NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
लैटिन अमेरिका
लैटिन अमेरिका दर्शा रहा है कि दक्षिणपंथी उभार स्थायी नहीं है
क्या चिली के चुनाव में वामपंथ की जीत टर्निंग प्वाइंट साबित होगी?
बी. सिवरामन
23 Dec 2021
Gabriel Boric

"चिली के मतदाता एक भयानक गलती की कगार पर हैं" 20 नवंबर 2021 को चींख कर कह रहा था वैश्विक पूंजीवाद की प्रमुख पत्रिका इकोनॉमिस्ट, का संपादकीय। यदि हम उनके वर्ग दृष्टिकोण को अलग रखें, तो अर्थशास्त्र की इस पत्रिका की आशंका बिल्कुल सही निकली, पर ठीक एक महीने बाद। 20 दिसंबर 2021 को, 35 वर्षीय युवा वामपंथी और पूर्व छात्र नेता गेब्रियल बोरिक को चिली के राष्ट्रपति चुनावों में विजेता घोषित किया गया।

बोरिक की जीत का बड़ा राजनीतिक महत्व है। जहां वामपंथ का उदय इस सदी के पहले दशक तक जारी रहा, वहीं पिछले दस वर्षों में दक्षिणपंथ का उदय हुआ। लेकिन चिली के चुनाव परिणाम से पता चलता है कि दक्षिणपंथी उभार स्थायी नहीं है, खासकर लैटिन अमेरिका में। बोरिक अन्य क़द्दावर वामपंथी नेताओं-वेनेजुएला के दिवंगत ह्यूगो शावेज, ब्राजील के लूला डी सिल्वा, बोलीविया के इवो मोरालेस, इक्वाडोर के राफेल कोरिया और यहां तक ​​​​कि मैक्सिको के कुछ हल्के मध्य-वाम (left-of-centre) ओब्रेडोर के रैंक में शामिल हो गए। यह जीत दोहराती है कि महाद्वीप में वामपंथी जीत, जिसे ‘पिंक टाइड’ के नाम से जाना जाता है, हमेशा के लिए खत्म नहीं हुई थी। उतार-चढ़ाव जारी रहता है। विश्लेषक इस बार ज्वार के पलटने के अलग-अलग कारण बता रहे हैं। कई लोग इसे नवउदारवाद के संकट के परिणाम के रूप में देखते हैं।

नवउदारवाद का संकट

लैटिन अमेरिका में एक देश के बाद दूसरे ने ट्रम्प युग के दौरान दक्षिणपंथ का उदय देखा। ब्राजील में बोल्सोनारो की जीत उनमें सबसे प्रमुख थी। ट्रंप जैसे चरित्र वाले, इनमें से अधिकतर नेता दक्षिणपंथी पॉपुलिस्ट थे। दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद (populism) की विशेषताएं हैं- एक करिश्माई नेता जिसके करिश्मे को कॉर्पोरेट मीडिया एक " सशक्त व्यकित्व " सिंड्रोम (Strong man syndrome) बनाने के लिए जानबूझकर  प्रयासरत रहता है, मीडिया के बड़े हिस्से का एकमुश्त खरीद लिया जाना, लोकतंत्र और भ्रष्टाचार-विरोधी, शासन-विरोधी जनोत्तेजक भाषणों का सिलसिला, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सर्वसत्तावादी प्रतिबंधों और संगठित राजनीतिक विरोध के खिलाफ विच-हंट, चुनावी प्रक्रिया को खण्डित करना, आदि। इसके साथ ही मतदाताओं को उदार रियायतें, बड़े घोटाले और कॉरपोरेट्स व बहुराष्ट्रीय कंपनियों को उदार रियायतें आदि-यह सब हमारे लिए काफी जाना पहचाना सा है।

चिली में ही पिछले चुनाव में सेंटर-राइट सेबेस्टियन पिनेरा सत्ता में आए थे। कोलंबिया में दक्षिणपंथी अर्धसैनिक सतर्कता समूह(vigilante groups) फल-फूल रहे थे। वे सैंटोस की दक्षिणपंथी सरकार के प्रमुख समर्थक स्तंभ थे। जून 2021 में वामपंथी पेड्रो कैस्टिलियो की हालिया जीत तक, पेरू दक्षिणपंथी शासनों के अधीन था। लैटिन अमेरिका में नव-दक्षिणपंथ दरअसल उदारवाद और लोकलुभावनवाद का एक अजीबोगरीब मिश्रण है।

