NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अमित शाह के मनोनयन से कौन खुश है?
वीरेन्द्र जैन
05 Feb 2016
अमित शाह के अध्यक्ष के रूप में मनोनयन को भले ही निर्वाचन कहा जा रहा है किंतु इस चयन समारोह का जो दृष्य सूचना माध्यमों ने दिखलाया है, उसके अनुसार तो उक्त अवसर पर उपस्थित भीड़ किसी शोक सभा में आये लोगों की तरह थी। एक अखबार के अनुसार यह बिहार में होने वाली जबरिया शादी की तरह का आयोजन था, जिसमें सब कुछ बन्दूक की नोक पर हो रहा था और कहीं कोई खुशी की लहर नहीं थी। न तो परिवार के बुजुर्ग उपस्थित थे और न ही सगे नाते रिश्तेदार। सब के सब या तो मजबूर थे या दर्शक थे जो जली कटी टिप्पणी कर रहे थे। जो किराये के नाचने वाले कथित कार्यकर्ता के रूप में भांगड़ा जैसा कुछ करने आये थे उनके बारे में फुसफुसाहट थी कि इन लोगों को बिहार के चुनावों के बाद नृत्य के लिए बुक किया गया था किंतु अवसर न आने के कारण उसी भुगतान पर अब बुला लिया गया है। बाहर वालों के लिए जो वीडियो स्क्रीन लगायी गयी थी उस पर किसी ने “जरा याद करो कुर्बानी” लगा दिया तो वह “ जो लौट के घर न आये”बजने तक ही बज सका क्योंकि किसी ने उसे रुकवा दिया था। उस रोक का कारण भी बाहर वालों को यही समझ में आया कि मार्गदर्शक मण्डल में से अडवाणी, जोशी, शांताकुमार, किसी के भी न आने के कारण कहीं उसका गलत अर्थ न निकाला जाये।
 
हिन्दी का एक प्रमुख अखबार तो लिखता है कि- भाजपा की सदस्यता भले अमित शाह के पिछले कार्यकाल के बाद से पांच गुना बढी हो, पर उत्साह और लोकप्रियता दुगनी घटी है। ये हम नहीं वहां मौजूद जुबानें कह रही थीं।  
 
अमित शाह भाजपा के कभी भी राष्ट्रीय नेता नहीं रहे और अध्यक्ष बनने से पहले राष्ट्रीय स्तर पर उनकी नेकनामी नहीं अपितु बदनामी ही सामने आयी थी। वे केवल नरेन्द्र मोदी के सर्वाधिक विश्वासपात्र के रूप में जाने गये थे और इसी गुण के कारण इस पद पर बैठाये गये थे। वे मोदी की लोकप्रियता व उनमें पैदा हुए विश्वास के कारण ही सहन भी कर लिये गये थे। परोक्ष में वे मोदी के क्लोन के रूप में ही स्वीकार किये गये थे। चुनावों में सफलता मिलने के भले ही विभिन्न कारण रहे हों किंतु मोदी ने उसका श्रेय श्री शाह के प्रवन्धन को दिया था, जिससे उनका कद भी बढ गया था। पिछले दिनों दिल्ली, बिहार के विधानसभा चुनावों में तथा विभिन्न उपचुनावों और पंचायत नगर निकाय आदि चुनावों में मिली पराजय के बाद उनकी प्रचारित चमक कम हो गयी, या कहें कि कलई उतर गयी। इसका परिणाम यह हुआ कि पहले वे झेल लिये गये थे किंतु अब थोपे हुए लग रहे हैं।
 
इसी दौरान मोदी की लोकप्रियता के ग्राफ में जबरदस्त गिरावट आयी और मंहगाई, आतंक, मन्दी, साम्प्रदायिकता, समेत अनेक गैर जिम्मेवार नेताओं के बेहूदे बयानों के कारण मोदी की छवि भी लगातार धुँधली होती गयी। भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण शौरी ने तो इसे मनमोहन प्लस काऊ की सरकार कह कर यह बता दिया कि किसी भी  मामले में मोदी की सरकार मनमोहन सिंह सरकार से भिन्न नहीं है अपितु इसमें कुछ कमियां हैं। इसके बाद भले ही मोदी ने अपने विश्वासपात्र अमित शाह को दुबारा अध्यक्ष बनवाने में अपनी विशिष्ट स्थिति का प्रयोग कर पार्टी की कमान अपने पास ही रखी हो किंतु ऐसा करके उन्होंने पुराने भाजपा कार्यकर्ताओं के भरोसे को कम किया है।
 
अब भाजपा एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जब उसके कार्यकर्ताओं को लग रहा है कि उनकी सेवाओं की कोई कीमत पार्टी की निगाहों में नहीं रही और उनका भविष्य मोदी की मर्जी पर निर्भर है। वे सरकार और संगठन दोनों में ही अपनी मर्जी चलाने में समर्थ हो गये हैं और चुनाव जिताने की उनकी क्षमता निरंतर घट रही है। मार्ग दर्शक मंडल के अडवाणी, जोशी, शांताकुमार अपने समर्थकों समेत तो वैसे भी असंतुष्ट थे, राम जेठमलानी, अरुण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, भोला सिंह, आदि मुखर हो चुके हैं। सुषमा स्वराज, वसुन्धरा राजे, शिवराज सिंह चौहान, तो अपनी कमजोरियों के कारण चुप हैं किंतु शिव सेना, पीडीपी, और अकालीदल सहयोगी दल होने के बाद भी बड़े भाई की तरह व्यवहार करते रहे हैं। गुजरात में हर्दिक पटेल के नेतृत्व वाले पटेलों के आन्दोलन ने चौंकाया है वहीं मोदी के विरोधी संजय जोशी पुनः सक्रिय हो चुके हैं। गैर जिम्मेवार बयान देने वाले संघ के राममाधव पार्टी में अपनी विशिष्ट स्तिथि बनाये हुये हैं। राकेश सिन्हा जैसे संघ प्रवक्ताओं को टीवी चैनलों पर समानांतर रूप से भेजा जाता है जो कभी कभी भाजपा प्रवक्ताओं के लिए असहज स्तिथि पैदा कर देते हैं। 
 
