NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
फिलिस्तीन
अमेरिका
मीडिया कैसे देती है जनता को धोखा?
डॉ. परवेज़ हूदभॉय
30 Sep 2014

आज अगर आप टीवी के सामने बैठ कर लगातार चैनल बदले या दर्ज़न भर अखबार भी पढ़ लें, तो हर जगह केवल वे विडियो या फोटो देखने को मिलेंगे जिसमे पाकिस्तान के लड़ाकू विमान उत्तर वजीरिस्तान में बम गिरा रहें हैं। या फिर तोपे पहाड़ों के सीने में गोले दाग रहीं हैं या फिर ऑपरेशन ज़र्ब ई अज्ब का जश्न मनता हुआ मिलेगा। पर ये क्या? हमारे विमान, इस्लामिक गणतंत्र के अन्दर इस्लामी लड़कों पर हमला कर रही है?
 

आज 9/11 के 10 साल बाद भी, पकिस्तान की आवाम एक भ्रम में ही जी रही है। बहुमत को यह समझा दिया गया है कि यहाँ आतंकवाद के पनपने के पीछे विदेशी हाथ है। इसीलिए जब अनेक आतंकी समूहों ने गर्व के साथ सेना और सार्वजानिक ठिकानो पर आत्मघाती हमले की बात की तो उसे नजरंदाज कर दिया गया। और वजह ये दी गई कि एक मुसलमान दूसरे मुसलमान को नहीं मारेगा। और यह तय है कि पाकिस्तान के बाहरी दुश्मन जैसे भारत,इज़राइल,अमरीका, अफगानिस्तान या हो सकता है कि ईरान इसके पीछे की वजह रहे हों।  
 

और इस विदेशी हाथ के भ्रम को फ़ैलाने का काम अधिक वेतन पर रखे समाचार पाठकों और हाज़िरजवाब अतिथियों ने तब तक किया जब तक यह शहर का इकलौता सच नहीं बन गया। कुछ विशेष अतिथियों ने जिसमे सेवानिवृत जनरल हामिद गुल और उनके बेटे अब्दुल्लाह गुल भी शामिल थे, ने लगातार यह बात दोहराई की इन आत्मघाती हमलावरों के पीछे विदेशी ताकतें और गैर मुसलमान शख्स शामिल हैं। पर किसी ने सच्चाई जानने की कोशिश नहीं की।

सौजन्य: en.wikipedia.org

याद्दाश्त अगर छोटी न हो तो पाठक उन कार्यक्रमों को याद कर सकते है जिसमे मंत्री रहमान मालिक से लेकर क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान ने बड़े ही उग्र भाषण दिए। तब केवल अमरीका ही एकमात्र आतंक फ़ैलाने वाले देश था।इसलिए जब नवम्बर २०१३ में तालिबान सुप्रीमो हकीमुल्लाह महसूद की एक मिसाइल हमले में मौत हुई तो आतंरिक मंत्री चौधरी निसार गुस्से से पागल ही हो गए तो वहीँ दूसरी तरफ इमरान खान होश ही गवा बैठे। उस वक़्त इस बात को वे भूल गए थे कि महसूद ने पाकिस्तान पर जंग छेड़ रखी थी और न इस बात से फर्क पड़ रहा था कि उसने अनेक पाकिस्तानी सिपाहियों को अपना बंधक बना रखा था।

और अचानक सब बदल गया और ज़र्ब इ अज्ब भी सामने आ गया। विदेशी हाथ की सारी बातें गायब हो गई। और लोगो ने यह बात मान ली कि असली दुश्मन पाकिस्तानी तालिबान था। अचानक ही सारे समर्थक टीवी से गायब हो गए। सभी समाचार वाचक यह भूल गए कि वे इतने सालों और महीनो से क्या कह रहे थे। और ड्रोन विरोधी इमरान खान ने इस बात को नजरंदाज कर दिया कि पिछले कई दिनों से ड्रोन उसी आसमान में चक्कर काट रहे थे।

अब एक नहीं समझ समाज में छा गई है जिसे परिस्तिथियों के अनुसार बनाया गया और आतंकी समर्थकों को टीवी से दूर भेज दिया।पर यह कैसे हुआ?इसके लिए आदेश किसने दिया?और अगर यह लिखित योजना थी तो उसे बनाया किसने था?

