NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पराली जलाने से रोक के नाम पर आम किसान को चुनाव से बाहर करने की कोशिश
पंजाब सरकार पंचायती राज अधिनियम में संशोधन कर यह नियम बनाने जा रही है कि जो किसान अपने खेतों में फसल कटाई के बाद बची पराली को जलाएंगे उन्हें पंचायती चुनाव के किसी भी स्तर पर उम्मीदवार बनने के अयोग्य करार दे दिया जाएगा।
अजय कुमार
05 Oct 2018
खेत में पराली जलाते किसान (फाइल फोटो)
साभार : गूगल

वैश्विक  पर्यावरण सम्मेलनों से पर्यावरण बचाने के लिए निकले एक सिद्धांत को ‘कॉमन बट डिफरेंसिएटेड रेस्पोंसीबिलिटी’ यानी समान लेकिन विभेदीकृत ज़िम्मेदारियां, के नाम से जाना जाता है। मतलब यह कि सभी देशों का लक्ष्य तो पर्यावरण बचाने के लिए काम करना होगा लेकिन सबकी जिम्मेदारियां अलग-अलग होंगी।  वह देश  जिन्होंने पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुँचाया है, पर्यावरण बचाने के प्रति उनकी जिम्मेदारी अधिक होगी और जिनके सरोकार अभी भी पर्यावरण से हैं, उनकी जिम्मेदारियां कम होंगी। लेकिन हमारे देश में उल्टा हो रहा है।पंजाब की सरकार खेतों की पराली को जलाने से होने वाले पर्यावरण नुकसान को बचाने के लिए जिम्मेदारी खुद लेने के बजाय किसानों पर डाल रही है।  उन किसानों पर जिनके जीवन का सरोकार अभी भी पर्यावरण से सबसे अधिक है।  पंजाब सरकार पंचायती राज अधिनियम में संशोधन कर यह नियम बनाने जा रही है कि जो किसान अपने खेतों में फसल कटाई के बाद बची पराली को जलाएंगे उन्हें पंचायती चुनाव के किसी भी स्तर पर उम्मीदवार बनने की योग्यता नहीं दी जाएगी। इस मंशा पर चर्चा करने से पहले यह समझने की कोशिश करते हैं कि पराली की समस्या क्या है?

पराली की समस्या 

पंजाब और हरियाणा के इलाके में फसल कटाई के बाद बची पराली को जलाने से होने वाला पर्यावरणीय नुकसान अहम मुद्दा है।  पंजाब के तकरीबन 65 लाख एकड़ जमीन पर धान की पैदवार होती है और इससे तकरीबन 20 मिलियन टन पराली  जमीन पर अवशेष के रूप में   बची रह जाती है। 

इस पराली को अगर बहुत दिनों तक जमीन पर ही छोड़ दिया जाए तो मिट्टी में सूक्ष्मजैविकों की रासायनिक अभिक्रिया बढ़ सकती है और मिट्टी उपजाऊ हो सकती है।  पराली के साथ उपयुक्त तकनीक जोड़ दिया जाए तो उर्जा उत्पादन भी किया जा सकता है लेकिन यह सब अभी तक ख्याली पुलाव के रूप  में ही  है।  

हकीकत यह है कि नवम्बर के महीने में धान काटने के बाद गेहूं लगाने के लिए बहुत कम समय बचता है। इस कम समय में किसान खेतों को जल्दी से साफ़ करने के चक्कर में खेतों में बचे अवशेष को जला देते हैं।  जबकि किसानों को यह बात पता होती है कि पराली जलाने से सेहत को नुकसान पहुंचता है फिर भी वे पराली को जलाते हैं क्योंकि उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होता है।  वैसे पराली प्रबंधन में जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे उसमें तकरीबन 1500-3000 रुपए प्रति एकड़ खर्च होता है। आय के नजरिये से बदहाल किसान पराली प्रबंधन के लिए  इतना  ज्यादा रकम खर्च कर सकेंगे, यह उम्मीद करना भी बेईमानी है। 

