NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
विश्व नागरिक मार्क्स और उनके देशज कुटुम्बी
मार्क्स के खिलाफ जब कहने को कुछ नहीं मिलता तब उनके विदेशी होने का "आरोप" उछाला जाता है ।
बादल सरोज
08 May 2018
karl marx

मार्क्स के खिलाफ जब कहने को कुछ नहीं मिलता तब उनके विदेशी होने का "आरोप" उछाला जाता है । 

मजे की बात ये है कि यह बात जर्मनी, जहां वे जन्मे और मार्क्स बने, में भी कही जाती है । हिटलर ने उनके बारे में यही कहा, उसके वंशज भी यही कहते हैं । हाल ही में 5 मई को उनकी 200 वी सालगिरह पर उनके जन्मस्थान ट्रियेर में उनकी मूर्ति लगाने की बात उठी तो वहां भी यही बात कही गयी । बाद में ट्रियेर म्युनिसिपल कौंसिल ने 42 - 11 के बहुमत से यह मूर्ति लगाना स्वीकार किया ।
कमाल की बात ये है कि यह बवाल सबसे ज्यादा वे ही उठाते है जिनके खुद के कुलगोत्रों का या तो अतापता नहीं है या लापता है या जो पता है उसको बताने में उन्हें संकोच होता है ।

मुसोलिनी से नेकर, हिटलर से ध्वज प्रणाम और फासिस्टों से अफ़वाह पारंगतता, संगठन शैली और नाज़ियों से बर्बरता लेकर आये शुद्द अभारतीय संघी भी मार्क्स के बारे में यही प्रलाप करते हैं । ये वे ही बटुक हैं जो इन दिनों भारत की हर सम्पदा को विदेशियों को सौंपने, भारत की संपत्तियों को लूटने वालों को विदेशों में बसाने और कभी अमरीका तो कभी पाकिस्तान के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास के "पुण्य कर्म" में लगे हैं । 

विज्ञान, तकनीक, विचार मनुष्यता की खोज है । उसकी कोई भौगौलिक सीमा हुयी होती तो सोचिये जीवन, उत्पादन, शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर उद्योग, व्यापार, परिवहन, संचार आदि इत्यादि मामलों में कहाँ होती दुनिया और हम । 
देश और परदेस की गुहार लगाने वाले पूँजी की वैश्विकता पर बल्ले बल्ले और बदलाव के विचार पर पासपोर्ट वीजा की गुहार लगाकर अपना पाखण्ड और अज्ञान खुदई उजागर कर देते हैं ।  संस्कृत में श्लोक है ;

"विद्वत्वंच नृपत्वंच नैव तुल्यं कदाचन ।

स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ।।"

मोटा भावार्थ है विद्वत्ता और राजत्व की तुलना कभी नहीं हो सकती ।

राजा सिर्फ अपने देश में पूजा जाता है । किन्तु विद्वान् सभी जगह सम्मान पाता है । इस मायने में जितने बड़े विश्वनागरिक कार्ल मार्क्स हैं उतना बड़ा कोई और शख्स नहीं है।

मार्क्स के देशज कुटुम्बी 

मार्क्स के वैचारिक कुटुम्बी दुनिया भर में हैं ; भारत में भी हैं।

मार्क्स ने कोई आविष्कार नहीं किया था । उन्होंने सिर्फ खोज की थी । अनुसंधान किया था । उन्होंने इस सन्दर्भ में स्वयं को द्वंदवाद के लिए हीगेल, भौतिकवाद के लिए फायरबाख का ऋणी बताया है जो बकौल मार्क्स "सर के बल खड़े थे उन्हें पैरों के बल खड़ा किया गया है ।" अपनी तीसरी खोज अतिरिक्त मूल्य के सिध्दान्त के लिये उन्होंने इंग्लैंड के कारखानों के अनेक मजदूरों, मजदूर नेताओं को श्रेय दिया है । जिन्होंने तथ्य जुटाने में उनकी मदद की ।