मुझे नहीं लगता कि इसका कोई आसन जवाब है।या इस बदलाव को ऊपर से निर्देशित किया गया था।आईएसआई और सेना की इस कार्यवाही ने नए शसक्त सेना प्रमुख का रास्ता जरूर साफ़ किया होगा। पर पूरी कहानी कहीं और ज्यादा जटिल थी।

किसी सेना के पास इतना दम नहीं कि वह इतनी बड़ी सामाजिक समझ अपने आप खड़ा कर दे। तीसरे जर्मन राज्य के समय नाज़ी स्वयं अपनी मर्ज़ी से आतंक नहीं फैला सकते थे क्योंकि उन्हें पता था कि यह पूरे राष्ट्र पर काम नहीं करेगा। इसीलिए प्रोपोगंडा मंत्री जोसफ गोएब्बेल्स ने यह मांग की थी कि उनके मंत्रालय के ३००० कर्मचारी केवल यह पता करेंगे कि उस समय जनता क्या सोच रही थी।फिर तानाशाह इस बात का फैसला लेंगे कि खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ाये जाए या नहीं।

पाकिस्तान सेना ताकतवर तो है पर इतनी नहीं। लोगों की सोच को प्रभावित करने की उनकी क्षमता इतनी नहीं है। जिन्हें इसके विपरीत लगता है , वे २००४ को याद कर सकते हैं सेना सबसे ज्यादा बदनाम थी। फता के मैदान में मरे सिपाहियों को दफनाया भी नहीं गया था क्योंकि उस गावं के इमाम ने आखिरी प्रार्थना पढने से मना कर दिया था।उन्हें आज की तरह “शहीद” नहीं बुलाया जाता था।तो आखिर क्या है जो पाकिस्तान के इस बदलाव को समझा सकता है?शायद किसी दिन कोई इसपर शोध करेगा। पर कुछ अनुमान “मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट” नाम की किताब से लगाया जा सकता है। इस किताब में बताया गया है कि किस तरह अमरीका में समाज की सोच को प्रशासनिक सुविधा हेतु बदला जाता है। नोम चोमस्की एवं एडवर्ड हेर्मन द्वारा लिखी गई किताब अमरीकी मीडिया के आतंरिक ढांचों एवं उनके संबंधो का खुलासा करती है। हर एक बिन्दुओं को ध्यान से देखते हुए लेखक इस बात का खुलासा करते हैं कि किस औद्योगिक घरानों और मुनाफे के दबाव में आकर अमरीकी मीडिया इन्हीं की चाटुकारिता करती है।

मुनाफे की इस होड़ ने पाकिस्तानी मीडिया को भी प्रभावित किया है। पर अंतर यह है कि पाकिस्तानी ढांचे अन्दर से ही कमजोर हैं और इसलिए इनके कार्य हमेशा अंतर विरोधी होते हैं। और इसलिए सारे सामाजिक एवं नैतिक दबाव से परे होकर ये प्राइवेट न्यूज़ चैनल तार्किक समझ को ठेंगा दिखाते हैं।और समाज की कमियों का नाजायज़ फायदा भी उठाते हैं।

और यह इससे साफ़ होता है कि वे आज आतंकवाद को किस तरह देख रहें हैं’। कुछ चैनल उन हिंसक घटनाओं का विरोध कर रहे हैं जो कभी आम बात हुआ करती थी।साथ ही कुछ चैनलों ने आतंवादियों को इज्जत देकर आतंकवाद को और बढ़ावा ही दिया है।उदाहरण के तौर पर अभी हाल ही के समय तक आतंकियों के लिए “दहशतगर्द” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता था।और इसके जगह असकृत पसंद या इंतिहा पसंद शब्दों का इस्तमाल होता था।

