NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मूडीज़ रेटिंग से बेबस बजट
वर्ष 2018-19 का केंद्रीय बजट इस साल 1 फरवरी को संसद में पेश किया गया। ये बजट अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले का अंतिम पूर्ण बजट है।
सुरजीत दास
08 Feb 2018
budget

मूडीज रेटिंग से बेबस बजट

वर्ष 2018-19 का केंद्रीय बजट इस साल 1 फरवरी को संसद में पेश किया गया। ये बजट अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले का अंतिम पूर्ण बजट है।

वर्ष 2018-19 का केंद्रीय बजट इस साल 1 फरवरी को संसद में पेश किया गया। ये बजट अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले का अंतिम पूर्ण बजट है। पेश किए गए बजट में दो बड़ी योजनाओं की घोषणा की गई। पहला स्वास्थ्य बीमाा जबकि दूसरा कृषि फसल के लिए मूल्य बीमा है। स्वास्थ्य बीमा के बारे में बताया गया कि ये देश की क़रीब 40 प्रतिशत आबादी को कवर करेगा वहीं फसल से संबंधित बीमा 50 प्रतिशत आबादी को लाभ पहुंचाएगा जो आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं। प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर प्रभात पटनायक ने इस बजट को "पैसे के बिना शानदार योजना" बताया“Fantabulous schemes with not a paisa earmarked”(www.thecitizen.in, 3rd February)। वास्तव में सरकार ने इतने बड़े स्वास्थ्य बीमा योजना के प्रीमियम का भुगतान करने के लिए कोई अतिरिक्त पैसा आवंटित नहीं किया है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह 10 करोड़ परिवारों को प्रति वर्ष 5 लाख तक कवर करेगा। कृषि क्षेत्र के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर अशोक गुलाटी ने कहा, "सरकार का दावा है कि उसने किसानों को इनपुट लागत का 50 प्रतिशत से ज़्यादा समर्थन मूल्य दिया है तो ये महज चालाकी है" (www.indianexpress.com, 6 फरवरी)। और अगर सरकार एमएसपी पर कुल इनपुट लागत का 150% निर्धारित करती है - जिसमें परिवार श्रम की लागत, स्वामित्व वाली भूमि का ख़र्च और खुद की पूंजी (यानी C2 और न कि A2) पर ब्याज है, तो बजट में इसके लिए पर्याप्त आवंटन होना चाहिए। पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए सरकार का यह सिर्फ दिखावटी प्रेम है (www.indianexpress.com)। वास्तव में जीडीपी के अनुपात के अनुसार स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 2017 -18 (संशोधित अनुमान, आरई) बजट की तुलना में 2018-19 बजट (बजट अनुमान, बीई) में आवंटन कम कर दिया गया है। ये आवंटन 0.32% से घटाकर 0.22% तक कर दिया गया। इसी तरह, शिक्षा पर बजट खर्च 0.49% से 0.45% तक कम हो जाएगा।

केन्द्रीय सरकार की कुल राजस्व प्राप्ति 2017-18 (आरई) में सकल घरेलू उत्पाद का 8.97% है और 2018-19 (बीई) में 9.22% होने की उम्मीद है। जबकि 2017-18 (आरई) में 13.2% की तुलना में 2018-19 (बीई) में केंद्र सरकार के व्यय का 13% होने का अनुमान लगाया गया है। नतीजतन, अनुमानित राजकोषीय घाटा वास्तव में 2017-18 (आरई) में 3.5% से 2018-19 (बीई) में 3.3% तक घट रही है।

अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में व्यर्थ क्षमता के साथ साथ कौशल स्तर पर बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी क़ायम है। अगर बजट में पर्याप्त अतिरिक्त आवंटन है तो ये दो योजनाएं जीडीपी का कम से कम2% तक कुल सरकारी व्यय बढ़ाएगा (अर्थात 3 लाख करोड़ रुपए से अधिक)।

ग़रीब वर्गों के लिए निजी बीमा आधारित स्वास्थ्य सेवा के मॉडल की कार्यक्षमता के बारे में लोगों को आशंका हो सकती है। सभी राज्यों में उत्पादन की वास्तविक लागत की तुलना में 50% अधिक दर पर सभी फ़सलों के लिए एमएसपी तय करने की क्षमता को लेकर उन्हें भी संदेह हो सकता है।

हालांकि वित्त मंत्री ने उच्च राजकोषीय घाटे (जीडीपी के अनुपात का) के डर से इन दो योजनाओं के लिए कोई अतिरिक्त राशि नहीं दिया। निवेश के गंतव्य के रूप में भारत को अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी द्वारा प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। यह अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को खुश करने तथा घरेलू प्राथमिकताओं के अनुसार आर्थिक नीति निर्माण के बीच समझौताकारी समन्यवय जैसा लगता है। यही कारण है कि मेरे विचार में बड़ी योजना होने के बावजूद ये बजट मूडी की रेटिंग से बेबस हो गया - योजनाओं को पूरा करने के लिए राशि बजट में आवंटित नहीं किया जा सका।

