NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
विरोध का कोई स्वर नहीं : भारत की ख़ाली सड़कें किस बात का प्रतीक हैं?
एक राष्ट्रीय आंदोलन निश्चित तौर पर अपनी आहट दे रहा है, सिर्फ़ हाथ में नहीं आ रहा।
अजय गुदावर्ती
04 Dec 2019
विरोध का कोई स्वर नहीं

ऐसा लगता है भारत में एक ऐतिहासिक विडंबना ख़ुद को उजागर कर रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे सारी दुनिया तो बग़ावत के मूड में है, जबकि भारत इस प्रकार के किसी भी अनुभव को हासिल करने के आस-पास भी नहीं है। पिछले कुछ महीनों से, और उससे पूर्व के वर्षों में सड़कों पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों ने लैटिन अमेरिका, अफ़्रीका, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कई देशों को झकझोर कर रख दिया है।

इस तरह के प्रमुख विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत 2010 में मिडिल ईस्ट और मिस्र में हुई थी, जब वहाँ के लोग अपनी निरंकुश सरकारों के ख़िलाफ़, लोकतंत्र की माँग को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, जिसे “अरब का वसंत” के नाम से प्रसिद्धि मिली। यह 2011 में उत्तरी अमेरिका में ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट के ख़ुशनुमा दिनों के दौरान छलक पड़ा, जब न्यूयॉर्क में ज़ुकोटी पार्क को छात्रों, अप्रवासियों, बेरोज़गारों और अन्य लोगों ने कार्पोरेशनों से जवाबदेही की मांग को लेकर अपने क़ब्ज़े में कर लिया था। इसके बाद यह 2013 में ब्राज़ील में फैल गया, जहां इसे ब्राज़ीलियन वसंत या निःशुल्क किराये के लिए आंदोलन का नाम दिया गया। सार्वजनिक परिवहन सेवाओं की क़ीमतों में कमी और सबके लिए बेहतर शिक्षा मुहैया कराने की माँग के रूप में यह एक राष्ट्रव्यापी माँग के रूप में प्रस्तुत हुआ।

एक बार फिर से दुनिया भर के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं, और इनमें से क़रीब-क़रीब सभी माँगें एक जैसी हैं जिन्हें हम नवउदारवादी सुधार के रूप में जानते हैं, के ख़िलाफ़ आयोजित हो रहे हैं। पिछले कुछ महीनों से हमने देखा कि इस जून से चीन के हांगकांग में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं, जिसमें उनका प्रदर्शन नए प्रत्यर्पण क़ानूनों और उनकी स्वायत्तता में की जाने वाली कटौती के विरोध में है। तत्पश्चात मध्य अमेरिका के चिली में सार्वजनिक परिवहन के किराये में बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ और लेबनान में लागू किये गए नए टैक्स के ख़िलाफ़ बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं। इससे काफ़ी पहले, हमने वेनेज़ुएला में मुद्रा के प्रस्तावित विमुद्रीकरण के ख़िलाफ़ हिंसा और सड़कों पर जमकर होते हुए प्रदर्शनों को देखा है।

भारत भी अधिकांशतया इसी तरह के सवालों से जूझ रहा था, लेकिन यहाँ पर इस प्रकार का कोई भी राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा नहीं हो सका। मुद्रा के विमुद्रीकरण (डिमोनेटाइज़ेशन) ने, जिसने छोटे और मझौले उद्यम के क्षेत्र में, जिससे विकास और रोज़गार के अवसरों पर बेहद ख़राब असर डाला है। उल्टा इन उपायों ने वर्तमान सत्ताधारी दल को भरपूर चुनावी फसल उगाहने का काम किया, जबकि एक बार और विचार करें तो भ्रष्टाचार से लड़ने में इसकी सफलता संदेहास्पद रही है। बड़े पैमाने पर लोगों में अभी भी यह भरोसा बना हुआ है कि वर्तमान व्यवस्था और इसके नेतृत्व ने कम से कम ईमानदारी से काले धन और ब्लैक इकॉनमी के ख़िलाफ़ मुहिम तो छेड़ रखी है।