रेटिंग के भूखे टीवी चैनलों ने पाकिस्तान की यह दुर्दशा कर दी। उनके प्रसिद्ध वाचकों ने हत्यारों, आतंकियों के प्रति दया दिखाई, और सिर्फ झूठ और अफवाहों को बेचा। अगर याद किया जाए तो कुछ ही तस्वीरे ज़ेहन में आती हैं, जैसे लाल मस्जिद के बाहर खड़े होकर बगावत की आवाज़ लगाती तस्वीर, मुंबई हमले को दर्शाती तस्वीर, और मलाला पर हमले को सही ठहराता चित्र।

वैसे तो आतंकियों के प्रति ये प्रेम कुछ दिनों के लिए थम गया है।पिछले पांच हफ्तों से न्यूज़चैनल 24/7 लगातार चल रहे विरोध प्रदर्शनों की खबर दिखाने में व्यस्त हैं।इसकी वजह से २०१३ के चुनावों में हारे हुए नेता और रहस्यमई धार्मिक नेता को , अरबो का प्रचार भी दिलवा रहे हैं । इन प्रदर्शनों और इनके नेताओं का मकसद किसी को पता भी नहीं। और खासकर उस खबर को दिखा कर , जिसमे इमरान खान अपने भाषणों में विरोधियों के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, “आज़ाद” मीडिया ने पाकिस्तान में सभ्यता की हदों को भी गिरा दिया है।

सौजन्य: dawn.com

(अनुवाद- महेश कुमार)

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

पाकिस्तान
जनरल हामिद गुल
हकीमुल्लाह महसूद
इमरान खान
नाज़ी
तालिबान
टीटीपी
ज़र्ब इ अज्ब
मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट

Related Stories

ए दिल है मुश्किल, जीना यहाँ , जरा बचके जरा हटके ये है बॉम्बे मेरी जां

पाकिस्तान के पद्चिन्हों पर चल रहा है भारत: परवेज़ हूदभोय

क्या अब हम सब चार्ली हेब्दो हैं?

मज़हबी कट्टरपंथ: फासीवाद की तरफ बढ़ते कदम

मोदी एवं विदेश नीति: कम काम, ज्यादा दिखावा

पाकिस्तान: एक 'शांत' सैन्य तख्तापलट?

उदार सीरियाई विद्रोही के लिए आवेदन फार्म


बाकी खबरें

  • Gauri Lankesh pansare
    डॉ मेघा पानसरे
    वे दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी या गौरी लंकेश को ख़ामोश नहीं कर सकते
    17 Feb 2022
    दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी को चाहे गोलियों से मार दिया गया हो, मगर उनके शब्द और उनके विचारों को कभी ख़ामोश नहीं किया जा सकता।
  • union budget
    टिकेंदर सिंह पंवार
    5,000 कस्बों और शहरों की समस्याओं का समाधान करने में केंद्रीय बजट फेल
    17 Feb 2022
    केंद्र सरकार लोगों को राहत देने की बजाय शहरीकरण के पिछले मॉडल को ही जारी रखना चाहती है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में आज फिर 30 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 541 मरीज़ों की मौत
    17 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 30,757 नए मामले सामने आए है | देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 27 लाख 54 हज़ार 315 हो गयी है।
  • yogi
    एम.ओबैद
    यूपी चुनावः बिजली बिल माफ़ करने की घोषणा करने वाली BJP का, 5 साल का रिपोर्ट कार्ड कुछ और ही कहता है
    17 Feb 2022
    "पूरे देश में सबसे ज्यादा महंगी बिजली उत्तर प्रदेश की है। पिछले महीने मुख्यमंत्री (योगी आदित्यनाथ) ने 50 प्रतिशत बिजली बिल कम करने का वादा किया था लेकिन अभी तक कुछ नहीं किया। ये बीजेपी के चुनावी वादे…
  • punjab
    रवि कौशल
    पंजाब चुनाव : पुलवामा के बाद भारत-पाक व्यापार के ठप हो जाने के संकट से जूझ रहे सीमावर्ती शहर  
    17 Feb 2022
    स्थानीय लोगों का कहना है कि पाकिस्तान के साथ व्यापार के ठप पड़ जाने से अमृतसर, गुरदासपुर और तरनतारन जैसे उन शहरों में बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी पैदा हो गयी है, जहां पहले हज़ारों कामगार,बतौर ट्रक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License