NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
उधार के सिन्दूर से सुहागिन होती भाजपा
वीरेन्द्र जैन
24 Jan 2015

अगर भाजपा यह बात केवल प्रचारित ही नहीं करती अपितु उस पर भरोसा भी करती है कि उसे गत लोकसभा चुनाव में दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए डाले गये वोटों में से जो मत मिले हैं वे राजनीतिक रूप से चेतन मतदाताओं द्वारा बिना किसी लोभ लालच से दिये गये स्वाभाविक और अधिकतम हैं, तो उसे यह भी मान लेना चाहिए कि जागरूक मतदाता बँधुआ नहीं होता है और दलों के कारनामों के प्रभाव में उसकी दिशा बदल भी सकती है। उल्लेखनीय है कि उक्त चुनाव में भाजपा की जीत काँग्रेस की अलोकप्रियता, व्यापक पैमाने पर दल बदलुओं और विभिन्न क्षेत्रों के लोकप्रिय लोगों को चुनाव में उतारकर संसाधनों के तीव्र प्रवाह के सहारे सम्भव हुयी थी। इस प्रबन्धन में मीडिया का भी भरपूर दुरुपयोग किया गया था। उल्लेखनीय है कि लोकसभा चुनावों के बाद हुये उपचुनावों या विधानसभा चुनावों में उनके मतों के प्रतिशत और संख्या दोनों में कमी आयी है।

भाजपा चुनाव जीतने के लिए कभी भी किन्हीं नैतिक नियमों के पालन की पक्षधर नहीं रही। इस दिशा में न केवल उन्होंने अभिनव प्रयोग किये हैं अपितु दूसरे दलों द्वारा शुरू किये गये कुत्सित प्रयोगों के साथ भरपूर प्रतियोगिता भी की है व उनसे आगे रहे हैं। ये प्रयोग चाहे दलबदल के हों, साम्प्रदायिकता के हों, जातिवाद के हों, क्षेत्रवाद के हों, भाषावाद के हों, सेलिब्रिटीज को उपयोग करने के हों, पेड न्यूज के हों, मतदाताओं को लुभाने के लिए धन और शराब बहाने के हों, या बाहुबलियों से धमकाने के हों, उन्होंने किसी से कभी गुरेज नहीं किया। इनमें से कई प्रयोग भले ही दूसरे दलों ने प्रारम्भ किये हों किंतु इन अवैध और अनैतिक साधनों का सबसे अधिक उपयोग भाजपा ने ही किया है।

                                                                                                                                   

साक्षरता में वृद्धि, जन आन्दोलनों से जनित राजनीतिक ज्ञान, व समाचार माध्यमों, विशेष रूप से टीवी पर चलने वाली बहसों के कारण राजनीतिक तर्क वितर्क आमजन तक भी पहुँचे हैं। पिछले दिनों ऐसे चेतन लोगों की संख्या में वृद्धि भी हुयी है। ऐसे लोग संगठनों के अभाव में भले ही कुछ ठोस परिणाम न दे पा रहे हों किंतु अन्ना जैसे आन्दोलनों में सामने आकर या कुछ विशेष फिल्मों को सफल बना कर वे समाज की धड़कन के संकेत तो देते ही रहते हैं। लोकतंत्र के सन्देश केवल मतदान केन्द्रों से ही नहीं आंके जाने चाहिए। पिछले दिनों कुछ महत्वपूर्ण मामलों पर केन्द्रीय मंत्री वैंक्य्या नायडू का बार बार संसद में ढीठता पूर्वक यह कथन कि हमें जनता से विजयी मत मिले हैं इसलिए हम हर तरह से सही हैं, वास्तविक लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध फासीवाद के संकेत हैं। एक महिला केन्द्रीय मंत्री द्वारा गाली गलौज की भाषा में बयान देने पर उनके ग्रामीण और पिछड़े वर्ग का होने का कुतर्क और उनके विरोध को पिछड़े वर्ग का विरोध बतलाना यह राज भी खोलता है कि ऐसे ज्ञात अयोग्य व्यक्ति को किसी जाति विशेष की कारण ही टिकिट दिया गया, मंत्री बनाया गया व बनाये रखा गया। उसके विरोध को जातिवादी विरोध बताया गया। क्या पूर्ण बहुमत वाली सरकार का यह तुष्टीकरण नहीं है?