इसी तरह, भारत में बिना किसी विरोध के माल और सेवा कर (जीएसटी) को लागू करने वाले टैक्स सुधारों को लागू किया जा सका है। यहां तक कि राज्य की अन्य क्षेत्रीय सरकारों तक ने इस मुद्दे पर सड़क पर आकर कोई विरोध दर्ज नहीं कराया। अधिकतर वस्तुओं की क़ीमतों में बेतहाशा वृद्धि और उसके फलस्वरूप कारोबार और मुनाफ़े पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के बावजूद, संगठित विरोध का कोई स्वर सुनाई नहीं पड़ा और न ही चुनावी नतीजों के रूप में इसके दुष्परिणाम देखने को मिले हैं।

भारत में कृषि संकट की स्थिति अभूतपूर्व बनी हुई है। तेलंगाना, महाराष्ट्र, बुंदेलखंड, बिहार और मध्य भारत के कुछ हिस्सों सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों में किसानों की आत्महत्या का क्रम जारी है। हालाँकि हमने देखा कि 2019 में आम चुनावों के आस-पास किसानों ने फसल ख़रीद क़ीमतों के सवाल पर और अपने लड़खड़ाते भविष्य के मद्देनज़र विरोध प्रदर्शन आयोजित किये, लेकिन यह ग़ुस्सा भी जल्द ही काफ़ूर हो गया और चुनाव परिणामों पर इनका कोई ख़ास असर देखने को नहीं मिला। हालांकि, ऐसा अनुभव होता है कि इन मुद्दों ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में चुनावी नतीजों पर कुछ असर अवश्य डाला।

इस प्रकार के सड़कों पर विरोध प्रदर्शन की एकमात्र घटना हाल के दिनों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्रों के रूप में प्रकाश में आई है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा प्रस्तावित शुल्क वृद्धि में जबर्दस्त बढ़ोत्तरी के ख़िलाफ़ हाल ही में सड़कों पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन को हमने देखा है। हालांकि यह आंदोलन दिल्ली केन्द्रित ही बना रहा। एक ऐसे दौर में जब मुख्यधारा की मीडिया और ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इस तरह के मुद्दों को क़रीब-क़रीब ब्लैकआउट करने का रिवाज सा है, उसकी तुलना में इस मुद्दे ने चुनिंदा मीडिया समूह का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफलता प्राप्त की है। यह कोई राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन नहीं था, और समाज के अन्य वर्गों या भारत के दूसरे हिस्सों में छात्रों को सड़कों पर लाने में असफल रहा, जैसा कि हमने अतीत में इसे ब्राज़ील में या वर्तमान में हांगकांग में होते देखा है।

भारत, जिसे एक समय नाना प्रकार के सशक्त सामाजिक आंदोलनों के लिए जाना जाता था, आज सत्ता में बैठे लोगों पर किसी भी प्रकार का प्रभाव डाल पाने के लिए जूझ रहा है। आज हमारे पास एक भी ऐसा स्थानीय या क्षेत्रीय स्तर का आंदोलन नहीं है जो सड़कों को झकझोर कर रख दे। हालिया घटनाक्रम में, तेलंगाना में सड़क परिवहन निगम के पचास हज़ार के क़रीब कर्मचारियों को निकाल बाहर किया गया है, और यह आंदोलन भी धूल-धूसरित हो चुका है।

