NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
राष्ट्रपति का चुनाव और सामाजिक दशा के संकेत
राष्ट्रपति पद के चुनाव परिणाम से देश की राजनीति पर सीधे सीधे कोई प्रभाव भले ही नहीं पड़े किंतु इससे देश और समाज की दशा को समझने में मदद जरूर मिलेगी
वीरेन्द्र जैन
03 Jul 2017
राष्ट्रपति का चुनाव और सामाजिक दशा के संकेत
राष्ट्रपति पद के चुनाव परिणाम से देश की राजनीति पर सीधे सीधे कोई प्रभाव भले ही नहीं पड़े किंतु इससे देश और समाज की दशा को समझने में मदद जरूर मिलेगी क्योंकि इस चुनाव में व्हिप जारी नहीं हो सकता। स्मरणीय है कि 1969 में यह राष्ट्रपति का चुनाव ही था जिसके सहारे श्रीमती गाँधी ने अपनी सरकार पर अपने ही वरिष्ठ साथियों की कुदृष्टि के संकेत समझे थे और साहसपूर्ण फैसले लेकर अपनी पार्टी के उम्मीदवार को हरवाने के लिए आत्मा की आवाज पर वोट देने का आवाहन किया था। उसी चुनाव में पहली बार वामपंथियों के प्रस्ताव पर उम्मीदवार बने व्ही व्ही गिरि सत्तारूढ काँग्रेस के प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी को हरा कर विजयी हुये थे। इसी दौर में सरकार के अल्पमत में आने के खतरे को देख कर श्रीमती गाँधी ने वामपंथी पार्टियों से समर्थन मांगा था और उसके बदले में बड़े बैंकों व बीमा कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवीपर्स व विशेषाधिकार को समाप्त करने की घोषणा की थी। यही वह समय था जब श्रीमती गाँधी को अपनी पार्टी की छवि बदलने के लिए समाजवाद और गरीबी हटाओ का नारा उछालना पड़ा था। इसी के बाद हुये लोकसभा चुनावों में उन्होंने काँग्रेस की गिर चुकी साख को फिर से प्राप्त कर अभूतपूर्व समर्थन पाया था। पाकिस्तान के विभाजन में भारत की भूमिका निभाने में सोवियत संघ का समर्थन व अमेरिका द्वारा सातवें बेड़े का भेजा जाना भी एक बड़ी घटना थी। इसी के बाद श्रीमती गाँधी के खिलाफ देश भर में दक्षिणपंथी शक्तियां सक्रिय हो गयीं थीं जिन्हें श्रीमती गाँधी ने अमेरिका के इशारे पर प्रेरित फासिस्ट ताकतें बताया था और उनके आन्दोलन को दबाने के लिए इमरजैंसी का सहारा लिया था। यह चुनाव भी जिन परिस्तिथियों में हो रहा है उसमें शक्तियों की पहचान, उनके नये गठबन्धनों का निर्माण और पुराने के विघटन देखने को मिल सकते हैं, जिससे शक्ति संतुलनों में उथल पुथल हो सकती है। यह चुनाव भी देश की राजनीति में परिवर्तन ला सकता है।
 
उल्लेखनीय है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की उम्मीदवारी पर समुचित विवाद रहा था और गहरा असंतोष पैदा हुआ था। अडवाणी इस पद के लिए भाजपा में सबसे वरिष्ठ, अनुभवी, सम्मानित व सुपात्र व्यक्ति थे इसके विपरीत नरेन्द्र मोदी की छवि ऐसी थी कि दुनिया के प्रमुख देशों ने उन्हें वीजा देने तक से मना कर दिया था। अनेक विधायकों पर मुसलमानों के नरसंहार से लेकर हत्याओं तक के गम्भीर आरोप थे जिन्हें जानते समझते हुए भी उन्होंने टिकिट ही नहीं दिया था अपितु मंत्रिमण्डल में भी रखा था। दूसरी ओर औद्योगिक राज्य गुजरात के आर्थिक विकास से जुड़ा कार्पोरेट घरानों का समर्थन और उन पर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई आरोप न होना उनके पक्ष में जाता था। हिन्दू साम्प्रदायिकता से प्रभावित एक वर्ग उन्हें नायक की तरह देखता था। नरेन्द्र मोदी ने चुनाव में जीत का कुशल प्रबन्धन करके वह जीत दिलवा दी जिसके लिए भाजपा और उसकी मातृ संस्था आरएसएस बरसों से तरस रही थी। इस जीत के साथ साथ उन्होंने पार्टी की कमान भी सम्हाल ली और अनेक आरोपों से घिरे रहे अपने दाहिने हाथ अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनवा दिया। जीत के साथ ही उन्होंने भाजपा में पार्टी नाम के अलावा बहुत कुछ बदल दिया। वरिष्ठ नेताओं को मार्ग दर्शक मण्डल के नाम पर मुख्य धारा से किनारे कर दिया। पार्टी के नाम की जगह केवल मोदी मोदी होने लगा। अटल बिहारी वाजपेयी के कथित फील गुड को कभी याद नहीं किया गया और उसे भी काँग्रेस के सत्तर साला शून्य उपलब्धियों के काल में मिला कर प्रचारित किया। अटल अडवाणी के चित्रों को पोस्टर पर छापने की परम्परा समाप्त कर दी गयी। मीडिया को अपने प्रिय कार्पोरेट घरानों से खरीदवा दिया, बाहर वालों को सरकारी विज्ञापन प्रबन्धन से अनुकूल बनाया या साम दाम दण्ड भेद से उन्हें बाजार से बाहर करवा दिया। सोशल मीडिया पर ट्रालर बैठा दिये। विपक्षियों के स्कैम या उन्हें हास्यास्पद बना कर उनकी चरित्र हत्या की जाने लगी। 
 
