। ऑल इंडिया किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक धवले ने न्यूज़क्लिक के साथ ख़ास बातचीत में कहा कि आंदोलन के कामयाब होने की बुनियादी शर्त…
  • yogi
    अजय कुमार
    योगी सरकार का काम सांप्रदायिकता का ज़हर फैलाना है या नौजवानों को बेरोज़गार रखना?
    25 Dec 2021
    उत्तर प्रदेश का चुनावी माहौल हिंदू-मुस्लिम धार पर बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है। तो आइए इस नफ़रत के माहौल को काटते हुए उत्तर प्रदेश की बेरोज़गारी पर बात करते हैं।
  • manipur
    शशि शेखर
    मणिपुर : ड्रग्स का कनेक्शन, भाजपा और इलेक्शन
    25 Dec 2021
    मणिपुर में ड्रग कार्टेल और भाजपा नेताओं की उसमे संलिप्तता की कई खबरें आ चुकी हैं। टेररिस्ट संगठन से लिंक के आरोपी, थोनाजाम श्याम कुमार सिंह, 2017 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं। विधायकी की…
  • up
    सत्येन्द्र सार्थक
    यूपी चुनाव 2022: पूर्वांचल में इस बार नहीं हैं 2017 वाले हालात
    25 Dec 2021
    पूर्वांचल ख़ासकर गोरखपुर में सभी प्रमुख पार्टियां अपनी जीत का दावा कर रही हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में गोरखपुर ज़िले की 9 सीटों में से 8 पर भाजपा ने जीत हासिल की थी, लेकिन जानकारों का मानना है कि…
  • bhasha singh
    भाषा सिंह
    बात बोलेगी : दरअसल, वे गृह युद्ध में झोंकना चाहते हैं देश को
    24 Dec 2021
    हरिद्वार में 17 से 19 दिसंबर 2021 तक चली बैठक को धर्म संसद का नाम देने वाले वे सारे उन्मादी मारने-काटने की बात करने वाले, ख़ुद को स्वामी और साध्वी कहलाने वाले शख़्स दरअसल समाज को उग्र हिंदु राष्ट्र के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License