ये सूनी सड़कें किस बात की प्रतीक हैं? क्या वजह है कि किसानों, छात्रों, शहरी और ग्रामीण ग़रीबों, अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्रों के कामगारों, व्यापारियों, आदिवासियों, दलितों सहित अन्य लोगों ने सड़कों पर किये जाने वाले विरोध प्रदर्शनों से ख़ुद को पीछे खींच लिया है? क्या यह भारत में चुनावी राजनीति और लोकतंत्र की विफलता या सफलता की विडंबना को दर्शाता है? विश्व स्तर पर, नवउपनिवेशवाद के चलते ही  दुनिया के विभिन्न हिस्सों में सड़कों पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों ने अपनी भूमिका निभाई है, लेकिन वहीँ भारत हम ऐसा होते नहीं देख पा रहे हैं, इस तथ्य के बावजूद कि भारत भी ठीक उन्हीं वैश्विक आर्थिक नीतियों  को भुगतने के दौर से गुज़र रहा है।

कुछ हद तक इस अकथनीय मनोदशा के लिए एक संभावित स्पष्टीकरण वैश्वीकरण के बाद भारत में बदलती स्थानिक कल्पना में प्रतीत होता है। क्या वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद भारत का स्वरूप अधिक स्थानीय हो गया है, या इसकी वजह यह है कि क्षेत्रीय ताक़तों ने राष्ट्रीय नीतियों पर आंदोलन करने और उस पर अपना प्रभाव डाल सकने की अपनी क्षमता पर भरोसा करना बंद कर दिया है? क्या भारत, अपने “सहयोगी संघवाद” की निरंतर थोथी बयानबाज़ी के बावजूद एक मज़बूत केंद्र और कमज़ोर राज्यों के साथ  कहीं अधिक एकतरफ़ा हो गया है?

राजनीति के मीडियाकरण ने सामाजिक संगठनों को उनके समाज के विभिन्न वर्गों के एजेंडा और संकल्पनाओं को निर्धारित करने की ताक़त को ख़त्म करने का काम किया है। प्रिंट क्रांति के विपरीत भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पूरी तरह से कॉर्पोरेट समर्थक साबित हुआ है, और किसी भी बड़े नरेटिव और संकल्पना को नियंत्रित करने में इसकी भूमिका बेहद ताक़तवर साबित हुई है। इसी तरह, वर्तमान दक्षिणपंथी लोकप्रिय सरकार, लोगों को यह समझाने के प्रयास में सफल रही है कि किसी बड़े संस्थागत-संरचनात्मक बदलाव की प्रक्रिया में दोनों चीज़ें होनी स्वाभाविक हैं। एक तो इसमें समय लगता है और दूसरा यह कि आरंभिक दिनों में इसे लागू करते समय कुछ मुश्किलों का सामना तो करना ही पड़ता है, लेकिन अंत में इसके परिणाम सुखद होने वाले हैं।

इसे आंशिक रूप से प्रतिबिंबित भी होता है, जबकि इसके विपरीत दुनिया के कई अन्य हिस्सों में, संस्थानों के प्रति पूर्ण मोहभंग हो चुका है। संस्थानों के विरुद्ध बढ़ते इस ग़ुस्से को वर्तमान शासक वर्ग ने हड़प लिया है और ख़ुद को इस रूप में प्रोजेक्ट कर रही है जैसे वह इन संस्थानों को दुरुस्त करने में जी-जान से लगी है।

विरोध प्रदर्शनों को इस प्रकार से चित्रित किया जा रहा है जैसे यह अभिजात्य वर्ग के लिए टाइम पास करने का साधन है, और कुछ नहीं। आम लोगों में यह धारणा बनाई गई है कि सत्तारूढ़ दल के साथ बातचीत और विश्वास के आधार पर तमाम मुद्दों को हल किया जा सकता है। "अर्बन नक्सल" के हालिया झूठे नरेटिव को गढ़कर सुधा भारद्वाज, वरवरा राव, शोमा सेन जैसे कई अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं को इन प्रतिकूल सन्दर्भों के तहत जेल में ठूंसने का खेल खेला जा रहा है।

