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भारत
राजनीति
कोई भी संस्थान आलोचना से परे होने की धारणा नुकसानदेह : एन रवि
‘‘व्यापक मुद्दा है कि क्या अदालतों की नैतिकता या ईमानदारी (स्केंडलाइज) पर सवाल उठाने के अपराध को कानून की किताब में बरकरार रखा जाना चाहिए...।”
भाषा
11 May 2019
एन. रवि

दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार एन रवि ने शुक्रवार को कहा कि किसी भी संस्था के आलोचना से परे होने और न्यायाधीशों की गरिमा और प्राधिकार को सामान्य समीक्षा एवं आलोचनात्मक टिप्पणियों से बचाव करते हुए उन्हें कायम रखने की धारणा लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए नुकसानदेह है।

समाचार पत्र द हिन्दू के पूर्व मुख्य संपादक एवं प्रकाशक ने कहा कि सार्वजनिक आलोचना से न्यायपालिका में जनता का विश्वास किसी न किसी प्रकार से डिग जाएगा, यह तर्क न्यायपालिका की ताकत एवं भरोसे के बारे में उपयुक्त सोच नहीं है। न्यायपालिका की शक्ति इसकी समुचित निष्पक्षता एवं उसके निर्णयों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।

समाचार समिति पीटीआई के चेयरमैन (अध्यक्ष) रवि दसवीं जिंदल ग्लोबल व्याख्यान श्रृंखला में बोल रहे थे।

उन्होंने कहा, ‘‘न्याय प्रणाली की आलोचना पर अवमानना के आरोपों का इस्तेमाल हुआ है। अदालतों ने स्वयं न्यायाधीशों के निजी आचरण की खबरों एवं उनके प्रशासनिक कदमों की आलोचना पर अवमानना की कार्रवाई शुरू की है।’’

उन्होंने ‘‘भारतीय मीडिया की स्वतंत्रता, दायित्व एवं जवाबदेही’’ शीर्षक से दिये व्याख्यान में कहा, ‘‘व्यापक मुद्दा है कि क्या अदालतों की नैतिकता या ईमानदारी (स्केंडलाइज) पर सवाल उठाने के अपराध को कानून की किताब में बरकरार रखा जाना चाहिए। संस्थानों को आलोचना से परे रखने तथा न्यायाधीशों की शक्तियों को सामान्य समीक्षा एवं समीक्षात्मक टिप्पणियों से बचाव कर उनको कायम रखने संबंधी धारणा लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाने वाली हैं।’’

उन्होंने कहा कि इस सन्दर्भ में यह महत्वपूर्ण होगा कि अधिक उदार कानूनों एवं उदार व्याख्या के लिए प्रयास करते समय समूची न्यायपालिका संस्थान में टकराव की धारणा से बचा जाना चाहिए।

रवि ने कहा, ‘‘न्यायपालिका ने अपने विभिन्न निर्णयों के माध्यम से मीडिया की स्वतंत्रता के बुनियादी ढांचे को सशक्त करने में मदद की है। यह भी समान रूप से सत्य है कि पूर्व काल में, जब न्यायपालिका ने न्यायिक उद्घघोषणा के जरिये स्वयं को मजबूत किया उससे भी पहले, जब कार्यपालिका का दबदबा था, मनमनानी नियुक्तिां, तबादले होते थे और प्रतिबद्ध न्यायपालिका की बात होती थी, तब मीडिया ने काफी हद तक न्यायपालिका की स्वतंत्रता के पक्ष में जनता की राय को तैयार किया।’’

उन्होंने कहा कि एक अन्य कानून जो अभिव्यक्ति के संदर्भ में अक्सर प्रयुक्त किया जाता है, वह है राजद्रोह। भले ही उपनिवेश दौर का यह अधिनियम कानून की किताब में है, अदालतों ने इसका उपयोग केवल उन मामलों में करने तक सीमित रखा जहां मंशा घृणा पैदा करने या हिंसा भड़काने अथवा सार्वजनिक अव्यवस्था कायम करने की थी।

रवि ने ध्यान दिलाया कि भारत विश्व के सबसे बड़े मीडिया बाजारों में से एक है। यहां विभिन्न भाषाओं में 70 हजार से अधिक पंजीकृत समाचारपत्र, 1600 केबल टेलीविजन स्टेशन और 38 करोड़ 40 लाख सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं।

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