NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पश्चिम उत्तर प्रदेश में फूट गया नोटबंदी का बम!
56इंच के सीने के लिए ऐन मौके पर राममंदिर निर्माण के संकल्प के बावजूद अबकी दफा फिर यूपी की जनता ने वानरसेना बनने से इंकार कर दिया है
पलाश विश्वास
13 Feb 2017
पश्चिम उत्तर प्रदेश में फूट गया नोटबंदी का बम!

खास खबर यह है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में  नोटबंदी का बम फूट गया है। अजित सिंह की मौकापरस्ती की वजह से पहली बार पश्चिम उत्तर प्रदेश के  किसानों पर चौधरी चरण सिंह की विरासत का कोई असर नहीं हुआ है। यूपी में आज पहले चरण का मतदान खत्म हो गया है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में आज 15 जिलों की 73 सीटों पर मतदान हुआ है।

 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले चरण में 15 जिलों की कुल 73 सीटों पर आज छिटपुट घटनाओं के बीच औसतन करीब 64 प्रतिशत वोट पड़े।

खास बात यह है कि  इसबार महिलाओं ने बढ़ चढ़कर जोश दिखाया जिसकी वजह से करीब 3 करोड़ लोगों ने वोट डाला है। पिछली बार 61 प्रतिशत मतदान हुआ था। 839 उम्मीदवारों की किस्मत EVM में आज बंद हो गई है।

यूपी से आ रही खबरों का लब्बोलुआब यही है कि छप्पन इंच के सीने के लिए ऐन मौके पर राम की सौगंध खाकर राममंदिर निर्माण के संकल्प के बावजूद अबकी दफा फिर यूपी की जनता ने वानरसेना बनने से इंकार कर दिया है और किसानों के नरसंहार के ऩसरसंहार के चाकचौबंद इंतजाम की कीमत संघ परिवार को चुकाना ही होगा।

पश्चिम उत्तर प्रदेश में दंगाई सियासत के जरिये यूपी जीतने और नोटबंदी से यूपी जीतने का कारपोरेट हिंदुत्व एजंडा मतदान के पहले ही चरण में बुरी तरह फेल है और बढ़त दलित मुसल्मान एकता को है, जिसकी जरूरत पर बहुजन बुद्धिजीवी एचएल दुसाध ने हस्तक्षेप पर लगे अपने आलेख में खास जोर दिया है।

बिना किसी शोरगुल के मायावती ने नये सिरे से सोशल इंजीनियरिंग करके अखिलेश के अल्पसंख्यक उत्पीड़न, कांग्रेस के मौकापरस्ती और संघ परिवार की दंगाई सियासत को करारा जबाव दिया है।

बामसेफ ने भी अलग पार्टी बनाकर लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद इसबार भाजपा को हराने वाले उम्मीदवार को जिताने की मुहिम चलाकर भाजपा के खिलाफ दलित मुसलमान गठबंधन फिर खड़ा करने में मददगार है।

अजित सिंह सत्ता के लिए सौदेबाजी के माहिर खिलाड़ी है तो अखिलेश के साथ कड़क मोलभाव में वे गच्चा खा गये। वैसे भी वे पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों के नेता अजित सिंह अब अब रहे नहीं है और न किसानों के हितों से उन्हें कुछ लेना देना नहीं है।

इसके उलट, अजित सिंह ने चौधरी साहब की विरासत का जो गुड़ गोबर किया, उसकी वजह से उत्तर भारत के किसानों और खास तौर पर जाटों को चौधरी साहेब के अवसान के बाद भारी नुकसान उठाना पड़ा है।

मुजफ्फरनगर में संघ परिवार को खुल्ला खेलने देकर अजित सिंह ने जो भारी गलती की है, उसके लिए उन्हें पश्चिम उत्तर प्रदेश के हिंदू मुसलमान किसान कभी माफ नहीं करेंगे।

भाजपा को हराने के लिए सपा के आत्मघाती मूसलपर्व की वजह से और कांग्रेस के दंगाई इतिहास की वजह से मुसलमानों ने बसपा को वोट देने का फैसला करके यूपी में केसरिया अश्वमेधी अभियान के सारे सिपाहसालारों को चित्त कर दिया है। बाकी यूपी में भी इसका असर होना है।  