प्रबन्धन से अर्जित जीत में अनेक सदस्य दूसरे दलों से दल बदल करा के लाये गये थे, तो पुराने सदस्यों में से भी अनेक सत्ता का मतलब वैसा ही निजी आर्थिक हित मान कर चलते थे जैसा कि पिछली सरकारों में होता रहा था। समस्त प्रयासों से गढी गयी अपनी छवि को बचाना था इसलिए मोदी ने उस कीमत पर उनकी इच्छा पूरी नहीं होने दी। सांसद निधि को एक आदर्श गाँव तक सीमित करके उससे होने वाली कमाई पर नियंत्रण लगा दिया। सबको सम्पत्ति की जानकारी देने को कहा गया तथा मंत्रिमण्डल गठन में महात्वाकांक्षी लोगों को दूर रखा गया। जैटली जैसे अपवाद को छोड़ कर मंत्रिमण्डल के शेष सदस्य पीएम कार्यालय से नियंत्रित अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत फाइलों पर दस्तखत करने का कार्य करने को विवश हुये। विभाग के फैसले लेना उनका काम नहीं रह गया। नोटबन्दी का गलत फैसला, विदेश नीतियों की असफलता, साम्प्रदायिक तत्वों पर नियंत्रण न कर पाना, कश्मीर जैसी समस्याओं को ठीक से संचालित नहीं करना, तथा ढेर सारी चुनावी घोषणाओं की पूर्ति न होने से सांसदों को जनता से सामना करना कठिन लगने लगा। रोजगार के अवसर नहीं जुटाये जा सके, किसानों को घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं दिया गया। राज्यों में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं लगा जिससे केन्द्र की सावधानी निरर्थक हो गयी। इन सब को टालने के लिए भावुक मुद्दों को छोड़ा जाने लगा। सांसद अपनी सरकार से खुश नहीं हैं। उन्हें विश्वास में नहीं लिया जाता, इसलिए ऐसा लगता है कि केवल वेतन लेने और सदन में समर्थन करने से ज्यादा उनकी कोई जिम्मेवारी नहीं है। उन्हें लगता है कि उनकी कोई विशिष्टता नहीं है।
 
राष्ट्रपति के उम्मीदवार के चयन में अनावश्यक गोपनीयता ही नहीं बरती गयी, अपितु किसी से सलाह ही नहीं ली गयी। नामांकन प्रस्ताव के खाली फार्मों पर दस्तखत करा के मंगा लिये गये। यही हाल नोटबन्दी से लेकर दूसरे अनेक फैसलों में भी किया गया जो असफल रहे। गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम, वालंटरी डिस्क्लोजर स्कीम, विदेश में जमा धन की वापिसी आदि योजनाएं पूरी तैयारी के बिना लागू किये जाने से असफल हो गयीं। राष्ट्रपति के चयन में दलित उम्मीदवार के चयन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पिछले दिनों रोहित वेमुला की आत्महत्या, गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई का वीडियो, सहारनपुर की भीम सेना, आदि के कारण दलित उम्मीदवार उतारा गया है। आरक्षण के कारण दलित समुदाय के लोग सांसद और मंत्री भले ही हों किंतु उनकी नेतृत्व में भागीदारी नहीं है। इसी असंतोष प्रबन्धन के लिए ऐसा दलित उम्मीदवार उतारा गया जो औपचारिकता की पूर्ति तो करता है किंतु उस वर्ग का नेतृत्व नहीं करता, न ही पक्षधरता करके उनके मुद्दों को सम्बोधित करता रहा है।
 
