NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
तिकड़मी राजनीति के शिखर पुरुष अमर सिंह का पराभव
इस पूरे ड्रामे के परिणाम स्वरूप सबसे अधिक नुकसान राजनीतिक व्यापारी अमर सिंह का हुआ है
वीरेन्द्र जैन
17 Jan 2017
तिकड़मी राजनीति के शिखर पुरुष अमर सिंह का पराभव
तिकड़मी राजनीति के शिखर पुरुष अमर सिंह का पराभव
उत्तर प्रदेश के यादव कुनबे में दिन प्रतिदिन की कलह और भरत मिलाप के बीच किसी गुप्त या प्रकट समझौते के आसार तय माने जाते रहे हैं, किंतु इस पूरे ड्रामे के परिणाम स्वरूप सबसे अधिक नुकसान राजनीतिक व्यापारी अमर सिंह का हुआ है। जब विवादों के एपीसोड में मुलायम सिंह ने भावुक होकर अपने परिवारियों से कहा था कि अमर सिंह ने मुझे जेल जाने से बचाया था जिसमें सात साल की जेल हो सकती थी तो उसी समय स्पष्ट हो गया था कि इस अमर प्रेम के पीछे कौनसी ब्लैकमेलिंग काम कर रही थी। अमर सिंह के काम करने का तरीका तो उसी समय साफ हो गया था जब अन्ना आन्दोलन के दौरान उन्होंने प्रशांत भूषण की बातचीत का टेप होने का दावा किया था जो उनके पक्ष के ही वकील थे। इस बारे में उन्होंने खुद ही बताया था कि एक प्रकरण में विरोधी पक्ष को कोई बड़ा वकील न मिले इसलिए उन्होंने प्रदेश के सारे बड़े वकीलों को अपने पक्ष के वकील के रूप में नियुक्त कर लिया था व अपने ही वकील की बातचीत भी रिकार्ड करके सुरक्षित कर ली थी। जो व्यक्ति अपने ही पक्ष के लोगों की बात को रिकार्ड कर के रखता हो वह किसी का भी मित्र कैसे हो सकता है? इस घटना समेत दूसरी अनेक घटनाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे किसी के भी बफादार नहीं हो सकते। उनकी तुलना उस मोनिका लेवेंस्की से की जा सकती है जिसने क्लिंटन से प्रेमालाप के दौरान बिना भावुक हुये सारे प्रमाण वक्त जरूरत के लिए सम्हाल कर रख छोड़े थे।
मुस्लिम वोटों के लिए रणनीतिक रूप से मुलायम सिंह ने जब आज़म खान को गले लगाया था और अमर सिंह को पार्टी से बाहर बैठा दिया था, पर तब भी वे उन्हें दिल में बैठाये रहे थे जैसा कि उन्होंने बाद में प्रकट भी किया था। सच तो यह है कि राजनीति के नाम पर मुलायम सिंह ने अनेक लोगों के साथ धोखा किया है किंतु इनमें से अधिकांश बड़े धोखे उन्होंने अमर सिंह का साथ मिलने के बाद ही किये हैं। यह भी तय है कि ज़मीनी नेता मुलायम सिंह की वाक्पटु अमर सिंह के साथ सफल जोड़ी थी। जिस कूटनीति के ज्ञान और व्यवहार की मुलायम सिंह के पास कमी थी वही अमर सिंह में कूट कूट कर भरा हुआ था किंतु वे ठाकुरवाद, पूर्वांचलवाद, उभारने के बाद भी कहीं से विधायक का चुनाव तक जीत सकने में भी सक्षम नहीं हैं। अन्धे और लंगड़े के साथ की बोधकथा के सटीक उदाहरण हैं। मैंने कभी सहज हास्य में दो पंक्तियां कही थीं –
 
