NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मोदी के डिजिटल इंडिया का वर्तमान सच
संकेत ठाकुर, सौजन्य: संघर्ष संवाद
17 Jul 2015

मध्यप्रदेश की 5.23 करोड़ की आबादी में हर पांचवें व्यक्ति तक ही मोबाइल फोन पहुंचा है, जबकि राज्य के चार बड़े शहरों में संचार के सबसे लोकप्रिय साधन की संख्या कुल आबादी से ज्यादा है। मोबाइल फोन अब विकास के निर्धारित मानकों में से एक बन चुका है। भारत में लगभग 95 करोड़ मोबाइल उपयोगकर्ताओं में ग्रामीण उपयोगकर्ता केवल 42 प्रतिषत ही हैं। वहीं मध्यप्रदेष में यह पहुंच राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम है। वैसे शहरों के ठीक उलट गांवों में बेसिक टेलीफोन की उपलब्धता भी महज पांच फीसदी से कुछ अधिक है। यानी गांवों में संपर्क के लिए मोबाइल के सिवा दूसरे विकल्प न के बराबर हैं।

मोबाइल फोन की पहुंच के मामले में शहरों और गांव के बीच फासले का एक प्रमुख कारण गांवों में कनेक्टिविटी का न होना है। दूरदराज के आदिवासी अंचलों में कस्बे से बाहर निकलते ही मोबाइल फोन का कवरेज चला जाता है। डिंडोरी के समनापुर जनपद से 50 किलोमीटर दूर शौलाटोला में लोग गांव से कुछ दूर लगे पेड़ के नीचे खड़े होकर मोबाइल पर बात करने की कोषिश करते हैं। नेटवर्क मिला तो ठीक, वरना उन्हें तीन किलोमीटर दूर पहाड़ चढ़ना पडता है। इक्कीसवीं सदी की संचार क्रांति के दौर में यह बात हास्यास्पद लग सकती है, लेकिन कुछ कंपनियों के मोबाइल नेटवर्क महानगरीय उपयोगकर्ताओं को भी इसी तरह की मशक्कत करने पर मजबूर कर देते हैं। मुंबई में रहने वाले मेरे एक मित्र अक्सर खिड़की से लटककर मुझे फोन किया करते थे। एक दिन गिरते-गिरते बचे तो कंपनी ही बदल ली। अनेक आदिवासी गांवों की स्थिति शौलाटोला से भी बद्तर है।

                                                                                                                                

डिंडोरी से पश्चिम की ओर चलें तो बुंदेलखंड में पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन में बसे गांव कटरिया में लोगों ने कनेक्टिविटी के लिए गांव के बाहर एक चबूतरे का सहारा लिया है। हैरत की बात यह है कि समूचे गांव में मोबाइल फोन का नेटवर्क न होने के बावजूद चबूतरे पर 3जी कनेक्टिविटी तक मिल जाती है। टाइगर रिजर्व के बफर जोन में होने के कारण वन विभाग वहां  बिजली के खम्बे लगाने की इजाजत नहीं दे रहा है। वन ग्राम होने के कारण ही मोबाइल टॉवर खड़ा करने में भी परेषानी है। कटरिया गांव के लोगों के पुनर्वास और उनकी हकदारियों की गारंटी लेने को कोई तैयार नहीं। हम यहां इस बात को नहीं भूल सकते कि एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन, जीवनयापन के साधन और संसाधनों के साथ ही अभिव्यक्ति की आजादी पर भी कटरिया के लोगों का उतना ही हक है, जितना शहरी लोगों का।