दूसरी तरफ, उत्तराखंड में भी भूमि माफिया से नत्थी भाजपा ने अपने तमाम पुराने नेताओं को किनारे लगाकर जैसे एक के बाद एक भ्रष्ट नेताओं को टिकट बांटे हैं, वहां भी पश्चिम उत्तर प्रदेश की तरह पांसा बदल जाये तो कोई अचरज की बात नहीं होगी।

वैसे पश्चिम यूपी के वोट और भाजपा विरोधी हवा का उत्तराखंड की तराई में भी असर होना है।

मुश्किल यह है कि उत्तराखंड जीतने में कांग्रेस की कोई दलचस्पी नहीं है। छोटा राज्य होने की वजह से कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के लिए उत्तराखंड में खास दिलचस्पी नहीं है तो दसों दिशाओं में गहराते संकट के बादल की वजह से संघ परिवार कमसकम उत्तराखंड जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।

कांग्रेस के नेता खासकर हरदा के खासमखास वफादार लोग उन्हें हराने में कोई कसर छोड़ नहीं रहे हैं।

गौरतलब है कि किसान सभा और वाम किसान आंदोलनों के दायरे से बाहर उत्तर भारत और बाकी देश में चौधरी चरण सिंह के किसान आंदोलन का असर अब इतिहास है। फिर भी उत्तर भारत के किसानों खासकर पंजाबियों, सिखों और जाट गुज्जरों और मुसलामनों में सामाजिक तानाबाना सत्तावर्ग की दंगाई मजहबी सियासत के बावजूद अब भी अटूट है।

खासकर आगरा से लेकर बरेली तक और मेरठ गाजियाबाद से लेकर हरियाणा और उत्तराखंड के हरिद्वार जिले तक किसानों में नाजुक बिरादाराना रिश्तेदारी रही है जाति धर्म नस्ल भाषा के आर पार, जिस पर मेऱठ, अलीगढ़, मुरादाबाद, आगरा के दंगों ने और बाबरी विध्वंस के बाद पूरे उत्तर प्रदेश में दंगाई फिजां बने जाने का भी कोई असर नहीं हुआ था।

पिछले लोकसभा चुनाव से पहले मुजफ्फरनगर के देहात में दंगा भड़काकर किसानों और खासकर जाटों का जो केसरियाकरण किया संघ परिवार ने, उसके आधार पर यूपी में हिंदुत्व के नाम राममंदिर आंदोलन के बाद धार्मिक ध्रुवीकरण हो गया था और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपना दल के साथ गंठबंधन के जरिये भाजपा को लोकसभा चुनाव में बसपा, कांग्रेस और सपा के सफाया करने में कामयाबी मिली है। अब सिरे से पांसा पलट गया है।  

संजोग से नोटबंदी का असर खेती पर जिस भयानक तरीके से हुआ और जाटों को आरक्षण के नाम जिस तरह धोखा केंद्र सरकार ने गुजरात के पटेलों और राजस्थान के गुज्जरों की तरह दिया,उससे हालात सिरे से बदल गये हैं।

मेरे पिताजी चौधरी साहेब के भारतीय किसान समाज के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में थे, तब मैं अपने गांव के बगल में गांव हरिदासपुर में प्राइमरी स्कूल में था। तराई में चौधरी नेपाल सिंह 1958 के ढिमरी ब्लाक आंदोलन के दौरान पिताजी के कामरेड हुआ करते थे, जिनसे हमारे पारिवारिक संबंध बने हुए रहे हैं।

तराई के जाटों को हम शुरू से अपने परिजन पंजाबी, सिखों, पहाड़ियों, देशी और बुक्सा-थारु गावों के लोगों की तरह मानते रहे हैं।

मुसलमान आबादी हमारे इलाके में उतनी नहीं रही है। फिर हमारे बचपन के दौरान साठ के दशक में विभाजन के जख्म सभी शरणार्थियों में इतने गहरे थे कि मुसलमान गांवों से रिश्ते बनने से पहले हम नैनीताल पढ़ने को निकल गये।