यह संयोग था कि मार्क्स यूरोप में जन्मे । उन्हें जो दार्शनिक परम्परा सहज उपलब्ध हुयी वह ग्रीक-रोमन, जर्मन, फ्रांसीसी और आंग्ल थी । यदि वे पृथ्वी के पूरब में जन्मे होते तो स्थिति शायद कुछ और ही होती , जैसे ;
द्वंद्वात्मकता Dialectics के लिए उन्हें हीगेल के पास नहीं जाना पड़ता । भ्रूण रूप में वह उन्हें बुद्द के क्षणिकवाद और प्रतीत्य समुत्पाद और पुरानी वस्तु से नयी बनने तथा निरंतर अस्तित्व में आने की प्रक्रिया के सिद्दांत में मिल जाता। वर्धमान महावीर के संशयवाद में मिल जाता ।
भौतिकवाद तो उन्हें पर्याप्त प्रचुरता में पूरब के दार्शनिकों में मिल जाता। अध्यात्मवाद के आधुनिक थोक विक्रेता डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के शब्दों में " भारत का भौतिकवादी दर्शन अत्यंत प्राचीन है, यह उतना ही प्राचीन है जितना भारतीय दर्शन, यह काफी विकसित भी था - विज्ञान की तात्कालिक सीमाओं से काफी आगे बड़ा हुआ था ।"

जैसा कि कुछ धूर्त समझाते हैं और मूर्ख मानते हैं : भौतिकवाद का मतलब उपभोक्तावाद, देहसुख, भोगविलास या 'ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत'नहीं होता। यह सब तो पतित पूँजीवाद में होता है । जिसे वह आध्यात्म के झीने पर्दे और आसारामों की अक्षौहिणी सैनाओं से ढांपने की कोशिश करता है ।
दर्शन की भाषा में भौतिकवाद का अर्थ है भौतिक जगत और पदार्थ को सत्य मानना । उसे किसी अज्ञात और अदृश्य, अबूझ और रहस्यमयी शक्ति द्वारा रचा गया नहीं मानना। यह मानना कि मूल में पदार्थ है बाकी सब उसके भिन्न भिन्न रूप । भारतीय दर्शन मुख्यतः इस तरह से सोचने वालों का ही है । लोकायत, वैशेषिक, न्याय, सांख्य, बुद्द, जैन सहित बहुमत इसी विचार का है । 

इनमे से कुछ ही का जिक्र करें तो ; 

ई.पू. 6ठी शताब्दी के कपिल ऋषि कहते हैं "जीवन, शक्ति, विचार, चेतना की उपज पदार्थ से हुयी ।"  ई.पू. 6 से 10वी सदी के बीच हुये कणाद ऋषि कहते हैं "संसार अस्तित्वमान है । यह छोटे छोटे कणों (अणु, परमाणुओ) से मिलकर बना है ।" यह डेमोक्रेटस से भी बहुत पहले की बात है । ऋषि गौतम अक्षपाद कहते हैं "तार्किक प्रमाणों के जरिये ही ज्ञान तक पहुंचा जा सकता है । " ऋग्वेद के परमगुरु बृहस्पति  कहते हैं कि "पदार्थ परमसत्य है । मृत्यु के बाद जीवन नहीं होता ।" गीता में कृष्ण ने जिन्हें सबसे बड़ा ऋषि बताया है वे भृगु और भी बेबाक तरीके से कहते हैं : "पदार्थ परमसत्य है । सभी की उत्पत्ति पदार्थ से हुयी है । देवताओं को खुश करने के लिए कर्मकाण्ड और बलि मूर्खता है ।" श्वसनवेद उपनिषद कहता है : "पदार्थ सत्य है । संसार से परे कुछ भी नहीं है, न नर्क न स्वर्ग । प्रकृति ही नियन्ता है प्रकृति ही संहारक ।"

चाणक्य  के मुताबिक़ लोकायत (और चार्वाक) भारत के सर्वप्रथम दर्शनों में से एक है । उनकी हिदायत थी कि राजा को लोकायत और सांख्य अवश्य पढ़ने चाहिए ।

आदि वैद्य चरक कहते हैं ; " जीवन प्राथमिक तत्वों के विशिष्ट योग का परिणाम है । मनुष्य समय की उपज है और विभिन्न तत्वों के उचित सम्मिश्रण का परिणाम है ।" और यह भी कि "सत्य वही है जिसे सिध्द किया जा सके ।" 
रामायण में जाबालि-राम संवाद, महाभारत में भीष्म-युधिष्ठिर और भीष्म-द्रौपदी संवाद इसी धारा के प्रवाह हैं ।  उदाहरण भर के लायक उल्लेख किये जा रहे हैं - यह सतत प्रवाह है। 
मार्क्स भौतिकवाद के लिए फायरबाख से पहले इन सब के पास आते । 