रूढ़िवादी चर्च से समर्थन प्राप्त करते हुए, उन्होंने गर्भपात के अधिकारों और एलजीबीटीक्यू अधिकारों का विरोध किया और उदारीकरण, नजीकरण  व अमरीका-परस्ती के नव-उदारवादी एजेंडे को बढ़ावा दिया। लेकिन दक्षिणपंथी शासन और उनके नव-उदारवादी स्तम्भ लोगों की समस्याओं का समाधान करने में बुरी तरह विफल रहे। लैटिन अमेरिका दर्शाता है कि दक्षिणपंथी दलों और नेताओं द्वारा जन चेतना में राजनीतिक हेरफेर केवल अल्पकालिक हो सकता है। सत्ता में लोकलुभावनवाद का अर्थ है आज नहीं तो कल राजनीतिक आत्महत्या !और महामारी ने केवल नवउदारवाद के संकट को बढ़ा दिया है। अकेले पेरू में, 3.3 करोड़ की आबादी में से 1,84,000 लोग महामारी के कारण मरे और ब्राजील में मरने वालों की संख्या 6.18 लाख थी।

इस जटिल संकट ने लोकप्रिय प्रतिरोध के द्वार खोल दिए। ब्राजील में महामारी का संकट सबसे गंभीर था। वहां 2 अक्टूबर 2021 को बोल्सोनारो के खिलाफ लाखों लोगों की विशाल विरोध रैली हुई। शासन ने काउंटर-रैलियों का आयोजन किया, जिससे गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई। इस तरह के लोकप्रिय विरोधों के बल पर, इक्वाडोर के अलावा पेरू, अर्जेंटीना सहित कई देशों में वामपंथी दल राजनीतिक रूप से बढ़ रहे हैं।

यदि फासीवादी और सर्वसत्तावादी ताकतें लोकतंत्र और उसकी चुनाव प्रक्रिया का उपयोग करके सत्ता में आती हैं, तो लैटिन अमेरिका यह भी दर्शाता है कि सर्वसत्तावादी पॉपुलिस्ट नेताओं को उसी चुनावी प्रक्रिया से हटाया भी जा सकता है। उन्हें केवल सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से उखाड़ फेंकने की ज़रूरत नहीं होती।

द न्यू पॉपुलर लेफ्ट

1998 में वेनेजुएला में ह्यूगो शावेज की जीत से शुरु करते हुए, लोकप्रिय-वाम गठबंधन के वामपंथियों ने 2002 में ब्राजील में, 2003 में अर्जेंटीना में, 2004 में उरुग्वे में, 2005 में बोलीविया में और 2006 में चिली में राष्ट्रपति के रूप में जीत हासिल की। ​फिर दक्षिणपंथी जीत का एक लंबा दौर चला। अब लैटिन अमेरिकी वामपंथियों ने इस प्रवृत्ति को फिर से उलटना शुरू कर दिया है।

नया लैटिन अमेरिकी वामपंथ, जो दक्षिणपंथ की जगह ले रहा है, की प्रकृति क्या है? वे मोटे तौर पर लोकप्रिय-वामपंथी प्रकृति का है। इसका मतलब यह है कि जहां इसमें मुख्य रूप से लोकप्रिय जन आन्दोलनों की ताकतें शामिल हैं- जैसे मजदूर वर्ग, छात्र-युवा, महिला और किसान व ग्रामीण श्रमिक आंदोलन वहीं वे सत्ता-संस्थान के उदारवादियों के एक बड़े हिस्से को भी शामिल किये हुए हैं। नागरिक समाज भी चुनावी अर्थों में राजनीतिक हो गया है और रणनीतिक रूप से वाम दलों के साथ गठबंधन किया है। इस अर्थ में, लोकप्रिय-वामपंथी ताकतें समाजवाद को तत्काल एजेंडा के रूप में पेश नहीं करती हैं और न ही समाजवादी विकल्प का प्रस्ताव रखती हैं। अधिक-से-अधिक वे केवल रैडिकल मध्य वामपंथी (radical left-of-centre) एजेंडा का प्रस्ताव करते हैं, जो कि रैडिकल सामाजिक-लोकतंत्र (social democracy) की तुलना में वामपंथ का थोड़ा कमज़ोर संस्करण है। दूसरे शब्दों में, लैटिन अमेरिकी वामपंथ के पास पूंजीवाद-विरोधी कार्यक्रम का केवल एक सीमित संस्करण था। केवल कुछ खास मामलों में ही वेनेज़ुएला या बोलीविया में खदानों या तेल संपदा का राष्ट्रीयकरण हुआ था।