1975 की इमरजैंसी के बारे में कहा गया था कि लोगों से झुकने के लिए कहा गया तो वे लेट गये। इस अघोषित इमरजैंसी में इसका पुनर्परीक्षण हो सकता है, चुप्पियों के अर्थ निकल सकते हैं। अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, येदुरप्पा, यशवंत सिन्हा आदि पद के लिए दुखी भले ही न हों किंतु अपने अपमान के लिए अवश्य ही दुखी हैं। आर के सिंह, भगीरथ प्रसाद, सत्यपाल सिंह, आदि दर्जन भर लोग सोचते ही होंगे कि क्या वे इसके लिए अपनी प्रशासनिक सेवाओं को छोड़ कर आये थे। राम जेठमलानी, शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, भोला सिंह, आदि तो मुखर होने के बाद चुप्पी ओढे बैठे हैं पर क्या ये चुप्पी साधरण चुप्पी कही जा सकती है। समर्थन घोषित करने वाले दलों में क्या गुटबाजियां नहीं हैं? नवीन पटनायक के खिलाफ कितने षड़यंत्र हो चुके हैं, जेडीयू के अन्य वरिष्ठ नेताओं को नितिश का फैसला हजम नहीं हो रहा। शिवसेना ने नामांकन प्रक्रिया में भाग नहीं लिया। दल की गुटबाजियों में एक दूसरे से बदला लेने के मौके भी तलाशे जा सकते हैं।
 
ऊपर जमी पर्त के नीचे कितना लावा खदबदा रहा है यह इस चुनाव में सामने आ सकता है क्योंकि इससे सत्ता पर सीधे आँच आये बिना भी संकेत दिये जा सकते हैं। 1977 में बहती अंतर्धारा की पहचान किसने कर पायी थी।
भाजपा
राष्ट्रपति
प्रणब मुखर्जी
मीरा कुमार

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी

क्या भाजपा शासित असम में भारतीय नागरिकों से छीनी जा रही है उनकी नागरिकता?

भारत बंद के बाद, दलितों पर हो रहे दमन के खिलाफ DSMM ने दिया राष्ट्रपति को ज्ञापन


बाकी खबरें

  • CORONA
    न्यूज़क्लिक टीम
    चिंता: कोरोना ने फिर रफ़्तार पकड़ी, देश में 24 घंटों में 2 लाख के क़रीब नए मामले
    12 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,94,443 नए मामले सामने आए हैं। देश में अब कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 60 लाख 70 हज़ार 233 हो गयी है।
  • Maurya
    मुकुल सरल
    स्वामी प्रसाद मौर्य का जाना: ...फ़र्क़ साफ़ है
    12 Jan 2022
    यह केवल दल-बदल या अवसरवाद का मामला नहीं है, यह एक मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया है, वो भी श्रम मंत्री ने। यह योगी सरकार की विफलता ही दिखाता है। इसका जवाब योगी जी से लिया ही जाना चाहिए।
  • CORONA
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    तीसरी लहर को रोकने की कैसी तैयारी? डॉक्टर, आइसोलेशन और ऑक्सीजन बेड तो कम हुए हैं : माकपा
    12 Jan 2022
    मध्यप्रदेश में माकपा नेता के अनुसार दूसरी लहर की तुलना में डॉक्टरों की संख्या 1132 से घट कर 705 हो गई है। इसी तरह आइसोलेशन बेड की संख्या 29247 से घटकर 16527 रह गई है। इसी प्रकार ऑक्सीजन बैड भी 28,152…
  • Protest in Afghanistan
    पीपल्स डिस्पैच
    अफ़ग़ानिस्तान में सिविल सोसाइटी और अधिकार समूहों ने प्रोफ़ेसर फ़ैज़ुल्ला जलाल की रिहाई की मांग की
    12 Jan 2022
    काबुल यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान और क़ानून पढ़ाने वाले डॉ. जलाल तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान के पिछले प्रशासन के आलोचक रहे हैं। उन्होंने महज़ सुरक्षा पर ध्यान दिये जाने की तालिबान सरकार की चिंता की…
  • bjp-rss
    कांचा इलैया शेफर्ड
    उत्तर प्रदेश चुनाव : हौसला बढ़ाते नए संकेत!
    12 Jan 2022
    ज़्यादातर शूद्र, ओबीसी, दलित और आदिवासी जनता ने आरएसएस-भाजपा के हिंदुओं को एकजुट करने के झूठे दावों को संदिग्ध नज़र से देखा है। सपा के अखिलेश यादव जैसे नेताओं को इस असहमति को वोट में बदलने की ज़रूरत है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License