NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
ओबीसी सूची निर्माण में क्या राज्य अपनी शक्तियां खो देगा?
राज्यसभा में 123वें संशोधन विधेयक-2017 के संबंध में चर्चा से पता चलता है कि सरकार या विपक्ष कौन पिछड़े वर्गों के लिए प्रतिबद्ध है।
पी.जी.अम्बेडकर
07 Aug 2017
ओबीसी सूची निर्माण में क्या राज्य अपनी शक्तियां खो देगा?

राज्यसभा में 123वें संशोधन विधेयक-2017 के संबंध में चर्चा से पता चलता है कि सरकार या विपक्ष कौन पिछड़े वर्गों के लिए प्रतिबद्ध है। ये विधेयक राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान करता है। ये विधेयक लोकसभा में पारित कर दिया गया और राज्यसभा को भेज दिया गया। यह मुद्दा तब शुरू हुआ जब सभा की अध्यक्षता कर रहे पी.जे. कुरियन ने सदस्यों से पूछा कि क्या वे उन संशोधनों के लिए आगे बढ़ रहे हैं जो उन्होंने उक्त विधेयक पर मतदान के दौरान सुझाव दिया था। पांच सदस्यीय आयोग के लिए विधेयक में संशोधन को लेकर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह, बीके हरिप्रसाद और हुसैन दलवाई ने आगे बढ़ाया था जिसमें इन पांच सदस्यों में सभी अन्य पिछड़ा वर्ग के हों और इसमें एक महिला और एक अल्प संख्यक भी हों जो वर्तमान के तीन सदस्यीय के खिलाफ था। इसको लेकर प्रभारी मंत्री थावर चंद गहलोत ने सदन को आश्वस्त किया था कि नियम निर्माण के समय इन नियमों को समाविष्ट किया जा सकता है। दिग्विजय सिंह ने इसे नकार दिया कि इस सरकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि वे "जुमला राजनीति" करते हैं। इस संशोधन के लिए वोट हुआ और सदन ने इसे 74 में से 52 मतों से पारित कर दिया।

मौजूदा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग संसद अधिनियम 1993 के तहत अस्तित्व में आया। आयोग केवल "सूचियों में पिछड़े वर्ग के रूप में नागरिकों के किसी भी वर्ग" को शामिल करने या बाहर करने की मांग का परीक्षण कर सकता था। पिछड़ा वर्ग आयोग को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोगों की तरह संवैधानिक समर्थन नहीं है। विधेयक जब पारित हो जाता है और इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हो जाती है तो इसमें संवैधानिक समर्थन प्राप्त हो जाता है और इसे एक सिविल कोर्ट की शक्तियां मिल जाती है। अस्तित्व में आने के बाद आयोग अन्य पिछड़े वर्गों की शिकायतों का निपटारा कर सकता है। "सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच और निगरानी करने के लिए जो इस संविधान के अंतर्गत सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए प्रदान किया गया है या किसी अन्य कानून के तहत लागू होने के समय के लिए या सरकार के किसी भी आदेश के तहत और ऐसे सुरक्षा उपायों के काम का मूल्यांकन करने के लिए" यह अनिवार्य है।

यह इस संवैधानिक संशोधन का एकमात्र जनादेश नहीं है, विपक्ष के अनुसार विधेयक का सबसे विवादास्पद हिस्सा यह है कि यह राज्य की विधायिकी शक्तियों को दूर करने के लिए निर्णय लिया गया है कि राज्य स्तर पर ओबीसी सूची में कौन शामिल होगा या बाहर रखा जाएगा।

एमवी राजीव गौड़ा (सांसद) ने कहा कि यह स्पष्ट है कि एक बार 123वां संशोधन विधेयक पारित होने के बाद सिर्फ केंद्र सरकार ही तय कर सकेगी कि कौन सी जाति सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी है या नहीं। इस विधेयक में कोई भी ऐसी बात यह सुनिश्चित करने के लिए नहीं है कि राज्यपाल की राय लेने के लिए राष्ट्रपति बाध्य होंगे।