सशस्त्र संघर्ष कर रहे सशस्त्र समूह भी धीरे-धीरे इस रास्ते पर जा रहे हैं, जैसा कि कोलंबिया के एफएआरसी के मामले में देखा जा सकता है जिसने शांति समझौते में प्रवेश किया है। ज्यादातर मामलों में, वामपंथी विपक्ष लोकप्रिय आंदोलनों में जन्म लेता है। ह्यूगो शावेज एक मजदूर नेता थे। गेब्रियल बोरिक और राफेल कोरिया पूर्व छात्र नेता थे। और ज्यादातर मामलों में, विपक्षी आंदोलनों और ग्रुपों का एक इंद्रधनुषी समूह लोकप्रिय मोर्चों का निर्माण करने के लिए एक साथ आता है। लूला ब्राजील में पीटी नामक एक लोकप्रिय मोर्चे के प्रमुख के रूप में सत्ता में आए। अपने सामान्य तनावों के बावजूद, वामपंथ की गठबंधन-राजनीति लैटिन अमेरिका में एक ‘सक्सेस स्टोरी’ साबित हुई है, यहां तक ​​कि दुनिया के बाकी हिस्सों के लिए भी लोकप्रिय मोर्चे की राजनीति के लिए एक मॉडल बन गई है।

वामपंथ के सामने चुनौतियां

दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद (populism) को अक्सर वाम लोकलुभावनवाद द्वारा काउंटर किया जाता है। वे अल्पकालिक पॉपुलिस्ट वादों और भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलनों पर आधारित हैं, लेकिन एक समग्र संक्रमणकालीन (transitional) कार्यक्रम पर नहीं जो वैकल्पिक अर्थव्यवस्था के लिए निरंतर लोकप्रिय बैकिंग की गारंटी दे सके। एक बार सत्ता में आने के बाद, लोकप्रिय वामपंथ को अर्थव्यवस्था के स्थायीकरण की भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अर्थव्यवस्था को स्थिर करने और पूंजी को आकर्षित करने के लिए नव-उदारवादी समझौते करने के लिए भी मजबूर किया जाता है। इन वामपंथी शासनों के लिए बड़े पैमाने पर राजनीतिक विरोध निर्मित करने हेतु संयुक्त राज्य अमेरिका से भारी धन प्रवाहित होता है। जबकि ईवा मोरालेस को उनके द्वारा जीते गए चुनाव में विजय से वंचित कर दिया गया था, लोकप्रिय लूला को भ्रष्टाचार के कुछ झूठे आरोपों के आधार पर राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने की अनुमति नहीं दी गई थी। कुछ लोकप्रिय वामपंथी शासन चुनाव हार भी गए हैं। यह वामपंथी लोकलुभावनवाद की स्थिरता और स्थायित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है।

लैटिन अमेरिका में राजनीतिक परिवर्तन- भले ही किसी भी दिशा में हो- उथला है। दक्षिणपंथी शासन युद्ध के बाद के यूरोप की भांति तीव्र पूंजीवादी विकास में सफल नहीं हो पा रहे हैं। वामपंथी सत्ता में रहते हुए भी पूंजीवाद विरोध को गहरा करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। वेनेजुएला एक अपवाद बना हुआ है। स्व-संगठित श्रमिकों की सहकारी समितियों के रूप में स्वर्गीय ह्यूगो शावेज द्वारा स्थापित किए गए दूरगामी सुधार अभी भी जीवित हैं और उनके उत्तराधिकारी के सेंट्रिस्ट झुकाव के बावजूद उन्हें उलटा नहीं जा सकता है। फिर भी, लैटिन अमेरिका में समग्र राजनीतिक गतिरोध ने कई दिलचस्प बहसों को जन्म दिया है। विश्व बैंक और आईएमएफ जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के नवउदारवादी एजेंडे के साथ आंशिक रूप से समझौता करना है या नहीं और अमेरिकी साम्राज्यवाद के राजनीतिक विरोध को व्यावहारिक रूप से कम करना है या नहीं, इस पर बहस चल रही है। पारिस्थितिक-समाजवाद (eco socialism) और रैडिकल नारीवाद मूल निवासियों (indigenous people) के अधिकारों के लिए आंदोलन भी जोर पकड़ रहे हैं। जबकि लोकप्रिय-वाम मोर्चों की राजनीति मार्क्सवाद द्वारा निर्देशित नहीं है, मार्क्सवादी प्रेरणा के विभिन्न रंगों के तहत काम करने वाले इन मोर्चों में से अधिकांश में वह प्रभावशाली घटक है। वामपंथियों की चुनावी जीत के साथ-साथ निरंतर लोकप्रिय लामबंदी भी जारी है। कुछ मौकों पर चुनावी हार के बावजूद, वे पुनर्वापसी में सफल रहे हैं।