जब कोई दल गलत हथकण्डों के सहारे चुनाव जीतता है, सत्ता सुख भोगता है और अवैध धन सम्पत्ति अर्जित करता है तो वह तंत्र को सुधारने की जगह उसे वैसा ही बनाये रखने या और बिगाड़ने का काम करता है। भाजपा आज इसी के सहारे सत्ता में है और उसके अधिकांश जनप्रतिनिधियों का रहन सहन बिल्कुल भी सादगीपूर्ण नहीं है कि यह भी माना जा सके कि उन्होंने किसी अच्छे उद्देश्य के लिए गलत सहारे लिये हैं। संघ प्रचारकों और कार्यकर्ताओं के रहन सहन में आये परिवर्तनों को देख कर उनके पिछले जानकार भी अचम्भित हैं। मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों को मिले बड़े बड़े निवास उनके संगठनों के कार्यालयों या कार्यकर्ताओं के आश्रय स्थलों के रूप में प्रयुक्त न होकर उन प्रतिनिधियों की ऐशगाह में बदल कर रह गये हैं। उल्लेखनीय है कि बामपंथियों को मिली ऐसी सुविधाएं उनके संगठनों और कार्यकर्ताओं द्वारा पार्टी के काम में उपयोग की जाती हैं। पिछले दिनों अनेक केन्द्रीय मंत्रियों ने अनावश्यक विदेश यात्राएं करना चाही थीं जिनमें से आधे से अधिक को प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति नहीं मिली। सेना के, पुलिस के, प्रशासन के बड़े बड़े अधिकारियों, फिल्मी जगत के अतिलोकप्रिय मँहगे कलाकारों, पूर्व राज परिवारों के सदस्यों, धार्मिक वेषधारी आश्रम मालिकों, व अवसरवादी दलबदलुओं के सहारे बहुमत जुटाया गया है, उनसे सादगी की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। मँहगा चुनाव लड़ने वालों बाहुबलियों, व धनपशुओं की मदद से चुनाव जीतने वालों से ईमानदारी व निष्पक्षता की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। ऐसे लोगों द्वारा ईमानदारी का मुखौटा लगा कर चुप बैठने की एक सीमा होती है।

भाजपा की उच्चस्तरीय कमेटी राजनीतिक आधार पर नहीं अपितु प्रबन्धन के सहारे सत्ता हथियाने के लिए प्रयास करती है यही कारण है कि उनके यहाँ अमितशाह जैसे लोग आगे हो जाते हैं। कोई भी, कैसे भी उन्हें सत्ता दिलाये वह उनके लिए महत्वपूर्ण होता है और सत्ता न दिला सकने वाला कर्मठ से कर्मठ व्यक्ति भी हाशिये पर फेंक दिया जाता है। राज्यों में सत्ता बनाने व बचाये रखने वाला व्यक्ति गम्भीर से गम्भीर अनियमितता और भ्रष्टाचार करने के बाद भी वरण करने योग्य माना जाता है। कर्नाटक, मध्यप्रदेश आदि तो ज्वलंत उदाहरण हैं। सारे स्वाभिमान को तिलांजलि देकर शिवसेना से गलबहियां की जा सकती हैं या शरद पवार की एनसीपी या कश्मीर में पीडीपी से वार्ता की जा सकती है। शिरोमणि अकाली दल द्वारा आतंकियों की फाँसी के खिलाफ जाने पर भी गठबन्धन रखा जा सकता है और बीजू जनता दल या जेडीयू द्वारा ठुकराये जाने के बाद भी उम्मीद की डोरी लटकायी रखी जा सकती है। सब कुछ जानते हुए भी ममता बनर्जी से सहयोग की उम्मीद साधी जा सकती है और उसके द्वार से पूरी तरह निराश हो जाने के बाद ही उनके खिलाफ मोर्चा खोला जाता है, उनके सदस्यों से दल बदल कराया जाता है। यही हाल राज ठाकरे के पूर्व विधायकों से किया जाता है। दिल्ली के चुनावों में जीतने की उम्मीदें धूमिल हो जाने के बाद किरण बेदी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में घोषित करके आयात किया जाता है और यह भी ध्यान नहीं दिया जाता है कि पूर्व में उन्होंने भाजपा और उनके मान्य नेता के खिलाफ क्या क्या कहा व लिखा था। ऐसे अभियानों में तभी तक सफलता भी मिल सकती है जब तक चुनाव प्रबन्धन के खेल पर निर्भर हों, पर लोकतंत्र के चेतन होने की दशा में पूरी बाजी एकदम से उलट सकती है। दिल्ली विधानसभा का आगामी चुनाव दिल्ली की राजनीतिक चेतना का परीक्षण भी होगा।  

