NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना : किसान योजना छोड़ रहे हैं, लेकिन प्रीमियम की उगाही बढ़ रही है
नए जारी हुए आंकड़ों से पता चलता है कि बीमा कंपनियों ने पिछले दो साल में अतिरिक्त 10,000 करोड़ रुपया हज़म कर लिया है।
सुबोध वर्मा
02 May 2019
Translated by महेश कुमार
pmfby
insurance scheme

मोदी सरकार की प्रमुख फसल बीमा योजना (प्रधान मंत्री बीमा योजना या पीएमएफबीवाई) में दर्ज किसानों की संख्या 343 लाख हो गयी है। यह नयी जानकारी खरीफ फसल 2018-19 वर्ष के लिए खरीफ (गर्मी की) फसल पर हुए वार्षिक सम्मेलन में सामने आई।  इसे 25-26 अप्रैल को दिल्ली में कृषि मंत्रालय द्वारा आयोजित किया गया था। 2016 में जब यह योजना शुरू की गई थी, तब पहले खरीफ सीजन में इस योजना में नामांकित हुए किसानों की संख्या 404 लाख थी, जो 2017 में घटकर 349 लाख हो गयी।

अजीब बात यह है कि बीमा कंपनियों द्वारा संग्रह किए गए प्रीमियम की कुल राशि का बढ़ना जारी है। 2016 में यह 16,015 करोड़ रुपया था और 2018 में बढ़कर यह  20,522 करोड़ रूपए हो गया था। यह इसलिए भी है कि प्रीमियम की दर में प्रति किसान बढ़ोतरी हो रही है और इसलिए प्रीमियम का भुगतान राज्य और केंद्र सरकार दोनों द्वारा किया जाता है। दूसरे शब्दों में, बीमा कंपनियां द्वारा कम कवरेज करने के बावजूद भी भारी लाभ अर्जित करना जारी है। इस व्यवसाय के मॉडल और योजना ने किसानों को बुरी तरह से प्रभावित किया है।

Capture_3.PNG

 
कम किसानों को कवर मिलने का मतलब है कि बड़ी संख्या में किसान अब पूरी तरह से मौसम के देवता की दया पर निर्भर हो गए हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि कई राज्यों में, किसान राज्य सरकारों से फसल के नुकसान के मुआवजे की मांग करते हैं, तो राज्य सरकारें सूखा राहत पैकेज के लिए केंद्र पर दबाव बनाने लगती हैं।

पीएमएफबीवाई के सीईओ डॉ. आशीष भूटानी द्वारा सम्मेलन में पेश किए गए आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि योजना के संचालन के पिछले दो वर्षों (2016-17 और 2017-18) में, बीमा कंपनियों ने अतिरिक्त 10,219 करोड़ रुपए जमा किया है। उन्होंने 44, 447 करोड़ रुपये का कुल प्रीमियम जमा किया, जबकि चार फसल सीजन (प्रत्येक वर्ष में खरीफ और रबी की दो फसलों) के लिए किसानों के दावों के रुप में 37,228 करोड़ रूपए स्वीकार किया है।

इस अवधि के दौरान, दावों के जल्द निपटान के लिए और कम बीमा मुआवजे के खिलाफ किसानों के आंदोलन के बारे में कई रिपोर्टें मिली हैं। मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में, किसान कम मुआवजे की शिकायतों को लेकर  उपभोक्ता अदालतों में भी गए हैं।

प्रीमियम एकत्र करने वाली बीमा कंपनियों द्वारा इस योजना के तहत किसानों से खरीफ सीजन में 1.5 प्रतिशत और रबी सीजन में 2 प्रतिशत प्रीमियम लिया जाता है। और प्रीमियम के तौर पर शेष राशि का समान रूप में बंटवारा राज्य और केंद्र सरकार में कर दिया जाता है। यानी प्रीमियम की शेष राशि का भुगतान बीमा कंपनियों को राज्य और केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। उसके बाद फसल कटने के बाद किसानों को यह अधिकार मिल जाता है कि वह बीमा कंपनियों से क्षतिपूर्ति हासिल करे अगर फसल का नुकसान किसी न रोके जा सकने वाली प्राकृतिक घटना जैसे कम बारिश आदि की वजह से हुई हो। इसके बदले में किसान और सरकारें बीमा देने  के लिए  कंपनियों को भारी मात्रा में भुगतान करती हैं। 

फसले कटने के बाद किसान अपने नुकसान का दावा करता है। इसके बाद जिलाधकारी यह तय करता है कि प्राकृतिक घटना की वजह से  प्रति क्षेत्र नुकसान कितना हुआ है ? और इसी आधार पर बिमा कम्पनियाँ किसान को भुगतान करती हैं।  