कनेक्टिविटी राज्य सरकार का नहीं केंद्र का विषय है जिसके पास दूरसंचार और ट्राई (दूरसंचार नियामक प्राधिकरण) जैसी भारी-भरकम ढांचागत संरचनाएं हैं। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि गांवों में खराब कनेक्टिविटी के कारण म.प्र. की 5.2 करोड की आबादी में से अधिकांश के पास न तो सरकार की  बात ही पहुंच पा रही है और न ही उनकी आवाज सरकार तक पहुंच रही है। वैसे बीते 10 साल में केंद्र सरकार को स्पेक्ट्रम और लाइसेंस फीस के रूप में अरबों की आमदनी तो हुई, लेकिन उपयोगकर्ताओं को जरूरत के हिसाब से ढांचागत सुविधाएं नहीं मिलीं। एरिक्सन कंज्यूमर लैब की हालिया रिपोर्ट कहती है कि भारत में 60 फीसदी से ज्यादा लोगों को मोबाइल नेटवर्क न मिलने की समस्या पेष आ रही है। इनमें भी अधिकांश लोगों को घरों के भीतर कनेक्टिविटी न मिलने की शिकायत है। इसका मतलब यह है कि सरकार के स्पेक्ट्रम प्रबंधन में बड़ी खामियां हैं। साथ ही यह भी साफ नहीं है कि दूरसंचार कंपनियां अपने पास मौजूद स्पेक्ट्रम का कितनी कुषलता से उपयोग कर रही हैं। म.प्र. के डिंडोरी, बालाघाट, बुंदेलखंड, छिंदवाड़ा जैसे जिलों में मोबाइल टॉवरों के बीच की दूरी 30 से 50 किलोमीटर है। भारत में दूरसंचार घनत्व तेजी से संतृप्तता के स्तर पर आ रहा है। यहां से आगे का रास्ता गांव की ओर निकलता है, जहां पैर पसारने की काफी गुंजाइष है।

वहीं दूसरी ओर दूरसंचार कंपनियों का सारा जोर शहरों पर केंद्रित है, जहां मोबाइल कॉल और इंटरनेट के रूप में मोटी कमाई की खासी संभावनाएं मौजूद हैं। ट्राई और इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएषन ऑफ इंडिया (आईएमएआई) की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेष में 6 करोड़ मोबाइलधारकों में तकरीबन हर तीसरा शख्स स्मार्टफोन चला रहा है। इनमें से अधिकांश इंटरनेट भी चलाते होंगे। हालांकि, एरिक्सन की रिपोर्ट में 63 प्रतिषत उपयोगकर्ताओं ने कहा है कि उन्हें 3जी के शुल्क पर 2जी सेवाएं मिल पा रही हैं। गांवों की बात छोड़ दें तो शहरों में भी इंटरनेट की रफ्तार एक समान नहीं है। कम से कम उतनी तो बिल्कुल नहीं, जितना कि सेवा प्रदाता दावा करती हैं। दूसरी तरफ ट्राई के पास भी इन दावों को परखने का कोई पुख्ता तंत्र नहीं है। जब तक कोई षिकायत न करे, तब तक न तो ट्राई को पता चलेगा और न ही टेलीकॉम कंपनियों को जमीनी हकीकत मालूम पड़ेगी।

केंद्र सरकार ने डिजिटल इंडिया मिशन के तहत ढाई लाख पंचायतों को ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्षन से जोड़ने का लक्ष्य रखा है। बीते चार साल से नेशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क (एनओएफएन) के तहत तार बिछाने का काम चल रहा है। इस साल मार्च तक इसके तहत 50 हजार पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा जाना था, लेकिन अभी तक यह काम हो नहीं पाया है। ऐसे में दिसंबर 2016 तक इसके पूरा होने की उम्मीद कम ही है। इसका खामियाजा मध्यप्रदेश के दूर-दराज के आदिवासी अंचलों को ज्यादा भुगतना पड़ रहा है, जहां जनपद से पंचायतों की औसत दूरी 30 किलोमीटर से ज्यादा है। डिंडोरी के तहसील कार्यालय में पंचायत पदाधिकारी देर रात तक जानकारियां फीड करते हुए देखे जा सकते हैं, क्योंकि उनके गांवों में कनेक्टिविटी नहीं है। खुद समनापुर जनपद का लोकसेवा केंद्र आए दिन फाइबर लाइन कटने से हलाकान है। इस सूरतेहाल के पीछे अकेला कोई एक विभाग जिम्मेदार नहीं है। यह विभागीय समन्वय का मसला है। मिसाल के लिए पन्ना के जरधोबा पंचायत पदाधिकारियों को लैपटॉप तो दिए गए, लेकिन कनेक्टिविटी नहीं होने से वे रोजमर्रा के काम की जानकारियां कंप्यूटर पर दर्ज करने के लिए जनपद ही आते हैं।

