NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मध्य प्रदेश में एक अराजनीतिक हुड़दंग
पुलिस और प्रशासन के साथ आम लोग भी अपमानित हुये हैं।
वीरेन्द्र जैन
17 Jun 2017
मध्य प्रदेश में एक अराजनीतिक हुड़दंग
मध्य प्रदेश में जून माह की प्रारम्भ से ही एक अलग तरह का हिंसक उत्पात देखने को मिल रहा है, जिसमें अब तक सात किसानों की दुखद मौत हो चुकी है सैकड़ों नागरिक घायल हैं व करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो चुकी है। पुलिस और प्रशासन के साथ आम लोग भी अपमानित हुये हैं। इस उत्पात को राजनीतिक दल और प्रैस किसान आन्दोलन का नाम देकर एक आकार देने की कोशिश कर रहे हैं, किंतु सच तो यह है कि यह हमारी राजनीतिक प्रणाली की कमियों और राजनीतिक दलों के नाम पर काम कर रहे गिरोहों के गैरजिम्मेवाराना व्यवहार का प्रतिफल है। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश उस गोबरपट्टी या बीमारू राज्यों में से एक है जहाँ राजनीतिक चेतना न्यूनतम है और सामंती मूल्यों के आधार पर सरकारें बनती बिगड़ती रहती हैं। यहाँ गरीबी और पिछड़ापन इतना अधिक है कि अज्ञानतावश इनके उन्मूलन के लिए प्रारम्भ की गई सशक्तीकरण योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाती हैं।
 
राजनीतिक दलों की संगठन प्रणालियों को निकट से देखने पर पता चलता है कि किसानों का संगठन बनाना सबसे कठिन काम होता है। मजदूर किसी भी फैक्ट्री आदि में एक साथ एकत्रित होते हैं और उनके वेतन आदि की समस्याएं भी एक जैसी होती हैं इसलिए उनका संगठन बनना सरल होता है। यही हाल छात्रों के संगठन का भी होता है, किंतु किसानों को किसान के रूप में एक साथ एकत्रित होने के अवसर कम ही आते हैं। उनके बीच संचार के साधन पहले ही कम थे और अब भी मोबाइल इंटरनेट जैसे साधन भी शिक्षा की कमी के कारण किसानों तक उस अनुपात में नहीं पहुँच सके हैं जिस अनुपात में अन्य वर्गों तक पहुँच गये हैं। वे अखबार कम पढ पाते हैं, बिजली की अनुपस्थिति के कारण टीवी भी नहीं देखते, जहाँ टीवी होता भी है, और बिजली आती है, वहाँ भी टीवी के मनोरंजन कार्यक्रमों को अधिक प्राथमिकता मिलती है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्र में जातिवादी संगठन अपेक्षाकृत अधिक आसानी से बन जाते हैं। जहाँ किसान संगठन बने भी हैं वे भी जातिवाद से प्रारम्भ हुये हैं। चरण सिंह, और महेन्द्र सिंह टिकैत ने किसान संगठनों के नाम पर जाटों को एकत्रित कर लिया था। इसी तरह मध्य प्रदेश में पटेल या पाटीदारों सहित दूसरी जातियों के संगठनों को चुनावी सुविधा के लिए किसान संगठनो का नाम दे दिया गया था। कभी कभी जब गन्ना उत्पादकों को गन्ना का रेट नहीं मिलता तो गन्ना उत्पादक किसानों के नाम पर आन्दोलन रत हो जाते और इसी तरह प्याज, आलू, टमाटर, संतरा, सोयाबीन या दूसरी जिंस विशेष फसलों के उत्पादक तात्कालिक रूप से एकत्रित होते रहे हैं। कभी कभी सूखा या अतिवृष्टि के कारण भी लोग मांग अनुसार एकत्रित हो जाते हैं। पिछले वर्षों में देश भर में लाखों किसानों की आत्महत्या के बाबजूद भी कोई राष्ट्र या प्रदेश व्यापी आन्दोलन खड़ा नहीं हुआ और समाज ने सरकारों में बैठे नेताओं के उन बयानों को स्वीकार सा कर लिया कि उनकी आत्महत्या के कारण व्यक्तिगत थे। देश के कृषिमंत्री ने तो यहाँ तक कहने में संकोच नहीं किया था कि किसान प्रेम प्रसंगों के कारण आत्महत्या कर रहे हैं।
 