भारत एक अजीब क्षण से गुज़र रहा है, जिसमें भारी असंतोष व्याप्त है लेकिन कोई ग़ुस्सा नहीं फूटता। देश में ग़ैर-बराबरी और इसके साथ-साथ बहुसंख्यक आबादी पर बढ़ती मुश्किलों के दौर में होने के बावजूद विरोध की राजनीति के लिए स्थान नहीं बन पा रही है। क्या इसका अर्थ यह है कि लोकतंत्र में कामकाज के तौर-तरीक़ों को एक बार फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है या लोकतांत्रिक आशाओं और आकांक्षाओं के कमज़ोर बने रहना आने वाले दिनों में प्रासंगिक बना रहेगा।

लेखक जेएनयू के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। यह उनके व्यक्तिगत विचार हैं।

Dissent
democracy
Neoliberal Reform
Discontent
Economic policy
Aspirations
Struggle and protest

Related Stories

भारत में संसदीय लोकतंत्र का लगातार पतन

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

Press Freedom Index में 150वें नंबर पर भारत,अब तक का सबसे निचला स्तर

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

ढहता लोकतंत्र : राजनीति का अपराधीकरण, लोकतंत्र में दाग़ियों को आरक्षण!

लोकतंत्र और परिवारवाद का रिश्ता बेहद जटिल है

किधर जाएगा भारत— फ़ासीवाद या लोकतंत्र : रोज़गार-संकट से जूझते युवाओं की भूमिका अहम

न्यायिक हस्तक्षेप से रुड़की में धर्म संसद रद्द और जिग्नेश मेवानी पर केस दर केस

यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का अमृतकाल है

एलएसआर के छात्रों द्वारा भाजपा प्रवक्ता का बहिष्कार लोकतंत्र की जीत है


बाकी खबरें

  • Mehsi oyster button industry
    शशि शेखर
    बिहार: मेहसी सीप बटन उद्योग बेहाल, जर्मन मशीनों पर मकड़ी के जाल 
    26 Oct 2021
    बिहार के पूर्वी चंपारण के मेहसी स्थित विश्व प्रसिद्ध सीप-बटन उद्योग की मशीनों पर मकड़ी के जाले लग चुके हैं। बिजली की सप्लाई नहीं है। उद्योग यूनिट दर यूनिट बंद हो रहे हैं। इस उद्योग के कारीगर पंजाब-…
  • coal crisis
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोयला संकट से होगा कुछ निजी कंपनियों को फायदा, जनता का नुकसान
    26 Oct 2021
    कोयले के संकट से देश में बिजली की किल्लत हो रही है। इस किल्लत की वजह क्या है? इस संकट से किसको फायदा और किसको नुकसान होगा? जानने के लिए न्यूज़क्लिक ने बात की पूर्व कोयला सचिव अनिल स्वरुप से
  • Biden’s Taiwan Gaffe Meant no Harm
    एम. के. भद्रकुमार
    ताइवान पर दिया बाइडेन का बयान, एक चूक या कूटनीतिक चाल? 
    26 Oct 2021
    अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पिछले गुरुवार को सीएनएन टाउन हॉल में यह कहा है कि अगर चीन ने ताइवान पर हमला किया तो वाशिंगटन उसकी रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है।
  • workers
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: डीबीसी कर्मचारियों का स्थायी नौकरी की मांग को लेकर प्रदर्शन, हड़ताल की चेतावनी दी
    26 Oct 2021
    लगभग 3500 से अधिक कर्मचारी दिल्ली के तीनों नगर निगम में अनुबंध के आधार पर काम कर रहे हैं। राजधानी में डेंगू और अन्य ऐसी महामारी की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद ये ठेके प्रथा के तहत कार्यरत…
  • instant loan
    शाश्वत सहाय
    तत्काल क़र्ज़ मुहैया कराने वाले ऐप्स के जाल में फ़ंसते नौजवान, छोटे शहर और गाँव बने टार्गेट
    26 Oct 2021
    इन ऐप्स के क़र्ज़ वसूली एजेंटों की ओर से किये जा रहे उत्पीड़न के चलते 2020 और 2021 के बीच पूरे भारत में कम से कम 21आत्महत्याएं हुई हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License