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सोचिये कि योग का विरोध क्यों ?
वीरेन्द्र जैन
20 Jun 2015
प्रथम दृष्ट्या उस योग के राष्ट्रीय कार्यक्रम का विरोध करना हास्यास्पद लग सकता है जो योग हमारे देश की पहचान है और जिसके महत्व को हमने पूरे विश्व से स्वीकार करा लिया है। योग के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ के लिए उपयोगी होने से भी किसी की असहमति नहीं है और जो बिना व्यय के अनेक रोग दूर करने की क्षमता रखता है। पर फिर भी अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के दिन सामूहिक योग करने का व इसके ही एक आसन सूर्यनमस्कार के बहाने कुछ मुस्लिम नेता इसका विरोध कर रहे हैं। यह समझना जरूरी है कि इस विरोध के मूल में योग नहीं अपितु वे लोग व उनका चरित्र है, जो इस कार्यक्रम का आवाहन कर रहे हैं। यदि समाज में साम्प्रदायिकता और जातिवाद का ज़हर फैला होता है तो अपने प्रतिद्वन्दी का अच्छे से अच्छा प्रस्ताव भी बुरा लगता है या उस पर सन्देह होता है। विपरीत पक्ष पहले विरोध का कोई तर्क तलाशता है और फिर उसे अपने समाज की व्यापक सहमति वाले विचार से जोड़ कर उस पर कठोर होता जाता है। योग के कार्यक्रम के साथ भी यही स्थिति है।
                                                                                                                                 
 
भाजपा का जो मूल जनाधार है और अतीत में उसके जो आचरण रहे हैं उसे देखते हुए मुसलमान उन पर भरोसा नहीं कर सकते। शत्रु अगर दवा भी दे तो सन्देह होता है। विडम्बना यह है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में डाले गये मतों का बहुमत प्राप्त करने वाला दल सत्ता प्राप्त कर सकता है किंतु जिस बिखरे बहुमत ने उसका विरोध किया होता है उसकी सहमति पाने की कोई व्यवस्था नहीं है और इस तरह अल्पमत का विचार बहुमत पर थोपने के प्रयास में संघर्ष पैदा होता है। भाजपा का एक बड़ा जनाधार कट्टरवादी दुष्प्रचार से प्रभावित उन लोगों से बनता है जो इस्लामिक और ईसाई धर्म संस्कृति को देश से निर्मूल करने के विचार को ठीक समझने लगे हैं और दूसरों को भी हिंसा में भाग लेने के लिए उकसाते रहते हैं। इसी पार्टी के इतिहास में अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों के खिलाफ निर्मम हिंसा की घटनाएं दर्ज हैं जिस पर उन्होंने कभी दुख व्यक्त नहीं किया और न ही भूल स्वीकार कर के क्षमा मांगी। अभी भी हिंसा के अपराधियों के खिलाफ जो कमजोर से मुकदमे लम्बित हैं उनमें आरोपियों के खिलाफ गवाही देने वालों को भयभीत किया जाता है व प्रकरण को कमजोर और लम्बित कराने में भाजपा के नेता सक्रिय हैं। आतंकवादी हिंसा करके उनका दोष मुसलमानों पर मढने के आरोपी जब पकड़े जाते हैं तो भाजपा के वरिष्ठ नेता जेल में उनसे मिलने जाते हैं। प्रज्ञा सिंह से जेल में मिलने के लिए तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष और भगवाभेष धारण करने वाली राजनेता उमा भारती गयी थी, तथा आसाराम आदि भी उससे भेंट करने वालों में से रहे हैं।   
 