गत लोकसभा चुनावों के दौरान और हाल के विधानसभा चुनावों के दौरान बिना दूरगामी सोच के विभिन्न तरह के वादे किसानों से किये गये थे जो पूरे नहीं किये गये किंतु हाल ही में उत्तर प्रदेश के चुनावों में कर्जमाफी का जो वादा किया गया था उसे नई व्याख्याओं के साथ काट छाँट कर घोषित कर दिया गया और पूरा करने के लिए संसाधन जुटाने की योजनाएं बनायी जा रही हैं। भाजपा पर हमेशा दबाव बना कर रखने वाली शिवसेना ने चुनावी वादों और यथार्थ के द्वन्द को पकड़ा और सवाल खड़ा किया कि यदि उत्तर प्रदेश के किसानों की कर्जमाफी की जा सकती है, तो सबसे अधिक आत्महत्याओं के लिए विवश महाराष्ट्र के किसान तो कर्जमाफी के अधिक सुपात्र हैं। भाजपा के रक्षात्मक होने से परोक्ष में सन्देश यह गया कि सरकार पर दबाव बनाने से ही अधिकार या सुविधाएं पायी जा सकती हैं। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश से पहले महाराष्ट्र के कुछ जिलों में आन्दोलन प्रारम्भ हुआ जिसका प्रभाव बढते ही बाहुबली शिवसेना उसमें कूद पड़ी। दूसरी ओर भाजपा परिवार की ओर से गाय के नाम पर किसी की भी हत्या कर देने वालों का परोक्ष बचाव तथा पशु बिक्री कानून जैसे अव्यवहारिक अनावश्यक नियमों के बनाने से भी असहमत शिवसेना को और आक्रामक होने का अवसर मिला।
 
मध्यप्रदेश में आन्दोलन प्रारम्भ होने से पहले मालवा क्षेत्र में कुछ बड़े बड़े अफीम तस्कर पकड़े गये थे। स्मरणीय है कि तस्करी, हवाला, सट्टा आदि ऐसे अपराध हैं जो सरकारी नेताओं के सहयोग से ही सम्भव हो पाते हैं और इन अपराधों को जब भी पकड़ा जाता है तब सत्ता के अन्दर चल रहे आपसी द्वन्द का पता चलता है। उल्लेखनीय है कि किसान आन्दोलन के नाम की सारी हिंसा मालवा क्षेत्र में ही प्रारम्भ  हुयी है जहाँ अपेक्षाकृत अधिक सम्पन्न किसान हैं और जिनके अहं की लड़ाई उनकी रोजी की लड़ाई से अधिक तेज हो जाती है। पिछले दिनों गुजरात में पाटीदारों के आन्दोलन में हुयी हिंसा के पीछे भी आरक्षण से अधिक अहं था। दूसरी ओर मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड में किसानों की गरीबी और समस्याएं अधिक हैं किंतु वे व्यवस्था के खिलाफ कभी आक्रामक होने का साहस नहीं जुटा पाते।
 