सीआईए समर्थित तख्तापलट के जरिये एलेंडे के हिंसक रूप से उखाड़ फेंके जाने के लगभग साढ़े चार दशक बाद चिली के वामपंथी इतिहास रच रहे हैं। आइए देखते हैं कि क्या यह पूरे लैटिन अमेरिकी वामपंथ के लिए स्थिरीकरण और गहनता (stabilization and deepening) के एक नए एजेंडे की शुरुआत करता है।

Gabriel Boric
Chile
José Antonio Kast
Elections
democracy
Latin America
Left politics

Related Stories

झारखंड-बिहार : महंगाई के ख़िलाफ़ सभी वाम दलों ने शुरू किया अभियान

और फिर अचानक कोई साम्राज्य नहीं बचा था

दुनिया भर की: कोलंबिया में पहली बार वामपंथी राष्ट्रपति बनने की संभावना

भारत में संसदीय लोकतंत्र का लगातार पतन

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

केवल विरोध करना ही काफ़ी नहीं, हमें निर्माण भी करना होगा: कोर्बिन

लैटिन अमेरिका को क्यों एक नई विश्व व्यवस्था की ज़रूरत है?

Press Freedom Index में 150वें नंबर पर भारत,अब तक का सबसे निचला स्तर

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

ढहता लोकतंत्र : राजनीति का अपराधीकरण, लोकतंत्र में दाग़ियों को आरक्षण!


बाकी खबरें

  • J&K delimitation
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    जम्मू-कश्मीर परिसीमन : जम्मू में 6, कश्मीर में 1 विधानसभा सीट बढ़ाने के मसौदे पर राजनीतिक दलों का विरोध
    21 Dec 2021
    विपक्षी दलों ने आयोग पर आरोप लगाया कि वो बीजेपी के राजनीतिक एजेंडे को उसकी सिफ़ारिशों के तहत तय करने की अनुमति दे रहा है।
  • data protection
    विकास भदौरिया
    डेटा संरक्षण विधेयक की ख़ामियां और जेपीसी रिपोर्ट की भ्रांतियां
    21 Dec 2021
    विधेयक और संयुक्त संसदीय समिति की सिफारिशें कई समस्याओं से घिरी हुई हैं, और उनमें से कुछ सिफारिशें तो राज्य को निगरानी शक्ति के साथ  लैस कर रही हैं, जो गंभीर चिंताओं को विषय है।
  • sansad march
    भाषा
    गृह राज्यमंत्री टेनी की बर्ख़ास्तगी की मांग : विपक्ष ने निकाला मार्च 
    21 Dec 2021
    विपक्षी दलों के नेताओं एवं सांसदों ने यहां संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने से मार्च शुरू किया और विजय चौक तक गए। इस मार्च में राहुल गांधी, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन…
  • Growing economic inequality in India
    डॉ. राजू पाण्डेय
    भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता : जाति और लैंगिक आधार पर भी समझने की ज़रूरत
    21 Dec 2021
    जहाँ तक भारत का संबंध है यहाँ आर्थिक गैरबराबरी के लिए केवल वितरण की असमानता को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। जाति प्रथा और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक कुरीतियां तथा श्रम बाजार में जातिगत भेदभाव वे कारक…
  • job advertisement
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड: असिस्टेंट प्रोफेसर पदों पर भर्ती की शर्तों का विरोध, इंटरव्यू के 100 नंबर पर न हो जाए खेल!
    21 Dec 2021
    इन पदों के लिए आवेदन करने वाले सैकड़ों अभ्यर्थियों ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को एक ज्ञापन भेजा है। इसमें नियुक्ति का आधार एपीआई और साक्षात्कार बनाए जाने को नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License