इस योजना का बहुत ही निराशाजनक प्रदर्शन रहा है - जिसकी मोदी सरकार और उसके समर्थकों ने बहुत प्रशंसा की थी -  इस योजना की वजह से देश में उन किसानों की बर्बादी में काफी इजाफा हुआ है जो पहले से ही बढ़ती ऋणग्रस्तता और गिरती कृषि आय से पीड़ित थे। केंद्र में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के पांच साल के शासन के दौरान किसानों द्वारा लगभग निरंतर आंदोलन करने के बाद, आम चुनावों से ठीक पहले ग्रामीण भारत में समर्थन हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री ने वार्षिक रुप से 6,000 रूपए प्रति किसान देने की घोषणा की थी। हालांकि, इतनी कम राशि नाराज किसानों को खुश करने में नाकामयाब रही है।
पिछले साल, देश-व्यापी (ग्रामीण क्षेत्र) इलाके में मानसून की बारिश में लगभग औसत 9 प्रतिशत की कमी रही थी, लेकिन कुछ प्रमुख क्षेत्रों जैसे गुजरात, उत्तरी कर्नाटक, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में वर्षा सबसे ज्यादा कम हुई। इन क्षेत्रों में, सूखे जैसी स्थिति व्याप्त है, और ये गहरे संकट में जकड़ गए हैं। इसके अलावा, पिछले वर्षों में अपने खराब अनुभव के कारण किसानों ने बीमा योजना में नामांकन करने में काफी हिचकिचाहट दिखायी है।

पीएम मोदी और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री तथा भाजपा नेता किसानों को इसे कैसे समझा पाएंगे जिनसे वे चुनाव अभियान के दौरान वे वोट मांगने जा रहे हैं, इसकी कल्पना करना मुश्किल है। शायद इसीलिए, मोदी या अन्य प्रचारकों के भाषणों में इन दिनों प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का कोई उल्लेख नहीं है।

pradhanmangtri fasal bima yojna
insurance scheme
Farmer distress
drought
loksabhsa polls
chunaav 2019
Narendra modi
narndra modi speech

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

मई दिवस: मज़दूर—किसान एकता का संदेश

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

ग्राउंड रिपोर्टः डीज़ल-पेट्रोल की महंगी डोज से मुश्किल में पूर्वांचल के किसानों की ज़िंदगी

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन

देशव्यापी हड़ताल का दूसरा दिन, जगह-जगह धरना-प्रदर्शन

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 


बाकी खबरें

  • Gauri Lankesh pansare
    डॉ मेघा पानसरे
    वे दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी या गौरी लंकेश को ख़ामोश नहीं कर सकते
    17 Feb 2022
    दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी को चाहे गोलियों से मार दिया गया हो, मगर उनके शब्द और उनके विचारों को कभी ख़ामोश नहीं किया जा सकता।
  • union budget
    टिकेंदर सिंह पंवार
    5,000 कस्बों और शहरों की समस्याओं का समाधान करने में केंद्रीय बजट फेल
    17 Feb 2022
    केंद्र सरकार लोगों को राहत देने की बजाय शहरीकरण के पिछले मॉडल को ही जारी रखना चाहती है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में आज फिर 30 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 541 मरीज़ों की मौत
    17 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 30,757 नए मामले सामने आए है | देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 27 लाख 54 हज़ार 315 हो गयी है।
  • yogi
    एम.ओबैद
    यूपी चुनावः बिजली बिल माफ़ करने की घोषणा करने वाली BJP का, 5 साल का रिपोर्ट कार्ड कुछ और ही कहता है
    17 Feb 2022
    "पूरे देश में सबसे ज्यादा महंगी बिजली उत्तर प्रदेश की है। पिछले महीने मुख्यमंत्री (योगी आदित्यनाथ) ने 50 प्रतिशत बिजली बिल कम करने का वादा किया था लेकिन अभी तक कुछ नहीं किया। ये बीजेपी के चुनावी वादे…
  • punjab
    रवि कौशल
    पंजाब चुनाव : पुलवामा के बाद भारत-पाक व्यापार के ठप हो जाने के संकट से जूझ रहे सीमावर्ती शहर  
    17 Feb 2022
    स्थानीय लोगों का कहना है कि पाकिस्तान के साथ व्यापार के ठप पड़ जाने से अमृतसर, गुरदासपुर और तरनतारन जैसे उन शहरों में बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी पैदा हो गयी है, जहां पहले हज़ारों कामगार,बतौर ट्रक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License