म.प्र. भाजपा में आपसी गुटबाजी चरम पर है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी चुनावी सफलताओं के प्रभाव में पार्टी पर दबाव बना कर अनेक ऐसे नेताओं को प्रदेश से बाहर करा दिया जो उनके लिए खतरा पैदा कर सकते थे। उल्लेखनीय है कि सुश्री उमा भारती, नरेन्द्र सिंह तोमर, अनूप मिश्रा, प्रभात झा, कैलाश विजयवर्गीय, अरविन्द मेनन, कमल पटेल, बाबूलाल गौर आदि शिवराज की आँख की किरकिरी थे जिन्हें दूर कर दिया गया। इनके हितों को नुकसान पहुँचा है और ये सब किसी न किसी तरह शिवराज से बदला लेना चाहते हैं। इसके विपरीत पार्टी अध्यक्ष नन्द किशोर चौहान उनके अमित शाह हैं। इस गुटबाजी को भी इस हिंसा की पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है।
काँग्रेस का नामपट उठाये नेता प्रदेश में कोई आन्दोलन खड़ा नहीं कर सकते। पार्टी में कार्यकर्ता के नाम पर नेताओं के व्यक्तिगत जयजयकारी भर हैं, काँग्रेस के लिए काम करने वाला कोई नहीं है। वे हिंसक तो क्या अहिंसक आन्दोलन या धरना प्रदर्शन भी नहीं कर सकते। काँग्रेस या किसी भी दूसरे दल पर हिंसा का आरोप लगाना सच्चाई से आँखें मूंद लेना है, क्योंकि वे चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकते।
सच्चाई यह है कि सरकार सब कुछ जानती है किंतु कह नहीं सकती। कोई नेता सामने नहीं है जिससे समझौता किया जा सके, कोई मांगपत्र सामने नहीं है जिस को पूरा किया जा सके। पुलिस दमन का परिणाम हिंसा को और बढावा देना है, इसलिए समस्या को स्वतः ठंडी होने की नीति अपनायी जा रही है, इसमें जो नुकसान हो सकता है, वह होगा। सिद्धांतहीन, नेतृत्वहीन इस घटनाक्रम से कुछ भी नहीं बदलेगा।  
भाजपा
किसान विरोधी
शिवराज सिंह चौहान

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी

क्या भाजपा शासित असम में भारतीय नागरिकों से छीनी जा रही है उनकी नागरिकता?

बिहार: सामूहिक बलत्कार के मामले में पुलिस के रैवये पर गंभीर सवाल उठे!


बाकी खबरें

  • उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा : क्या रहे जनता के मुद्दे?
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा : क्या रहे जनता के मुद्दे?
    09 Mar 2022
    उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा के चुनाव की चर्चा भले ही मीडिया में कम हुई हो, मगर चुनावी नतीजों का बड़ा असर यहाँ की जनता पर पड़ेगा।
  • Newschakra
    न्यूज़क्लिक टीम
    Akhilesh Yadav का बड़ा आरोप ! BJP लोकतंत्र की चोरी कर रही है!
    09 Mar 2022
    न्यूज़चक्र के आज के एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार Abhisar Sharma बात कर रहे हैं चुनाव नतीजे के ठीक पहले Akhilesh Yadav द्वारा की गयी प्रेस कांफ्रेंस की।
  • विजय विनीत
    EVM मामले में वाराणसी के एडीएम नलिनीकांत सिंह सस्पेंड, 300 सपा कार्यकर्ताओं पर भी एफ़आईआर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की मतगणना से पहले राज्य कई स्थानों पर ईवीएम को लेकर हुए हंगामे के बाद चुनाव आयोग ने वाराणसी के अपर जिलाधिकारी (आपूर्ति) नलिनी कांत सिंह को सस्पेंड कर दिया। इससे पहले बना
  • बिहार विधानसभा में महिला सदस्यों ने आरक्षण देने की मांग की
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार विधानसभा में महिला सदस्यों ने आरक्षण देने की मांग की
    09 Mar 2022
    मौजूदा 17वीं विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 26 है। 2020 के चुनाव में 243 सीटों पर महज 26 महिलाएं जीतीं यानी सदन में महिलाओं का प्रतिशत महज 9.34 है।
  • सोनिया यादव
    उत्तराखंड : हिमालयन इंस्टीट्यूट के सैकड़ों मेडिकल छात्रों का भविष्य संकट में
    09 Mar 2022
    संस्थान ने एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे चौथे वर्ष के छात्रों से फ़ाइनल परीक्षा के ठीक पहले लाखों रुपये की फ़ीस जमा करने को कहा है, जिसके चलते इन छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License