राजनीति ने आज व्यवस्था ऐसी कायम की
अमर सिंह जी दूध बेचते, भैंस मुलायम की
 
अमर सिंह हमेशा उस व्यक्ति को ही प्रभाव में लेने की कोशिश करते हैं जो कम स्मार्ट या बौद्धिक रूप से थोड़े कमजोर होते हैं। मुलायम सिंह के बाद शिवपाल यादव उनके नये चेले बने थे जिन्हें मुख्यमंत्री बनवाने के लिए उन्होंने पार्टी में दुबारा आने के बाद चालें चलना शुरू कर दी थीं। कभी अखिलेश को पढने के लिए विदेश भेजने से लेकर उनकी मनपसन्द शादी करवाने तक उन्होंने अपनी सेवाएं दी थीं पर अखिलेश के सामने यह बहुत जल्दी स्पष्ट हो गया कि यह सब उनकी कूटनीति का हिस्सा था। अखिलेश को पता लग गया था कि शिवपाल को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए अमर सिंह तिकड़म भिड़ा रहे हैं, प्रदेश में महत्वपूर्ण पदों पर अपने अधिकारी पदस्थ करा रहे हैं और सारे सूत्र अपने हाथ में ले रहे हैं। यही कारण रहा कि उनके मन में अमर सिंह के लिए तीव्र प्रतिरोध की भावना पैदा हुई, जबकि अमर सिंह को पता लग गया था कि अखिलेश उन्हें दलाल कहते और मानते हैं। बार बार दल की समस्याओं के लिए जिस बाहरी व्यक्ति का नाम आया वे अमर सिंह ही थे।  
 
अमर सिंह ने मुलायम सिंह की पावर आफ अटार्नी लेकर राजनीति में सबके साथ सौदा किया जिसमें दोनों पक्षों को ही फायदा हुआ, पर सब कुछ इतना व्यापारिक रहा कि कोई भी उनका अहसानमन्द नहीं हुआ। परमाणु समझौते के सवाल पर उन्होंने बामपंथियों के साथ धोखा करवाया और मनमोहन सिंह के खिलाफ आया अविश्वास प्रस्ताव गिर गया किंतु उसके बाद काँग्रेस ने उन पर कभी भरोसा नहीं किया। इससे पूर्व भी जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह को समर्थन की जरूरत पड़ी थी तो भाजपा के साथ गुप्त सौदा अमर सिंह के माध्यम से ही सम्भव हुआ था। रात्रि में बारह बजे के बाद अरुण जैटली से मिलने जाने वाले व इसे एक वकील और क्लाइंट की मुलाकात बताने वाले अमर सिंह ही थे। लोकप्रिय अभिनेता अमिताभ बच्चन को कर्जों से उभारने के लिए विज्ञापन का माडल बनने के लिए अमर सिंह ने ही प्रेरित किया था व जया बच्चन को राज्यसभा में भेजने व अमिताभ को उत्तर प्रदेश का ब्रांड एम्बेसडर बनवाने का काम अमर सिंह का ही था जिनकी लोकप्रियता के सहारे उन्होंने अपनी लोकप्रियता भी उभारी थी। बाद में अमिताभ भी उनसे उकता गये थे, और किसान बनने से तौबा कर ली थी। इन्हीं अमिताभ के लिए उन्होंने इलाहाबाद के आयकर कार्यालय में तोड़फोड़ करा दी थी।
 
अब यह लगभग तय हो चुका है कि समाजवादी पार्टी जो और जितनी भी शेष रहेगी उसमें मुलायम की भूमिका अडवाणी से अधिक नहीं रहने वाली है। अखिलेश युवा है, संसदीय दल का बहुमत उनके साथ है, उनका रिकार्ड साफ सुथरा है, उन्होंने एक बार डीपी यादव और दूसरी बार मुख्तार अंसारी के दल में प्रवेश का विरोध करके अपने नेतृत्व की समाजवादी पार्टी को अपराधियों की पार्टी होने की छवि से मुक्त कराया है। शासन में विकासोन्मुख राजनीति के नेता की तरह पहचान बनाने की कोशिश की है। प्रदेश में मुस्लिम नेतृत्व का प्रमुख चेहरा आज़म खान उनके साथ हैं व काँग्रेस समेत वामपंथी पार्टियों ने उन्हें समाजवादी पार्टी के नेता के रूप में मान्यता देकर उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को समर्थन दिया है। दूसरी ओर शिवपाल और मुलायम की छवि आधुनिक राजनीति के साथ मेल नहीं खाती। अमर सिंह, डीपी यादव, फूलन देवी, मुख्तार अंसारी, बाबू लाल कुश्वाहा, आदि अनेकों बाहुबलियों व आदर्शच्युत लोगों को पार्टी के साथ जोड़ने का कलंक शिवपाल मुलायम के साथ है।
 