पराली जलाने की वजह से उपजी ऊष्मा (गरमी) मिट्टी की तकरीबन एक सेंटीमीटर की परत तक पहुंच जाती है।  बार-बार पराली जलाने की वजह से मिट्टी में मौजूद तकरीबन 50 फीसदी उपयोगी बैक्टरिया मर जाते हैं। जिसकी वजह से जमीन की उपजाऊ क्षमता बहुत कम हो जाती है।  इसलिए हरियाणा और पंजाब की सरकार ने पराली प्रबन्धन के लिए जरूरी कृषि उपकरणों के खरीद के लिए सब्सिडी का प्रावधान भी किया है।  लेकिन इस सब्सिडी को हासिल करने में इतनी जटिलता का समाना करना पड़ता है कि बहुत ही कम किसान इस सरकारी सुविधा का फायदा उठा पाते हैं। बहुत सारे किसान तो पराली की समस्या से इतना परेशान हैं  कि धान की खेती छोड़ने का विचार बना रहे हैं।  उन्हें लगता है कि एक तरफ तो  पंजाब की सूखती जमीन से  धान के लिए पानी निकालना मुश्किल हो रहा है और दूसरी  तरफ धान  के बाद पराली निपटारे की व्यवस्था भी करनी है।  इससे अच्छा है कि  धान की खेती करना ही छोड़ दिया जाए।

पंजाब, हरियाणा और यहाँ के इर्द-गिर्द के इलाकों में वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण पराली जलाना रहा है।  दिल्ली के हवाओं में 20 फीसदी स्मॉग पराली जलाने से निकले धुएं से आता है।  इस प्रदूषण से कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है। इससे बेन्जिन और टोल्युन जैसी जहरीली गैस भी पैदा होती है।

एक अनुमान के मुताबिक एक टन पराली को जलाने से तकरीबन 3 किलो पार्टिकुलेट मैटर, 60 किलो कार्बन मोनो ऑक्साइड, 1460 किलो कार्बन-डाई-ऑक्साइड, 2 किलो सल्फर-डाई- ऑक्साइड और 199 किलो राख पैदा होती है। मिट्टी में तकरीबन साढ़े पांच किलो नाइट्रोजन, 25 किलो पोटेशियम, 2.3 किलो फास्फोरस और 1.2 किलो सल्फर जैसे तत्वों में कमी आ जाती है, जिसकी वजह से मिटटी की उपजाऊ क्षमता  कम  होती रहती है। एनजीटी ने भी इस पर कड़ा रुख अपनाया है।

हरियाणा में एक एकड़ पराली जलाने पर 5000 रुपये जुर्माना भरने का प्रावधान है और पंजाब में  ढाई एकड़ से लेकर 5 एकड़ पराली जलाने पर 5000 रुपये जुर्माना भरने का प्रावधान है। 

कहने का मतलब यह है कि पारली की वजह से पैदा होने वाली समस्याएं गंभीर हैं और इस समस्या के समाधान के लिए हल निकालने की कोशिश की जानी चाहिए। पर सवाल यह उठता है कि क्या पंचायत चुनावों में उन किसानों पर प्रतिबन्ध लगाकर इस समस्या का सामाधान किया जा सकता है जो अपने खेतों की सफाई करने के लिए पराली जलाते हैं। पंजाब की तकरीबन 70 फीसदी जमीन पर पराली जलाई जाती है, जिसमें सबसे अधिक संख्या सीमांत किसानों की है।  जिनके पास खेती के लिए छोटे जोत होते हैं और जो जीवन जीने लायक आय भी किसानी से नहीं कमा पाते हैं।  इनके लिए पराली प्रबंधन के लिए प्रति एकड़ 1500 से 3000 रुपये का खर्च नामुमकिन है। इसलिए इस पूरे समुदाय को पंचायती चुनाव से बाहर कर देना कहीं से भी उचित नहीं लगता है।

संविधान बनाते हुए तमाम बहसों से यह निष्कर्ष निकाला गया कि लोकतंत्र का यह बुनियादी सिद्धांत है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में चुने जाने की प्रक्रिया बनाते हुए ऐसा कोई भी नियम न बनाया जाए, जिससे बहुत सारे लोग स्वतः ही बाहर हो जाए। यह लोकतंत्र में नागरिकों को मिले उनके मौलिक अधिकार का हनन है।  सब चाहते हैं कि किसी के खेत की पराली जलाने से किसी की सेहत पर बुरा प्रभाव न पड़े लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं तब तक कोई पराली न जलाए जब तक उसके पास पराली प्रबन्धन के लिए पैसे न हो।  पराली प्रबंधन का काम अनिवार्य किया जा सकता है लेकिन इसकी अनिवार्यता बनाने की कोशिश में ऐसा कानून नहीं बनाया जा सकता है जिससे अधिकांश नागरिकों के मौलिक अधिकार को छीन लिया जाए। 