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

 

 

किरनबेदी
दिल्ली विधानसभा चुनाव
भाजपा
फ़ासीवाद
साम्प्रदायिकता
सांप्रदायिक ताकतें

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी

क्या भाजपा शासित असम में भारतीय नागरिकों से छीनी जा रही है उनकी नागरिकता?

बिहार: सामूहिक बलत्कार के मामले में पुलिस के रैवये पर गंभीर सवाल उठे!


बाकी खबरें

  • SC
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब : क्या खोरीवासियों को पीएम आवास योजना से मिल सकता है घर?
    21 Sep 2021
    कोर्ट ने पुनर्वास के मामले में कहा कि जब खोरी गांव के पुनर्वास की नीति प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास की बात करती है तो निश्चित रूप से आइडेंटिटी प्रूफ़ में से कोई एक एवं रेज़िडेंस प्रूफ़ में से कोई…
  • kisan andolan
    सरोजिनी बिष्ट
    सीतापुर महापंचायत: अवध में दस्तक के बाद पूर्वांचल की राह पकड़ेगा किसान आंदोलन
    21 Sep 2021
    पूर्वांचल के जिलों के लिए यह आंदोलन ख़ास मायने रखता है क्योंंकि पश्चिमी यूपी की तरह न तो यहां कोई सशक्त किसान संगठन है जो किसानों के सवालों के लिए लड़ता रहे और न ही यहां पश्चिमी यूपी की तरह अनाज…
  • SARS
    संदीपन तालुकदार
    जानवरों में पाए जाने वाले सार्स-जैसे वायरस हर साल 4,00,000 इंसानों को संक्रमित करते हैं
    21 Sep 2021
    जानवरों से दूसरों में प्रविष्ठ होने की घटनाओं को देखते हुए कोरोनावायरस से संक्रमण का सबसे अधिक खतरा दक्षिणी चीन, विएतनाम, कम्बोडिया और जावा जैसे क्षेत्रों में है।
  • Railway recruitment
    अभिषेक पाठक
    लोकसभा चुनावों से पहले किया था रेलवे भर्ती का ऐलान, ढाई साल बाद भी एग्ज़ाम का अता-पता नहीं
    21 Sep 2021
    रेलवे की एक भर्ती जिसका रजिस्ट्रेशन हुए 2.5 साल से भी अधिक का वक़्त को चुका है, आज तक उस भर्ती के लिए प्रथम चरण की परीक्षा भी नही कराई जा सकी है।
  • covid
    रिचा चिंतन
    क्या ग़रीब देश अपनी आबादी के टीकाकरण में सफल हो सकते हैं?
    21 Sep 2021
    दक्षिण अफ्रीका में जनता के आक्रोश ने जॉनसन एंड जॉनसन को देश में उत्पादित होने वाले अपने टीके (वैक्सीन) को यूरोप भेजने की बजाए घरेलू उपयोग के लिए ही रखने को मजबूर कर दिया। भारतीय नागरिक समाज ने भी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License