1984 से 1990 तक मैं बाहैसियत पेशेवर पत्रकार रहा हूं और बिजनौर में सविताबाबू का मायका है। तब से लेकर अब तक पश्चिम उत्तर प्रदेश से हमारा नाता टूटा नहीं है। टिकैत के किसान आंदोलन के बाद साबित हो गया है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसान चाहें तो सारा राजनीतिक समीकरण की ऐसी तैसी कर दें। राजस्थान और हरियाणा के जाट नेतृत्व और उनकी ताकत भी हम जान रहे हैं।

जाटों ने भाजपा को हराने की कसम खायी है तो संघ परिवार यूं समझो कि यूपी की सियासत से बाहर है।

Courtesy: हस्तक्षेप
मायावती
बहुजन समाज पार्टी
उत्तर प्रदेश
नोट बंदी
उत्तर प्रदेश चुनाव
भाजपा

Related Stories

उप्र बंधक संकट: सभी बच्चों को सुरक्षित बचाया गया, आरोपी और उसकी पत्नी की मौत

नागरिकता कानून: यूपी के मऊ अब तक 19 लोग गिरफ्तार, आरएएफ और पीएसी तैनात

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

यूपी-बिहार: 2019 की तैयारी, भाजपा और विपक्ष

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

सोनभद्र में चलता है जंगल का कानून

यूपीः मेरठ के मुस्लिमों ने योगी की पुलिस पर भेदभाव का लगाया आरोप, पलायन की धमकी दी


बाकी खबरें

  • sudan
    पीपल्स डिस्पैच
    सूडान: सैन्य तख़्तापलट के ख़िलाफ़ 18वें देश्वयापी आंदोलन में 2 की मौत, 172 घायल
    17 Feb 2022
    इजिप्ट इस तख़्तापलट में सैन्य शासन का समर्थन कर रहा है। ऐसे में नागरिक प्रतिरोधक समितियों ने दोनों देशों की सीमाओं पर कम से कम 15 जगह बैरिकेडिंग की है, ताकि व्यापार रोका जा सके।
  • muslim
    नीलांजन मुखोपाध्याय
    मोदी जी, क्या आपने मुस्लिम महिलाओं से इसी सुरक्षा का वादा किया था?
    17 Feb 2022
    तीन तलाक के बारे में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना, तब, जब मुस्लिम महिलाओं को उनकी पारंपरिक पोशाक के एक हिस्से को सार्वजनिक चकाचौंध में उतारने पर मजबूर किया जा रहा है, यह न केवल लिंग, बल्कि धार्मिक पहचान पर भी…
  • aaj ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाब चुनाव में दलित-फैक्टर, सबको याद आये रैदास
    16 Feb 2022
    पंजाब के चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी सहित सभी पार्टियों के शीर्ष नेता बुधवार को संत रैदास के स्मृति स्थलों पर देखे गये. रैदास को चुनावी माहौल में याद करना जरूरी लगा क्योंकि पंजाब में 32 फीसदी…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: मोदी की ‘आएंगे तो योगी ही’ से अलग नितिन गडकरी की लाइन
    16 Feb 2022
    अभी तय नहीं कौन आएंगे और कौन जाएंगे लेकिन ‘आएंगे तो योगी ही’ के नारों से लबरेज़ योगी और यूपी बीजेपी के समर्थकों को कहीं निराश न होना पड़ा जाए, क्योंकि नितिन गडकरी के बयान ने कई कयासों को जन्म दे दिया…
  • press freedom
    कृष्ण सिंह
    ‘दिशा-निर्देश 2022’: पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज़ को दबाने का नया हथियार!
    16 Feb 2022
    दरअसल जो शर्तें पीआईबी मान्यता के लिए जोड़ी गई हैं वे भारतीय मीडिया पर दूरगामी असर डालने वाली हैं। यह सिर्फ किसी पत्रकार की मान्यता स्थगित और रद्द होने तक ही सीमित नहीं रहने वाला, यह मीडिया में हर उस…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License