दिलचस्प बात यह है कि 'मूडीज इनवेस्टर्स सर्विस' ने पिछले साल नवंबर (17 नवंबर, 2017) में अंतरराष्ट्रीय वित्त पूंजी के दृष्टिकोण से भारत की रेटिंग को एक निवेश गंतव्य के रूप में थोड़ा (बीएए 3 से बीएए 2) अपग्रेड किया था, और 'स्थिर' से 'सकारात्मक' दृष्टिकोण में बदला था। हालांकि मूडी ने चेतावनी दी कि भारत की रेटिंग को कम की जा सकती है यदि राजकोषीय मीट्रिक और सामान्य सरकार राजकोषीय समेकन की संभावना का ह्रास होता है। और बजट के बाद मूडी के विश्लेषक ने बताया कि भारत का 2018-19 बजट सरकार के राजकोषीय समेकन पथ के अनुरूप है, और कहा कि देश के लिए क्रेडिट रेटिंग एजेंसी की हालिया रेटिंग उन्नयन को मजबूत किया। इसलिए, न केवल इस साल के बजट का परिमाण बल्कि अंतरराष्ट्रीय वित्त पूंजी की इच्छा के अनुसार पिछले सभी बजट राजकोषीय रूढ़िवाद से बाधित हो रहे हैं।

राजकोषीय उत्तरदायित्व तथा बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम के अधिनियमन और अधिक गहन परिशोधन के साथ इसकी समीक्षा समिति की रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को खुश करने के लिए है। मांग संबंधी विवश स्थिति के तहत बड़े पैमाने पर रोज़गार के अवसरों का श्रृजन करने के लिए कीनेसियन विस्तारित राजकोषीय नीति के लिए स्थान को मूडी की रेटिंग्स द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया। भारत में आज निवेश पर रिटर्न की अपेक्षित दर अपेक्षाकृत कम हो गई है, व्यापार का भरोसा अपेक्षाकृत कम है, निवेश की दर गिर रही है, गैर-खाद्य,ऋण खरीदारी नहीं बढ़ रही है, गैर-निष्पादित संपत्ति वाणिज्यिक बैंकों में जमा हो रही है और नौकरी केअवसर ख़त्म हो रहे हैं। लेकिन, फिर भी हमें सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के रूप में पूंजीगत व्यय को कम करना पड़ा और अंतरराष्ट्रीय वित्त पूंजी के मालिकों की नज़रों में डाउनग्रेड होने के कथित डर के कारण विस्तारित बजट के बारे में सोचा भी नहीं। इस देश में सरकारी नीति निर्माण के लिए राजकोषीय स्थान आखिरकार अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों द्वारा बाधित किया जा रहा है।

union budget
Arun Jatley
Modi care
Union Budget 2018
Moody rating

Related Stories

कन्क्लूसिव लैंड टाईटलिंग की भारत सरकार की बड़ी छलांग

ग्रामीण संकट को देखते हुए भारतीय कॉरपोरेट का मनरेगा में भारी धन आवंटन का आह्वान 

केंद्रीय बजट 2022-23 में पूंजीगत खर्च बढ़ाने के पीछे का सच

विशेषज्ञों के हिसाब से मनरेगा के लिए बजट का आवंटन पर्याप्त नहीं

अंतर्राष्ट्रीय वित्त और 2022-23 के केंद्रीय बजट का संकुचनकारी समष्टि अर्थशास्त्र

तिरछी नज़र: बजट इस साल का; बात पच्चीस साल की

क्या बजट में पूंजीगत खर्चा बढ़ने से बेरोज़गारी दूर हो जाएगी?

केंद्रीय बजट में दलित-आदिवासी के लिए प्रत्यक्ष लाभ कम, दिखावा अधिक

केंद्रीय बजट: SDG लक्ष्यों में पिछड़ने के बावजूद वंचित समुदायों के लिए आवंटन में कोई वृद्धि नहीं

बजट का संदेश: सरकार को जनता की तनिक परवाह नहीं!


बाकी खबरें

  • ऋचा चिंतन
    WHO की कोविड-19 मृत्यु दर पर भारत की आपत्तियां, कितनी तार्किक हैं? 
    25 Apr 2022
    भारत ने डब्ल्यूएचओ के द्वारा अधिक मौतों का अनुमान लगाने पर आपत्ति जताई है, जिसके चलते इसके प्रकाशन में विलंब हो रहा है।
  • एजाज़ अशरफ़
    निचले तबकों को समर्थन देने वाली वामपंथी एकजुटता ही भारत के मुस्लिमों की मदद कर सकती है
    25 Apr 2022
    जहांगीरपुरी में वृंदा करात के साहस भरे रवैये ने हिंदुत्ववादी विध्वंसक दस्ते की कार्रवाई को रोका था। मुस्लिम और दूसरे अल्पसंख्यकों को अब तय करना चाहिए कि उन्हें किसके साथ खड़ा होना होगा।
  • लाल बहादुर सिंह
    वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव को विभाजनकारी एजेंडा का मंच बनाना शहीदों का अपमान
    25 Apr 2022
    ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध हिन्दू-मुस्लिम जनता की एकता की बुनियाद पर लड़ी गयी आज़ादी के लड़ाई से विकसित भारतीय राष्ट्रवाद को पाकिस्तान विरोधी राष्ट्रवाद (जो सहजता से मुस्लिम विरोध में translate कर…
  • आज का कार्टून
    काश! शिक्षा और स्वास्थ्य में भी हमारा कोई नंबर होता...
    25 Apr 2022
    SIPRI की एक रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार ने साल 2022 में हथियारों पर जमकर खर्च किया है।
  • वसीम अकरम त्यागी
    शाहीन बाग़ की पुकार : तेरी नफ़रत, मेरा प्यार
    25 Apr 2022
    अधिकांश मुस्लिम आबादी वाली इस बस्ती में हिंदू दुकानदार भी हैं, उनके मकान भी हैं, धार्मिक स्थल भी हैं। समाज में बढ़ रही नफ़रत क्या इस इलाक़े तक भी पहुंची है, यह जानने के लिये हमने दुकानदारों,…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License