अखिलेश को मुख्यमंत्री मुलायम ने ही कुछ दूरगामी सोच के आधार पर बनाया था जिसको अमर सिंह षड़यंत्र रच के बदलना चाहते थे अर्थात वे उनके फैसले के खिलाफ ही काम कर रहे थे। इसलिए अब अगर किसी को बाहर होना है तो अमर सिंह को ही होना है। मुलायम के खिलाफ सीबीआई की भी कोई कार्यवाही होती है तो उसका नुकसान भी समाजवादी पार्टी के खाते में नहीं जाने वाला। दूसरी ओर अमर सिंह का मूल चरित्र इतना प्रकट हो चुका है कि कोई भी दूसरी पार्टी उनका उपयोग भले ही कर ले पर उनकी हैसियत के अनुसार पद देकर पार्टी में भर्ती नहीं करेगी। अपनी पार्टी बना कर वे देख ही चुके हैं। वे ज्ञानी हैं, वाक्पटु हैं, हाज़िर जबाब हैं, रणनीति कुशल हैं पर अब मैदान से बाहर हो चुके हैं। अब अगर वे सर्वश्रेष्ठ कर सकते हैं तो यह कि वे सच्चे संस्मरणों की कोई किताब लिखें। यह किताब भारतीय राजनीति को दिशा देगी व जनता को चेतना देगी।
Courtesy: नेपथ्य्लीला
अमर सिंह
समाजवादी पार्टी
अखिलेश यादव
मुलायम सिंह यादव

Related Stories

यूपी चुनाव का पोस्टमार्टम : इस तरह हारीं ‘सेक्यूलर’ पार्टियां

यू.पी चुनाव का राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य

दादरी : एक और मौत

उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार का दलित भूमि हड़पने का नया विधेयक

इंसाफ से वंचित मुजफ्फरनगर जहां दो साल बाद भी सरकार फेल

#गोधराअगेन और साम्प्रदायिकता की राजनीति

कटघरे में कानून

भगवा ब्रिगेड की राजनीति

विभाजक राजनीति और विकास के भ्रम की हार


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के नए मामले तो कम हुए लेकिन प्रति दिन मौत के मामले बढ़ रहे हैं  
    29 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,35,532 नए मामले सामने आए हैं | इसके अलावा कोरोना से बीते दिन 871 मरीज़ों की मौत हुई है और देश में अब तक 4 लाख 93 हज़ार 198 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं।
  • unemployment
    अजय कुमार
    सरकारी नौकरियों का हिसाब किताब बताता है कि सरकार नौकरी ही देना नहीं चाहती!
    29 Jan 2022
    जब तक भारत का मौजूदा आर्थिक मॉडल नहीं बदलेगा तब तक नौकरियों से जुड़ी किसी भी तरह की परेशानी का कोई भी मुकम्मल हल नहीं निकलने वाला।
  • Gorakhpur
    सत्येन्द्र सार्थक
    गोरखपुर : सेवायोजन कार्यालय में रजिस्टर्ड 2 लाख बेरोज़गार, मात्र 4.42% को मिला रोज़गार
    29 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश में सक्रिय बेरोज़गारों की संख्या 41 लाख से ज़्यादा है। मगर सेवायोजन कार्यालय की वेबसाइट के अनुसार रिक्त पदों की संख्या सिर्फ़ 1,256 है।
  • hum bharat ke log
    लाल बहादुर सिंह
    झंझावातों के बीच भारतीय गणतंत्र की यात्रा: एक विहंगम दृष्टि
    29 Jan 2022
    कारपोरेट ताकतों ने, गोदी मीडिया, इलेक्टोरल बॉन्ड समेत अनगिनत तिकड़मों से अपनी हितैषी ताकतों को राजनीतिक सत्ता में स्थापित कर तथा discourse को कंट्रोल कर एक तरह से चुनाव और लोकतन्त्र का अपहरण कर लिया…
  • Padtaal Duniya Bhar Ki
    न्यूज़क्लिक टीम
    अफ़ग़ानिस्तान हो या यूक्रेन, युद्ध से क्या हासिल है अमेरिका को
    28 Jan 2022
    'पड़ताल दुनिया भर की' में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान में गहराते मानवीय संकट, भुखमरी पर हुई दो अंतरराष्ट्रीय बैठकों के परिणामों पर न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ से चर्चा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License