सुब्रम्यम स्वामी जैसे महात्वाकांक्षी नेताओं को भाजपा में सम्मलित करके जो भूल की जा चुकी है वह ‘उगलत निगलत पीर घनेरी’ वाली स्थिति पैदा कर रही है। वे चतुर सुजान हैं, निर्भीक हैं, मुँहफट हैं, और कुंठित हैं। वे कभी भी किसी को भी संकट में डाल सकते हैं, जैसे राफेल विमान सौदौं के प्रारम्भ में बयान देकर डाल चुके हैं। पठानकोट हमले से मोदी की लाहौर कूटनीति फेल हो गयी है। सुब्रम्यम स्वामी, कीर्ति आज़ाद को मिले नोटिस का जबाब देने, और अरुण जैटली के विपक्ष में दिखने का संकेत देकर अरविन्द केजरीवाल की परोक्ष मदद कर चुके हैं। मोदी ने आसाराम को भाजपा परिवार का समर्थन नहीं मिलने दिया था किंतु स्वामी की वकालत ने मोदी के प्रयास को चुनौती दी है।
 
इमरजैंसी में कम्युनिष्ट, सोशलिस्ट समेत संघ के लोग भी जेल भेजे गये थे किंतु क्षमा मांग कर वापिस आने वाले केवल संघ के लोग ही थे। इसके बाद भी उस जेल यात्रा को सर्वाधिक भाजपा ने ही भुनाया और अपने राज्यों में मीसा बन्दियों की पेंशन बाँध ली। इमरजैन्सी को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबन्ध के रूप में देखा गया था। अब इमरजैन्सी नहीं घोषित की गयी है फिर भी सबके मुँह सिले हुए हैं, वे असंतुष्ट हैं किंतु फिर भी कुछ नहीं बोल रहे हैं। शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आज़ाद से भाजपा के बहुत सारे लोग सहमत हैं किंतु आवाज़ किसी के भी मुँह से नहीं निकल पा रही है। एक साल बाद पश्चिम बंगाल, केरल, असम, उत्तरप्रदेश आदि के चुनाव हैं जहाँ पर उनकी जीत की सम्भावनाएं कम हैं। इन राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद क्या भाजपा में दमित लोगों का स्वर निकल सकेगा? यदि स्वर फूटा तो अमित शाह को जाना होगा, और नहीं फूटा तो भाजपा को जाना होगा।
 
डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।
 

 

अमित शाह
भाजपा
राजनीति

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

यूपी-बिहार: 2019 की तैयारी, भाजपा और विपक्ष

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी

क्या भाजपा शासित असम में भारतीय नागरिकों से छीनी जा रही है उनकी नागरिकता?


बाकी खबरें

  • cartoon
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ख़बर भी-नज़र भी: …लीजिए छापेमारी के साथ यूपी चुनाव बाक़ायदा शुरू!
    18 Dec 2021
    आयकर विभाग की टीम ने आज सपा नेताओं के घर और कैंप कार्यालयों पर छापेमारी की है। इसपर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का कहना है कि “भाजपा का हार का डर जितना बढ़ता जायेगा, विपक्षियों पर छापों का दौर भी उतना…
  • sudan
    पवन कुलकर्णी
    सूडान के दारफुर क्षेत्र में हिंसा के चलते 83,000 से अधिक विस्थापित: ओसीएचए 
    18 Dec 2021
    सूडान की राजधानी खार्तूम, खार्तूम नार्थ, ओम्डुरमैन सहित देशभर के कई राज्यों के कई अन्य शहरों में गुरूवार 16 दिसंबर को विरोध प्रदर्शनों के दौरान “दारफुर का खून बहाना बंद करो” और “सभी शहर दारफुर हैं”…
  • air india
    भाषा
    पायलटों की सेवाएं समाप्त करने का निर्णय खारिज किये जाने के खिलाफ एअर इंडिया की अर्जी अदालत ने ठुकराई
    18 Dec 2021
    अदालत ने कहा, ‘‘सरकार और उसकी इकाई एक आदर्श नियोक्ता के रूप में कार्य करने के लिए बाध्य हैं और इसलिए, उसे पायलटों को ऐसे समय संगठन (एअर इंडिया) की सेवा करने के अधिकार से वंचित करते नहीं देखा जा सकता…
  • Goa Legislative Assembly
    राज कुमार
    गोवा चुनाव 2022: राजनीतिक हलचल पर एक नज़र
    18 Dec 2021
    स्मरण रहे कि भाजपा ने जिन दो पार्टियों के बल पर सरकार बनाई थी वो दोनों ही पार्टियां भाजपा का साथ छोड़ चुकी है। गोवा फॉरवर्ड पार्टी कांग्रेस का समर्थन कर रही है तो महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी तृणमूल…
  • Nuh
    सबरंग इंडिया
    नूंह के रोहिंग्या कैंप में लगी भीषण आग का क्या कारण है?
    18 Dec 2021
    हरियाणा के नूंह में लगी आग में रोहिंग्याओं की 32 झुग्गियां जलकर खाक हो गईं। उत्तर भारत के रोहिंग्या शरणार्थी शिविर में इस साल इस तरह की यह तीसरी आग है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License