मार्क्स को, बिना जाने, ठुकराने का मतलब इन सब को ठुकराना और नकारना है । विश्व भर के अपने पुरखों की सोचने समझने की  काबलियत का अपमान और अपने "देशज" दर्शन की गौरवशाली विरासत को धिक्कारना है ।

अलबत्ता पोलिटिकल इकॉनोमी (राजनीतिक अर्थशास्त्र) के लिए मार्क्स को लन्दन ही जाना पड़ता । क्योंकि रेगिस्तान में बैठकर समंदर की लहरों की शक्ति से बिजली नहीं बनाई जा सकती।  आधुनिक पूंजीवादी औद्योगिक अर्थव्यवस्था तब तक वहीँ थी ।

Karl Marx
capitalism

Related Stories

वित्त मंत्री जी आप बिल्कुल गलत हैं! महंगाई की मार ग़रीबों पर पड़ती है, अमीरों पर नहीं

मज़दूर दिवस : हम ऊंघते, क़लम घिसते हुए, उत्पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे

एक महान मार्क्सवादी विचारक का जीवन: एजाज़ अहमद (1941-2022)

आर्थिक असमानता: पूंजीवाद बनाम समाजवाद

क्यों पूंजीवादी सरकारें बेरोज़गारी की कम और मुद्रास्फीति की ज़्यादा चिंता करती हैं?

पूंजीवाद के अंतर्गत वित्तीय बाज़ारों के लिए बैंक का निजीकरण हितकर नहीं

क्या पनामा, पैराडाइज़ व पैंडोरा पेपर्स लीक से ग्लोबल पूंजीवाद को कोई फ़र्क़ पड़ा है?

मानवता को बचाने में वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं के बाहर भी एक राजनीतिक भूमिका है

हम, अपने लिए, शासकों द्वारा निर्धारित भविष्य से इनकार करते हैं : कार्ल मार्क्स जयंती पर विशेष

वीरा साथीदार के दो साथी—अंबेडकर और मार्क्स


बाकी खबरें

  • cartoon
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    नया ज्ञान : 2014 में मिली असली आज़ादी!
    21 Nov 2021
    वैसे कंगना ठीक ही कह रहीं हैं। किसी भी सरकार को इतनी आज़ादी आज से पहले, 2014 से पहले कभी भी नहीं मिली थी जितनी 2014 में बनी इस सरकार को मिली हुई है।
  • kisan andolan
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'आसमान में धान जमेगा!'
    21 Nov 2021
    किसान आंदोलन की पहली जीत के मौक़े पर इतवार की कविता में आज पढ़िये रमाशंकर यादव 'विद्रोही' की कविता 'नई खेती...
  • Kashmir
    अनीस ज़रगर
    हैदरपुरा मामला : कश्मीर में शटडाउन के बीच तीसरे निवासी के शव की मांग तेज़
    21 Nov 2021
    मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ और मसर्रत आलम के नेतृत्व में हुर्रियत समूहों द्वारा की गई हड़ताल के मद्देनज़र सभी दुकानें, कार्यालय और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद रहे। हुर्रियत समूहों ने हैदरपुरा घटना के पीड़ितों के…
  • kisan andolan
    अजय कुमार
    कृषि क़ानूनों के वापस होने की यात्रा और MSP की लड़ाई
    21 Nov 2021
    कृषि क्षेत्र में सुधार होने चाहिए। लेकिन तीन कृषि कानून कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए नहीं बल्कि कृषि क्षेत्र को गुलाम बनाने के लिए लाए गए थे। 
  • Putin
    एम. के. भद्रकुमार
    तूफ़ान के केंद्र में यूक्रेन और बेलारूस
    21 Nov 2021
    काला सागर में टकराव के घुमड़ते काले बादलों के बीच आशा की चमकती किरण यह है कि मास्को एवं वाशिंगटन के बीच रणनीतिक संवाद-संचार फिर से शुरू हो गया है तथा विभिन्न कार्य स्तरों पर उनमें आदान-प्रदान हो रहा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License