इन हालात में देश के दूरसंचार मंत्री का यह बयान और भी दिलचस्प हो जाता है, जिसमें वे भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अगले दो साल में मौजूदा 30 करोड़ से बढ़ाकर 50 करोड़ के पार ले जाने का दावा करते हैं। हालांकि, इस आंकड़े को छूने के लिए सरकार को खास मशक्कत नहीं करनी है, क्योंकि स्मार्टफोन उपयोग करने वालों की संख्या 35 फीसदी से अधिक गति से बढ़ रही है। असली चुनौती तो दूर-दराज के अंचलों तक इंटरनेट को पहुंचाने की है, जिसे दुरुस्त करने का सरकार के पास कोई पुख्ता रोडमैप अभी तक तैयार नहीं है। 

 

सौजन्य: संघर्ष संवाद

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।

डिजिटल इंडिया
भाजपा
नरेन्द्र मोदी
अम्बानी

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों 10 सितम्बर को भारत बंद

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी

क्या भाजपा शासित असम में भारतीय नागरिकों से छीनी जा रही है उनकी नागरिकता?


बाकी खबरें

  • book
    शिरीष खरे
    तरक़्क़ीपसंद तहरीक की रहगुज़र :  भारत में प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन का दस्तावेज़
    13 Nov 2021
    ज़ाहिद ख़ान की हालिया किताब की समीक्षा और उसके बारे में कुछ अहम बातें।
  • peasant movement
    लाल बहादुर सिंह
    विचार: पूर्व के आंदोलनों से किस तरह अलग और विशिष्ट है किसान आंदोलन
    13 Nov 2021
    कुछ राजनैतिक विश्लेषकों ने भी यह सवाल उठाया है कि किसान आंदोलन का वैचारिक राजनैतिक अवदान अतीत के दूसरे महत्वपूर्ण आंदोलनों जैसा नहीं है। इसी की पड़ताल कर रहे हैं वरिष्ठ लेखक और एक्टिविस्ट लाल बहादुर…
  • DAP Shortage a Symptom of Larger Food Planning Crisis
    इंद्र शेखर सिंह
    डीएपी की कमी बड़े खाद्य संकट का लक्षण है
    13 Nov 2021
    तिलहन और सरसों के दाम पहले से ही ऊंचे चल रहे हैं। दामों के और अधिक बढ़ने से खाना पकाने की सभी वस्तुएं कई घरों की पहुंच से बाहर हो जाएंगी।
  • Zakia Jafri
    संचिता कदम
    एसआईटी  ने सिर्फ़ 'काम' किया, तहक़ीक़ात नहीं की: ज़किया जाफ़री एसएलपी में कपिल सिब्बल
    13 Nov 2021
    एसआईटी न सिर्फ़ पुलिस अधिकारियों के अहम रिकॉर्ड छिपाने जैसे पहलुओं पर ग़ौर करने में नाकाम रही, बल्कि उसने आरोपियों के बयानों की 'सच्चाई का पता लगाये बिना' उनके बयानों को आसानी से स्वीकार कर लिया।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 11,850 नए मामले, 555 मरीज़ों की मौत
    13 Nov 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.40 फ़ीसदी यानी 1 लाख 36 हज़ार 308 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License