इस मुद्दे पर न्यूज क्लिक से बात करते हुए प्रोफेसर कंचलिया ने कहा कि केंद्र और मौजूदा राज्य पिछड़ा वर्ग आयोगों को स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए और उनका जनादेश अलग है। उन्होंने कहा कि राज्य के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

क्या इसका मतलब यह है कि अगर कोई कोर्ट में जाकर कहता है कि राज्यों को 123 वें संवैधानिक संशोधन के तहत ओबीसी सूची बनाने शक्ति नहीं है तो वह अस्तित्व में नहीं आएगा?

आयोग की संरचना से संबंधित पहलू को भी देखा जाना चाहिए। 1993 के मौजूदा एनसीबीसी अधिनियम में स्पष्ट है कि 5 सदस्यों में से एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को अध्यक्ष होना चाहिए, एक सामाजिक विज्ञानी, दो सदस्य जिन्हें पिछड़ा वर्ग का विशेष ज्ञान और एक सदस्य सचिव होंगे। प्रस्तावित विधेयक में आयोग के सदस्यों के लिए कोई मानदंड का उल्लेख नहीं है।

 

ओबीसी बिल
भाजपा
राज्य सभा
कांग्रेस

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

एमरजेंसी काल: लामबंदी की जगह हथियार डाल दिये आरएसएस ने

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी

क्या भाजपा शासित असम में भारतीय नागरिकों से छीनी जा रही है उनकी नागरिकता?


बाकी खबरें

  • hisab kitab
    न्यूज़क्लिक टीम
    लोगों की बदहाली को दबाने का हथियार मंदिर-मस्जिद मुद्दा
    20 May 2022
    एक तरफ भारत की बहुसंख्यक आबादी बेरोजगारी, महंगाई , पढाई, दवाई और जीवन के बुनियादी जरूरतों से हर रोज जूझ रही है और तभी अचनाक मंदिर मस्जिद का मसला सामने आकर खड़ा हो जाता है। जैसे कि ज्ञानवापी मस्जिद से…
  • अजय सिंह
    ‘धार्मिक भावनाएं’: असहमति की आवाज़ को दबाने का औज़ार
    20 May 2022
    मौजूदा निज़ामशाही में असहमति और विरोध के लिए जगह लगातार कम, और कम, होती जा रही है। ‘धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना’—यह ऐसा हथियार बन गया है, जिससे कभी भी किसी पर भी वार किया जा सकता है।
  • India ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    ज्ञानवापी विवाद, मोदी सरकार के 8 साल और कांग्रेस का दामन छोड़ते नेता
    20 May 2022
    India Ki Baat के दूसरे एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, भाषा सिंह और अभिसार शर्मा चर्चा कर रहे हैं ज्ञानवापी विवाद, मोदी सरकार के 8 साल और कांग्रेस का दामन छोड़ते नेताओं की। एक तरफ ज्ञानवापी के नाम…
  • gyanvapi
    न्यूज़क्लिक टीम
    पूजा स्थल कानून होने के बावजूद भी ज्ञानवापी विवाद कैसे?
    20 May 2022
    अचानक मंदिर - मस्जिद विवाद कैसे पैदा हो जाता है? ज्ञानवापी विवाद क्या है?पक्षकारों की मांग क्या है? कानून से लेकर अदालत का इस पर रुख क्या है? पूजा स्थल कानून क्या है? इस कानून के अपवाद क्या है?…
  • भाषा
    उच्चतम न्यायालय ने ज्ञानवापी दिवानी वाद वाराणसी जिला न्यायालय को स्थानांतरित किया
    20 May 2022
    सर्वोच्च न्यायालय ने जिला न्यायाधीश को सीपीसी के आदेश 7 के नियम 11 के तहत, मस्जिद समिति द्वारा दायर आवेदन पर पहले फैसला करने का निर्देश दिया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License