योग दिवस पर मुस्लिम नेताओं के विरोध को योग की उपयोगिता या संयुक्त राष्ट्र संघ में मुस्लिम देशों से मिले औपचारिक समर्थन के आधार पर नहीं तौला जा सकता है। भाजपा शासित राज्यों में स्कूल एडमीशन के समय बच्चों को तिलक लगाने की सलाह को मष्तिष्क के ज्ञान बिन्दु को जाग्रत करने की अवधारणा से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। सारी दुनिया के बच्चे बिना तिलक लगाये स्कूल प्रवेश कर के भी अच्छी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और दुनिया में अपेक्षाकृत बेहतर कर रहे हैं, जिनकी हम नकल करते हैं। जो तिलक न लगवाना चाहें उनको उसकी स्वतंत्रता देकर ये प्राथमिक शिक्षा में ही भेद पैदा करने का षड़यंत्र कर रहे हैं। इसी तरह भोजन मंत्र का पाठ या मिड डे मील में अंडा देने या न देने के विवाद भी इसी भेद पैदा करने की योजना का हिस्सा हैं। इससे हिन्दू मुस्लिम बच्चों में बचपन से ही भेद पैदा होने लगता है। कहा जाता है कि ऐसी सैकड़ों योजनाओं पर उनके यहाँ निरंतर काम हो रहा है, व समय समय पर उन्हें सामने लाकर भेद के बीज बोये जाते रहते हैं और बहुत मासूमियत से असहमति व्यक्त करने वालों को ही अच्छे कामों में अवरोध पैदा करने वाला प्रचारित किया जाता है। मैंने एक भाजपा नेता से पूछा था कि जैसे ही राम मन्दिर का निर्माण पूरा हो जायेगा तब आप लोगों की राजनीति का क्या होगा। उत्तर में उसने कहा था कि अभी न केवल काशी मथुरा बाकी है अपितु साढे ती सौ ऐसी इमारतें सूची बद्ध हैं जिनके सहारे अपनी राजनीति करते रहेंगे। धर्म परिवर्तन, घर-वापिसी, रामसेतु, बंगलादेशी शरणार्थियों लेकर हजारों विभाजनकारी योजनाएं उनके बस्ते में हैं। अल्पसंख्यकों द्वाराउनके किसी प्रस्ताव को स्वीकार लेने से समस्याओं का अंत नहीं होगा अपितु उनकी अपेक्षाएं और बढ जायेंगीं। यही कारण है कि अल्पसंख्यक किसी उस ज़िद्दी बच्चे की तरह व्यवहार करने को मजबूर होते हैं जो गुस्से में मिठाई को भी फैंक देता है।
 
इमरजैंसी में उभरे धीरेन्द्र ब्रम्हचारी उस दौरान नियमित रूप से टीवी पर योग प्रशिक्षण देते थे जिसे टीवी की कम व्याप्ति के बाबजूद बहुत लोग देखते थे। यद्यपि इमरजैंसी में श्रीमती गाँधी का साथ देने के कारण बहुत लोग उनसे नाराज थे पर उस नाराजी में योग कभी निशाना नहीं बना। जैसे ही भाजपा ने योग की लोकप्रियता से अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना शुरू कीं तो समाज के एक हिस्से को योग से भी अरुचि होने लगी। यदि भाजपा से अलग योग के कार्यक्रमों का आयोजन होता है तो बड़ी संख्या में वे लोग भी भाग लेंगे जो अभी नाक भों सिकोड़ रहे हैं और अपनी मजहबी आस्थाओं में से तर्क तलाश रहे हैं।
 
ईसाई धर्म को मानने वाले देशों में छात्रों को धार्मिक पाठ सिखाने के लिए संडे स्कूल चलते हैं। एक बोधकथा के अनुसार यूरोप के किसी देश में शैतान बच्चों की एक कक्षा को स्वर्ग नर्क से सम्बन्धित कई पाठ पढाने के बाद जब पादरी ने कक्षा के बच्चों से पूछा कि बताओ स्वर्ग कौन कौन कौन जाना चाहता है, तो एक बच्चे को छोड़ कर सभी ने अपने हाथ खड़े कर दिये।
 
“क्या तुम स्वर्ग नहीं जाना चाहते?” पादरी ने आश्चर्य से उससे पूछा।
 
“जाना तो चाहता हूं, पर इन बच्चों के साथ नहीं” उसका उत्तर था। शायद भाजपा के साथ योग करना भी बहुत सारे लोगों को पसन्द नहीं होगा। यदि कोई गैरभाजपा संस्था तय तिथि से एक दो दिन पहले योग का कार्यक्रम करती है तो योग और भाजपा के बारे में पूरी दुनिया को एक बेहतर सन्देश जा सकता है।    
 
डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस
भाजपा
मुसलमान
समाज

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