वैश्विक पर्यावरण सम्मेलनों से निकले ‘कॉमन बट डिफरेंसिएटेड रेस्पोंसीबिलिटी’ सिद्धांत की सबसे अधिक वकालत भारतीय राज्य ने ही की थी। इस सिद्धांत के अनुसार अगर पर्यावरण बचाने के लिए सबसे अधिक जिम्मेदारी विकासशील देशों की अपेक्षा विकसित देशों की है तो इस लिहाज से नागरिक से ज्यादा राज्य की जिम्मेदारी बनती है कि वह पर्यावरण बचाने के लिए जरूरी नियम बनाए। नियम बनाये भी तो ऐसा नियम बनाये जिसमें  सबसे कम उनको मार झेलनी पड़े जो कमज़ोर हैं या जिनका सरोकार पर्यावरण से अभी भी जुड़ा हुआ है। इसके अलावा सारी ज़िम्मेदारी नागरिकों पर डालने की बजाय इस संबंध में कुछ ज़िम्मेदारी सरकार को भी लेनी होगी, तभी इस समस्या से निजात मिल सकती है। केवल चुनाव लड़ने से रोक देने से आम नागरिक ही इस लोकतांत्रिक व्यवस्था से बाहर होगा।

stubble burning
parali
kisan
panchayat polls
anti farmer
punjab
kharif crop

Related Stories

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

लुधियाना: PRTC के संविदा कर्मियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू

त्रासदी और पाखंड के बीच फंसी पटियाला टकराव और बाद की घटनाएं

मोहाली में पुलिस मुख्यालय पर ग्रेनेड हमला

पटियाला में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं निलंबित रहीं, तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का तबादला

दिल्ली और पंजाब के बाद, क्या हिमाचल विधानसभा चुनाव को त्रिकोणीय बनाएगी AAP?

MSP पर लड़ने के सिवा किसानों के पास रास्ता ही क्या है?

विभाजनकारी चंडीगढ़ मुद्दे का सच और केंद्र की विनाशकारी मंशा

पंजाब के पूर्व विधायकों की पेंशन में कटौती, जानें हर राज्य के विधायकों की पेंशन


बाकी खबरें

  • राज वाल्मीकि
    कैसे ख़त्म हो दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं के साथ शिक्षण संस्थानों में होने वाला भेदभाव
    25 Mar 2022
    दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं के साथ होने वाले भेदभाव को ख़त्म करने के विषय पर नई दिल्ली में एक कॉन्फ्रेंस का आयोजन  किया गया।
  • इरिका शेल्बी
    पुतिन को ‘दुष्ट' ठहराने के पश्चिमी दुराग्रह से किसी का भला नहीं होगा
    25 Mar 2022
    रूस की ओर उंगलियों उठाने से कुछ नहीं बदलेगा–दुनिया में स्थायी शांति के लिए यह रवैया बदलने की ज़रूरत है। 
  • ज़ो एलेक्जेंड्रा
    गिउलिअनो ब्रुनेटी: “नाटो के ख़िलाफ़ हमारा संघर्ष साम्राज्यवादी ताकतों के ख़िलाफ़ संघर्ष है”
    25 Mar 2022
    आक्रामक सैन्य गठबंधन हमेशा से ही यूक्रेन में चल रहे संघर्ष का केंद्र रहा है, जिसके चलते कई लोगों ने गठबंधन पर सवालिया निशान लगाकर पूछना शुरू कर दिया है कि इसका हिस्सा बने रहने का क्या मतलब है। पोटेरे…
  • भाषा
    दिल्ली के तीन नगर निगमों का एकीकरण संबंधी विधेयक लोकसभा में पेश
    25 Mar 2022
    सरकार ने दिल्ली के तीन नगर निगमों का एकीकरण करने संबंधी दिल्ली नगर निगम (संशोधन) विधेयक, 2022 को शुक्रवार को विपक्षी दलों के सदस्यों के विरोध के बीच लोकसभा में पेश किया। विपक्षी दलों ने इसका विरोध…
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    गणेश शंकर विद्यार्थी : वह क़लम अब खो गया है… छिन गया, गिरवी पड़ा है
    25 Mar 2022
    गोदी मीडिया के दौर में गणेश शंकर विद्यार्थी को याद करना एक अलग अनुभव, एक अलग चुनौती और एक अलग दायित्व है। आज़ादी के मतवाले क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत के दो दिन बाद 25 मार्च,…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License